Bangladesh Protest: छात्रों का प्रदर्शन कहीं शेख हसीना की गद्दी ना उड़ा दे! जानिए कितनी खतरनाक है ये हताशा?
Bangladesh Student Protests: बांग्लादेश में उथल-पुथल मची हुई है और हजारों छात्रों के सड़कों पर उतरने के बाद बांग्लादेश में हुए विरोध प्रदर्शनों में कम से कम 39 लोगों की मौत हो गई है। विरोध प्रदर्शन तब शुरू हुए, जब देश की सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में कोटा सिस्टम को फिर से बहाल कर दिया।
ये विरोध प्रदर्शन बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के लोकसभा चुनाव में लगातार चौथी बार जीतने के छह महीने से भी कम समय बाद शुरू हो गये हैं और इस विरोध प्रदर्शन की ताकत इतनी ज्यादा आकी जा रही है, कि ये शेख हसीना सरकार को अपनी हवा में उड़ा भी सकता है!

इस विरोध प्रदर्शन की ताकत कितनी है?
ये विरोध प्रदर्शन बांग्लादेश की सरकारी नौकरियों में दिए जा रहे आरक्षण के खिलाफ है, जिसे 2018 में शेख हसीना की सरकार ने ऐसे ही एक विरोध प्रदर्शन के बाद रोक दिया था, लेकिन इस महीने सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कोटा को वैध माना और फिर से बहाल कर दिया।
हालांकि, विरोध की आग भड़कने के बाद सरकार ने अस्थाई तौर पर इसे फिर से रोक दिया है, लेकिन छात्रों की मांग है, कि हमेशा के लिए इस समस्या का समधान होना चाहिए।
द डिप्लोमैट के मुताबिक, 5 जुलाई को एक सुप्रीम कोर्ट ने कोटा प्रणाली को बहाल कर दिया, जिसे हसीना सरकार ने 2018 में खत्म कर दिया था। माना जाता है, कि उस समय शेख हसीना छात्रों के प्रति सहानुभूति रखती थीं, लेकिन अब जब देश में विपक्ष को रीढ़ विहीन कर दिया गया है और 6 महीने पहले ही इलेक्शन हो चुके हैं, तो शेख हसीना को लगता है, कि वो इस प्रदर्शन को कुचल सकती हैं और उनके पास इतना वक्त होगा, कि अगले चुनाव से पहले इस समस्या को सुलझा लें।
छात्रों का कहना है, कि ये कोटा उन लोगों को मिलता है, जो शेख हसीना के कोर वोटर्स हैं।
प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 2018 में कहा था, कि "इसमें गुस्सा होने जैसी कोई बात नहीं है। छात्र [कोटा समाप्त करने] की मांग कर रहे हैं और मैं इसे पूरी तरह से स्वीकार करती हूं।"
कोटा 1971 में पाकिस्तान से आज़ादी की लड़ाई में भाग लेने वाले स्वतंत्रता सेनानियों के परिजनों के लिए सरकारी नौकरियों में 30 प्रतिशत आरक्षित करता है। कोटा को लेकर ये नियम 1972 में शेख हसीना के पिता शेख मुजीबुर रहमान ने पेश किए लागू किए थे, जो बांग्लादेश के संस्थापक पिता थे और जिन्होंने इसके स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया था।
उसके बाद से बांग्लादेश की कोटा प्रणाली कई बदलावों से गुजरी है।
2018 में जब इसे खत्म किया गया, तब तक विभिन्न कोटा के तहत 56 प्रतिशत सरकारी नौकरियां आरक्षण के तहत दी जाने लगी थीं।
इसमें स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों जैसे समूह शामिल थे, जिनमें महिलाओं और अविकसित जिलों के लोगों को दसवां हिस्सा मिलता था, जिसमें पांच प्रतिशत स्वदेशी समुदायों को और एक प्रतिशत विकलांगों को आवंटित किया जाता था।
प्रदर्शनकारी छात्र चाहते हैं, कि अंतिम दो श्रेणियों को छोड़कर सभी श्रेणियों के आरक्षण को खत्म कर दिया जाए।
न्यूज18 के मुताबिक, छात्रों का कहना है कि हसीना सरकार सरकारी पदों पर सत्तारूढ़ अवामी लीग के वफादार लोगों को नियुक्त करने के लिए कोटा प्रणाली का इस्तेमाल करती है।
बांग्लादेश सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है, जो 7 अगस्त को याचिका पर सुनवाई करेगी।
लेकिन छात्र, जो इस बात पर जोर देते हैं कि यह पर्याप्त नहीं है, वो अब सड़कों पर उतर आए हैं।
ये हिंसा उस वक्त भड़क उठी, जब शेख हसीना की पार्टी के छात्र संगठन और प्रदर्शनकारी छात्रों के बीच टकराव शुरू हो गया, जिसमें 39 लोग मारे गये हैं। आरोप है, कि पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर सीधी गोलियां चलाईं हैं, जो मानवाधिकार का गंभीर उल्लंघन है।
वहीं, चीन का दौरा बीच में ही खत्म कर देश वापस लौंटी शेख हसीना के बयान ने इस प्रदर्शन की आग में घी डालने का काम किया है।
द डिप्लोमैट के मुताबिक, हसीना ने चीन की अपनी यात्रा के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, कि "उनमें (प्रदर्शनकारियों में) स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति इतनी नाराजगी क्यों है? अगर स्वतंत्रता सेनानियों के पोते-पोतियों को कोटा का लाभ नहीं मिले, तो क्या रजाकारों के पोते-पोतियों को इसका लाभ मिलना चाहिए?"
"रजाकार" उन लोगों के लिए एक अपमानजनक शब्द है, जिन पर 1971 में बांग्लादेश को धोखा देने के लिए पाकिस्तान की सेना के साथ सहयोग करने का आरोप है।

द डिप्लोमैट के मुताबिक, इस बयान के बाद ढाका विश्वविद्यालय के हजारों छात्र सड़कों पर उतर आए।
उन्होंने नारे लगाए, कि "मैं कौन हू, रजाकार, आप कौन हैं, रजाकार, रजाकार.. रजाकार। यह किसने कहा? यह किसने कहा? तानाशाह। तानाशाह।"
इस हफ्ते हजारों आरक्षण विरोधी प्रदर्शनकारियों और हसीना की अवामी लीग पार्टी के छात्र विंग के सदस्यों के बीच झड़पों के बाद विरोध प्रदर्शन हिंसक हो गए।
न्यूज18 के मुताबिक, प्रदर्शन का नेतृत्व कॉलेज यूनियनों का एक गठबंधन कर रहा है, जिसका नाम स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन है।
अधिकारियों ने अशांति को शांत करने के लिए देश में मोबाइल इंटरनेट सेवाओं को काट दिया है।
न्यूज18 ने बांग्लादेशी समाचार चैनल एकटर टीवी के हवाले से कहा है, कि सड़कों के ब्लॉक होन और इंटरनेट बंद होने से आम आदमी को भारी परेशानी उठाना पड़ रहा है।
बांग्लादेशी समाचार आउटलेट BD24 ने कहा कि प्रदर्शनकारियों द्वारा 'पूर्ण बंद' के आह्वान के बाद ढाका में 'सार्वजनिक परिवहन संकट' देखा जा रहा है।
पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए रबर की गोलियां चलाईं और साउंड ग्रेनेड और आंसू गैस के गोले फेंके हैं। लेकिन, प्रदर्शनकारियों ने रेलवे ट्रैक और प्रमुख सड़कों को भी ब्लॉक कर दिया है।
सिर्फ गुरुवार को ही हिंसा में 13 लोगों की मौत हो गई। ये बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शनों में अब तक की सबसे खराब हिंसा का दिन था, जब लाठी और पत्थरों से लैस हजारों छात्रों ने ढाका में सशस्त्र पुलिस के साथ झड़प की।
अधिकारियों ने रॉयटर्स को बताया है, कि इनमें एक बस चालक शामिल था, जिसे सीने में गोली लगने के बाद अस्पताल ले जाया गया, जबकि एक रिक्शा चालक और तीन छात्रों की भी मौत हुई है।
राजधानी का मुख्य विश्वविद्यालय परिसर राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों का केन्द्र बन गया है, लेकिन गुरुवार से शहर के अन्य इलाकों में भी तेज प्रदर्शन शुरू हो गये हैं।
बातचीत के लिए तैयार हुई सरकार
इस बीच आज कानून मंत्री अनिसुल हक ने कहा कि सरकार प्रदर्शनकारियों से बातचीत करने को तैयार है। लेकिन प्रदर्शनकारियों ने यह कहते हुए इनकार कर दिया, कि "चर्चा और गोलीबारी एक साथ नहीं हो सकती"।
छात्र नेता नाहिद इस्लाम ने रॉयटर्स को बताया है, कि "हम चर्चा करने के लिए शवों को रौंद नहीं सकते। चर्चा पहले भी हो सकती थी।"
बुधवार से सभी सार्वजनिक और निजी विश्वविद्यालय अनिश्चित काल के लिए बंद कर दिए गए हैं और व्यवस्था बनाए रखने के लिए कैंपस में सुरक्षा बलों को तैनात किया गया।

शेख हसीना सरकार के लिए कितनी बड़ी चुनौती?
शेख हसीना चुनाव जरूर जीती हैं, लेकिन इस चुनाव में विपक्षी पार्टी बांग्लादेश नेशनल पार्टी (BNP) ने भाग नहीं लिया था। लिहाजा, वो इस बात से अनजान हैं, कि उनकी सरकार को लेकर देश का मूड क्या है?
शेख हसीना ने प्रदर्शनों में मारे गए लोगों के लिए न्याय का वादा किया है।
लेकिन स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन ने कहा है, कि उनके शब्द निष्ठाहीन हैं और उन्होंने समर्थकों से आगे बढ़ने का आग्रह किया। विरोध प्रदर्शनों के समन्वयकों में से एक, आसिफ महमूद ने एएफपी को बताया, "यह बयान उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा की गई हत्याओं और उत्पात को नहीं दर्शाता है।"
द डिप्लोमैट में छपे एक लेख में कहा गया है, कि दोनों विरोध प्रदर्शनों के बीच स्पष्ट अंतर बांग्लादेश में 'परिवर्तन की हवा' का संकेत है।
लेख में बताया गया है, कि किस तरह छात्र प्रधानमंत्री शेख हसीना को तानाशाह कह रहे हैं और किस तरह सोशल मीडिया पर हर तबके के लोगों की ओर से अवामी लीग विरोधी पोस्ट की भरमार है।
लेख में कहा गया है, "लेखन, कैरिकेचर, वीडियो, फोटो और अन्य माध्यमों से बांग्लादेशी अवाम, खास तौर पर छात्र, सीधे प्रधानमंत्री को तानाशाह कह रहे हैं।" प्रदर्शनकारियों और आलोचकों का कहना है, कि स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के लिए 30 प्रतिशत कोटा अवामी लीग के समर्थकों के पक्ष में है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व किया था।
विशेषज्ञ निजी क्षेत्र में नौकरियों की कमी को भी अशांति का कारण मानते हैं।
जबकि, सरकारी नौकरियों में मोटी तनख्वाह के साथ साथ काफी सुख सुविधाएं मिलती हैं, जो छात्रों को सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए उत्साहित करता है, लेकिन रिजर्वेशन की वजह से ज्यादातर योग्य उम्मीदवारों को नुकसान होता है।
इसने उच्च युवा बेरोजगारी से जूझ रहे छात्रों के बीच गुस्सा भड़का दिया है, क्योंकि 17 करोड़ की आबादी में से लगभग 3 करोड़ 20 लाख युवा बेरोजगार हैं। कभी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक रही बांग्लादेशी अर्थव्यवस्था अब स्थिर हो गई है, मुद्रास्फीति 10 प्रतिशत के आसपास है और डॉलर का भंडार घट रहा है।
द वायर में छपे एक लेख में तर्क दिया गया है कि विरोध प्रदर्शन अब कोटा सुधारों के आह्वान से आगे बढ़ गए हैं।
लेख में कहा गया है, कि "अब वे कहते हैं, कि वे व्यवस्था में पूर्ण बदलाव चाहते हैं, लगातार तीन विवादित चुनावों के कारण खोए गए अपने मताधिकार की बहाली चाहते हैं, और लोकतंत्र में समान नागरिक के रूप में मान्यता चाहते हैं, जो "सत्तावादी" शासन ना होकर प्रजातांत्रितक हो। लेख में आगे कहा गया है, कि छात्र "उस गरिमा को पुनः प्राप्त करना चाहते हैं, जिसे वे मानते हैं कि बांग्लादेश के लोगों ने सामूहिक रूप से शेख हसीना के कार्यकाल के दौरान खो दिया है।"
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