भारत-अमेरिका में सेमीकंडक्टर सेक्टर में बड़ी डील, जानिए एक 'चिप' से कैसे घेरा जाएगा चीन?
अमेरिका ने सेमीकंडक्टर सेक्टर में बादशाहत जमाने के लिए 50 अरब डॉलर के निवेश की घोषणा की है, जबकि चीन का सेमीकंडक्टर सेक्टर भ्रष्टाचार की वजह से काफी नुकसान में है। पिछले साल कई अधिकारी गिरफ्तार किए गये थे।

India-US Semiconductor Deal: इंडो-पैसिफिक में चीन को काउंटर करने के लिए भारत और अमेरिका के बीच तेजी से समझौते किए जा रहे हैं और कई सामरिक और रणनीतिक साझेदारी होने के बाद अब दोनों देशों के बीच सेमीकंडक्टर को लेकर बहुत बड़ा समझौता हुआ है। अमेरिकी वाणिज्य सचिव जीना रायमोंडो और वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के बीच शुक्रवार को हुई बातचीत के बाद, ऐसे संकेत भी मिले हैं, कि अमेरिका की स्वदेशी 5G कनेक्टिविटी कार्यक्रम भारत के लिए अपना प्लेटफॉर्म खोल सकता है।
भारत-अमेरिका के बीच नये समझौते
भारत और अमेरिका के बीच पिछले कुछ सालों से कई अहम समझौते हो रहे हैं, जिनमें टेक्नोलॉजी को लेकर होने वाले समझौते भी शामिल हैं। फिलहाल, अमेरिका की वाणिज्य सचिव जीना रायमोंडो भारत दौरे पर हैं, जहां उनकी मुलाकात भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर से हुई है। इस बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच 'स्ट्रैटजिक ट्रेड डायलॉग' की गई है, जिसमें एक्सपोर्ट कंट्रोल, उच्च टेक्नोलॉजी को लेकर व्यापार बढ़ाने और दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर करने को लेकर बातचीत की गई है। आपको बता दें, कि कुछ साल पहले तक भारत टेक्नोलॉजी खरीद तो लेता था, लेकिन टेक्नोलॉजी के ट्रांसफर की दिशा में ज्यादा काम नहीं करता था, लेकिन अब भारत की ज्यादातर डील में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर अहम हिस्सा रहता है, ताकि मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिल सके।

सेमीकंडक्टर को लेकर अहम बातचीत
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आपको बता दें, कि अमेरिकी कॉमर्स मिनिस्टर का भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ भी बैठक हुई है, हालांकि ये बैठक पूर्व निर्धारित नहीं थी, लेकिन इस बैठक के दौरान चीनी विस्तारवाद, यूक्रेन युद्ध, सप्लाई चेन में विविधता लाने और 'अमित्र देशों' पर टेक्नोलॉजी को लेकर निर्भरता को प्रतिबंधित करने को लेकर अहम बातचीत की गई है। इस बैठक के दौरान दोनों देशों के बीच टेक्नोलॉजी के मामले में पूरी तरह से आत्मनिर्भर बनने को लेकर चर्चा की गई है। पीएम मोदी और अमेरिकी कामर्स मिनिस्टर के बीच हुई बैठक में सबसे बड़ा हाइलाइट सेमीकंडक्टर को लेकर बातचीत थी, जिसपर तत्काल ध्यान देने की बात की गई है। अमेरिकी कॉमर्स मिनिस्टर ने यह भी कहा, कि आपूर्ति श्रृंखला के लिए अन्य इलेक्ट्रॉनिक सामानों के विस्तार की गुंजाइश है। इसके अलावा, अमेरिकी कॉमर्स मिनिस्टर भारत के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर अजीत डोभाल से भी मिली हैं और इस दौरान दोनों के बीच 'ट्रस्टेड वेंडर बेस' के साथ काम करने पर बातचीत की गई है। 'ट्रस्टेड वेंडर बेस' बनाना एक रणनीतिक कदम है, जिससे चीन की 'जासूसी' टेलीकॉम कंपनियां हुआवेई और जेडटीई को बाजार से दूर रखने में बड़ी मदद मिलेगी, जो नेशनल सिक्योरिटी की दिशा में जोखिम हैं।

सेमीकंडक्टर्स पर समझौता कितना महत्वपूर्ण?
सेमीकंडक्टर्स पर समझौता ज्ञापन को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका कोविड के बाद की अवधि में आपूर्ति श्रृंखलाओं को सुरक्षित करने की कोशिश कर रहा है। इसके साथ ही अमेरिका ने सेमीकंडक्टर सेक्टर में अपनी बादशाहत कायम करने के लिए 50 अरब डॉलर के विशालकाय निवेश की घोषणा की है और बकायदा कानून बनाए गये हैं, जिसमें चीन की कई कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। इसके साथ ही अमेरिका की कोशिश चिप सेक्टर में मजबूत सप्लाई चेन का निर्माण करने की है, जिसमें भारत का बहुत बड़ा योगदान रहेगा। वहीं, भारत सरकार ने भी सेमीकंडक्टर सेक्टर में आत्मनिर्भर बनने के लिए बड़े निवेश की घोषणा की है, लिहाजा भारत को अमेरिका से बड़ा फायदा मिल सकता है। आपको बता दें, कि बाइडेन प्रशासन ने पिछले साल चीन में कारोबार करने वाली अमेरिकी कंपनियों पर चीन में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने, सॉफ्टवेयर ट्रांसफर करने और उपकरण ट्रांसफर करने पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिससे चीन को अरबों डॉलर का नुकसान हुआ है। लिहाजा, अब अमेरिकी कंपनियों के लिए भारत ही सबसे बड़ा बाजार बन गया है। वहीं, अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स में ये भी दावा किया गया है, कि आने वाले महीनों में बाइडेन प्रशासन चीन के ऊपर संभावित निवेश पर भी प्रतिबंध लगा सकता है, और भारत के लिए ये एक महान अवसर होगा।

चीन को लेकर अमेरिका का डर क्या है?
अमेरिका की कॉमर्स मिनिस्टर रायमोंडो से जब पूछा गया, कि क्या भारत के साथ सेमीकंडक्टर सेक्टर को लेकर जो समझौते किए गये हैं, वो चीन से अलग होने के प्रयासों का एक हिस्सा था? तो उन्होंने कहा, कि "बीजिंग के साथ व्यापार जारी रहेंगे, लेकिन हमें इस बात का डर है, कि कम्युनिस्ट शासन उस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल आर्मी के लिए कर सकता है। चीन टेक्नोलॉजी का किस तरह से इस्तेमाल करता है, इसको लेकर आशंकाएं हैं।" अमेरिकी कॉमर्स मिनिस्टर ने साफ शब्दों में इस डर को जाहिर किया, कि "अमेरिका, चीन से अलग होने की कोशिश नहीं कर रहा है और ना ही अमेरिका, चीन से टेक्नोलॉजी को लेकर अलग होना चाहता है। लेकिन, हम ये सुनिश्चित करना चाहते है, कि जिन टेक्नोलॉजी में हम आगे हैं, और जहां चीन की स्पष्ट रणनीति उन टेक्नोलॉजी को चीनी सैन्य तंत्र में तैनात करने की है, उन टेक्नोलॉजी के चीन में बिक्री पर हमने प्रतिबंध लगा दिए हैं। और हम आगे भी नियंत्रण लगाएंगे।" उन्होंने कहा, कि "अमेरिका की आंखे खुली हैं, कि चीन की सेना अमेरिकन टेक्नोलॉजी तक पहुंचने की कोशिश में लगी हुई है।"












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