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नज़रिया: ‘बंटवारे में जिन्ना को खलनायक बना दिया गया’

By Bbc Hindi
मोहम्मद अली जिन्ना
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मोहम्मद अली जिन्ना

बाक़ी नेताओं को अगर अलग हटा दिया जाए तो मुझे लगता है कि पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ऐसे नेता थे जो सिर्फ़ अपना भला नहीं सोचते थे. वह समुदाय के एक बड़े तबके के फ़ायदे के लिए सोच रहे थे और उन्होंने वो सब किया भी जो वह कर सकते थे.

जिन्ना में ईमानदारी दिखती है क्योंकि उनको अंग्रेज़ ख़रीद नहीं सके. आख़िरकार मैं उनमें न ही कोई ख़लनायक देखती हूं और न ही कोई हीरो.

लेकिन जिन्ना एक प्रकार के राष्ट्रवादी भी थे. मैं कोई इतिहासकार नहीं हूं और जब जिन्ना पर मैंने कुछ लिखने का सोचा तब तक मैं उनके बारे में कुछ भी नहीं जानती थी. उनको लेकर मेरा दिमाग़ एक खाली स्लेट की तरह था. इतिहास की किताब में जो कुछ लिखा था, उससे आमतौर पर ऐसा लगता था कि वह शांति के लिए एक खलनायक की तरह थे.

मैंने जब कुछ और किताबें पढ़नी शुरू कीं तो मुझे हैरत हुई कि वह 1930 तक बिलकुल वैसे नहीं थे. 1929 में उनकी पत्नी रती जिन्ना का निधन हो गया. 1930 तक की उनकी राजनीति का मैंने करीबी अध्ययन किया है. इस दौरान पाया कि वह लगातार कांग्रेस से बात करने के मौके तलाश रहे थे.

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जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना
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जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना

1930 के बाद उनको लेकर जो कुछ हुआ वह काफ़ी भ्रामक है. मुझे लगता है, शायद वह अंग्रज़ों के साथ एक जुआ खेल रहे थे. यह भी कहा जा सकता है कि अंग्रेज़ों ने बंटवारे में बड़ी भूमिका निभाई और वह ख़ुद को इससे अलग रखने के लिए जिन्ना को दोष देना चाहते थे.

देश के बंटवारे में जिन्ना को खलनायक बना दिया जाता है, उसमें भारतीय नेताओं की बात क्यों नहीं होती क्योंकि वे भी तो समझौते में शामिल थे.

बाद के सालों में जिन्ना ने अपने भाषणों में कहा था कि उन्होंने कांग्रेस से मुसलमानों के लिए कुछ रियायतों की 'भीख' मांगी और कांग्रेस के साथ जुड़ने का प्रस्ताव दिया लेकिन उनकी मांगें नहीं मानी गईं. हो सकता है वह सही हों. मैं दावा नहीं करती क्योंकि मैं कोई इतिहासकार नहीं हूं.

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मोहम्मद अली जिन्ना
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मोहम्मद अली जिन्ना

अमीर आदमी नहीं थे वो

जिन्ना को लेकर पहला भ्रम है कि वो बड़े अभिजात्य वर्ग से थे. उन्होंने अपने दम पर पैसा कमाया था. उनके पिता एक असफ़ल कारोबारी थी. जिन्ना शुरुआती जीवन में ही दिवालिया हो गए थे और उनके परिवार का दायित्व उन पर था.

लंदन में उन्होंने अपने पैसों से पढ़ाई की और अपना ख़र्चा चलाया. इसके बाद बॉम्बे आकर वक़ालत की और पहले सफ़ल मुस्लिम बैरिस्टर बने.

महात्मा गांधी से हटकर नेता के रूप में उन्होंने ख़ुद की अलग छवि गढ़ी. वह मुसलमानों को दिखाना चाहते थे कि अपने दम पर सफ़ल होना नामुमकिन नहीं है. उन्होंने जानबूझकर एक ऐसी व्यक्ति की छवि बनाई जिसके पास बड़ा घर और कई गाड़ियां हैं. इसी वजह से उनकी और गांधी की राजनीति में अंतर है.

जिन्ना ने साफ़तौर से कहा था कि उनकी भूमिका एक राजनेता की है न कि एक समाजसेवक की. इसी कारण वो कई चीज़ों को लेकर साफ़ थे. पंजाब के मुसलमान नेताओं के साथ बैठक में जहां बाक़ी साथी नेता नींबू पानी पिया करते थे, वो वहीं मुसलमान नेताओं के सामने व्हिस्की पीते थे.

हालांकि, वो मुसलमानों के इकलौते नेता थे.

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ख़ुद को सिर्फ़ मुसलमान मानते थे

वह पैदाइशी खोजा इस्माइली मुस्लिम थे. जिन्हें अधिकतर मुसलमान मुस्लिम ही नहीं मानते हैं. उनके पिता जब कच्छ से कराची गए तो वह बाक़ी मुसलमानों के संपर्क में आए और अपने बच्चों को इस्लामी शिक्षा भी देने लगे.

उनके पिता जिस गांव से आए थे वहां इस्लामी शिक्षा अधिक नहीं थे लेकिन कराची आने के बाद उन्होंने घर में कुरआन भी पढ़वाना शुरू किया.

लंदन से आने के बाद जिन्ना ने शिया समुदाय में सुधारवादी आंदोलन की शुरुआत की. उन्होंने अपने पिता को भी इसमें शामिल किया. एक तरह से यह उनकी राजनीति की भी शुरुआत थी.

इसी दौरान उन्होंने अपनी बहन की शादी एक शिया समुदाय में की. इसी कारण वह कहते थे कि वह किसी पंथ से नहीं हैं और वह केवल मुस्लिम हैं. उन्होंने किसी भी पंथ के रूप में अपनी पहचान को छोड़ दिया और इस बात को उन्होंने दस्तावेज़ में भी दर्ज किया है.

जिन्ना एक तरह से असफ़ल रहे. वह जिस तरह का पाकिस्तान चाहते थे वैसा नहीं बन पाया. मुझे लगता है कि वह गांधी के साथ कुछ एक जैसे गुणों को साझा करते थे लेकिन उनमें गांधी जैसी विनम्रता नहीं थी.

वह अपनी असफ़लताओं को स्वीकार नहीं करते थे और शायद उनके पतन का कारण भी वही था.

(बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद से बातचीत पर आधारित.)

BBC Hindi
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English summary
Attitude Jinnah was made a villain in the split

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