BRICS meet: नई करेंसी, नये देश.. दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक, डॉलर को तोड़ने की तैयारी!
ब्रिक्स को विस्तार करने की मांग पिछले कुछ सालों से तेज हुई है और दर्जन भर से ज्यादा देश ब्रिक्स में शामिल होना चाहते हैं। वहीं, ब्रिक्स की अपनी एक अलग करेंसी पर भी समझौता हो सकता है।

BRICS meet: ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका की उभरती अर्थव्यवस्थाओं के ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक इस वक्त दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन शहर में चल रही हैं, जिसपर पूरी दुनिया की निगाहे हैं।
1-3 जून तक होने वाली इस बैठक में ब्राजील के विदेश मंत्री माउरो विएरा, रूस के सर्गेई लावरोव, भारत के एस जयशंकर, चीन के मा झाओक्सू (उप विदेश मंत्री) और दक्षिण अफ्रीका के नालेदी पंडोर प्रमुख मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं।
इसके साथ ही विदेश मंत्रियों की इस बैठक में 15वें ब्रिक्स सम्मेलन के लिए एजेंडा भी तय किया जा रहा है, जिसका शिखर सम्मेलन इसी साल अगस्त महीने में दक्षिण अफ्रीका में होने वाला है।
विदेश मंत्रियों की बैठक होने से पहले दक्षिण अफ्रीका ने रूस को आश्वस्त किया था, कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जब ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने दक्षिण अफ्रीका आएंगे, तो उनके खिलाफ इंटरनेशनल कोर्ट (आईसीसी) की तरफ से जारी गिरफ्तारी वारंट को लेकर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।
बैठक की शुरुआत में, भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, कि "हमारी सभा को एक मजबूत संदेश देना चाहिए, कि दुनिया बहुध्रुवीय है, यह पुनर्संतुलन कर रही है और पुराने तरीके, नई स्थितियों को संबोधित नहीं कर सकते हैं। हम परिवर्तन के प्रतीक हैं और हमें उसी के मुताबिक काम करना चाहिए।"
जयशंकर ने आगे जोर देकर कहा, कि "हम आग्रह करते हैं, कि ब्रिक्स आर्थिक विकेंद्रीकरण को बढ़ावा देगा जो राजनीतिक लोकतंत्रीकरण के लिए बहुत आवश्यक है।"
ब्रिक्स बैठक में विदेश मंत्रियों के एजेंडे में क्या है?
ब्रिक्स के विदेश मंत्री जिन सबसे बड़े विषयों पर चर्चा करेंगे, उनमें से एक ब्रिक्स समूह में सदस्यों को शामिल करना है।
रिपोर्टों के अनुसार, ब्रिक्स समूह में शामिल होने के इच्छुक लगभग 20 देश कतार में हैं। इनमें लैटिन अमेरिका के अर्जेंटीना, निकारागुआ, मैक्सिको, उरुग्वे, वेनेजुएला जैसे देश शामिल हैं। वहीं, अफ्रीका से नाइजीरिया, अल्जीरिया, मिस्र, सेनेगल, मोरक्को हैं, जो ब्रिक्स में शामिल होना चाहते हैं।
वहीं, पश्चिम एशिया से सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, तुर्की, सीरिया, ईरान और मध्य एशिया से कजाकिस्तान, वहीं दक्षिण एशिया से बांग्लादेश और अफगानिस्तान और दक्षिण-पूर्व एशिया से इंडोनेशिया और थाईलैंड हैं, जो ब्रिक्स का सदस्य बनना चाहते हैं।
जियो-पॉलिटिक्स विश्लेषकों का कहना है, कि इस समूह के विस्तार और दुनिया के तीन सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों को शामिल करने के फैसले को, संयुक्त राज्य अमेरिका और पश्चिम के लिए एक चुनौती के रूप में देखा जा सकता है।
हालांकि, इस मुद्दे पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है।
चीन के विदेश मामलों के उप मंत्री मा झाओक्सू ने ये कहा है, कि "हमें यह देखकर खुशी हो रही है, कि अधिक से अधिक देशों ने ब्रिक्स परिवार में हमारे साथ शामिल होने की इच्छा व्यक्त की है। चीन ब्रिक्स में शामिल होने के लिए उन देशों के निमंत्रण का स्वागत करेगा और हम उम्मीद करते हैं, कि और भी देश हमारे बड़े परिवार में शामिल होंगे।"
दिलचस्प बात यह है, कि रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने गुरुवार को ब्रिक्स बैठक के मौके पर सऊदी अरब के विदेश मंत्री प्रिंस फैसल बिन फरहान अल सऊद के साथ बातचीत की, जो यह संकेत है, कि मध्य-पूर्व देश समूह में शामिल होने का इच्छुक हैं।
लिहाजा, कई एक्सपर्ट्स मान रहे हैं, कि ब्रिक्स में शामिल कई देश एंटी-अमेरिका हैं, जिसकी अगुवाई चीन और रूस करेंगे।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पॉलिसी थिंक टैंक गेटवे हाउस के प्रतिष्ठित फेलो और पूर्व भारतीय राजनयिक राजीव भाटिया ने बताया, कि क्यों ये देश ब्रिक्स में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं।
उन्होंने कहा, कि "सबसे पहले, कई देशों का मानना है, कि दुनिया में अमेरिका विरोधी भावना है, और ये सभी देश एक समूह की तलाश कर रहे हैं, जहां वे उस भावना का उपयोग एक साथ इकट्ठा होने के लिए कर सकें। दूसरा, बहुध्रुवीयता के लिए बहुत भूख है, एक ऐसे मंच के लिए जहां ग्लोबल साउथ के देश अपनी एकजुटता व्यक्त कर सकें।"

ब्रिक्स में नई करेंसी पर होगा समझौता?
ब्रिक्स देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में ब्रिक्स देशों के लिए एक स्थानीय करेंसी पर व्यापार करने पर भी विचार किया जाएगा। इसकी कोशिश ये होगी, कि एक ऐसी करेंसी पर बात हो सके, जिससे ब्रिक्स देश आपस में व्यापार कर सकें।
वर्तमान में, रूस और चीन के साथ-साथ चीन और ब्राजील भी युआन में कारोबार कर रहे हैं। अप्रैल में पहले प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, वास्तव में, चीनी युआन, ब्राजील की दूसरी सबसे बड़ी अंतरराष्ट्रीय आरक्षित मुद्रा बनने के लिए यूरो को पार कर गया है।
रिपोर्ट से पता चलता है, कि 2022 के अंत तक ब्राजील के अंतरराष्ट्रीय मुद्रा भंडार में आरएमबी का हिस्सा 5.37 प्रतिशत था, जो यूरो के 4.74 प्रतिशत हिस्से को पार कर गया था और ये ब्राजील और चीन के बीच गहराते आर्थिक संबंधों को दर्शाता है।
जॉर्डन, लीबिया और माल्टा में भारतीय राजदूत रह चुके अनिल त्रिगुणायत, जो ब्रिक्स चैंबर ऑफ कॉमर्स के वरिष्ठ सलाहकार भी हैं, उनका मानना है, कि केप टाउन में विदेश मंत्रियों की बैठक में इस तरह के व्यापार को प्रोत्साहन मिलने की संभावना है।
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ब्रिक्स ढांचे के भीतर एक सामान्य मुद्रा स्थापित करने का मुद्दा भी है और ये एक ऐसा विचार है, जिसे सबसे पहले रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पिछले साल बीजिंग ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रस्तावित किया था।
रूस के खिलाफ लगे अमेरिका और पश्चिमी देशों के प्रतिबंध ने एक नई करेंसी की तरफ आगे बढ़ने के लिए भारतो को भी प्रोत्साहित किया और भारत ने कई देशों के साथ रुपये में व्यापार शुरू किया है। लिहाजा, माना जा रहा है, कि ब्रिक्स देश एक कॉमन करेंसी में ट्रेड करने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं, जिससे डॉलर को भारी नुकसान होगा।
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