क्या अंग्रेज़ी न आने के कारण होते हैं प्लेन क्रैश?
नेपाल की राजधानी काठमांडु में सोमवार को हुए विमान हादसे की पुख़्ता वजह अब तक सामने नहीं है.
लेकिन त्रिभुवन एयरपोर्ट पर यूएस-बांग्ला' एयरलाइंस की फ़्लाइट BS211 के क्रैश में पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोलर के बीच सूचनाओं का सही ढंग से आदान-प्रदान न होना एक वजह बताया जा रहा है.
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'यूएस-बांग्ला' के सीईओ आसिफ़ इमरान ने दावा किया है कि पायलट को गलत दिशा से रनवे से घुसने के लिए कहा गया था. हालांकि, अब तक ब्लैक बॉक्स से इस तरह की जानकारी सामने नहीं है.
लेकिन, उड्डयन के क्षेत्र में ये पहला मामला नहीं है जब एटीसी और पायलट के बीच सूचनाओं के आदान-प्रदान में कमी से विमान हादसा हुआ हो.
ऐसी ही एक घटना के गवाह रहे एयर इंडिया के कैप्टन महेश गुलबानी ने बीबीसी को बताया, "एक बार की बात है, हम चीनी एयरस्पेस में करीब 38 से 40 हज़ार फुट की ऊंचाई पर उड़ रहे थे. और हमें नीचे जाना था. क्योंकि विमान टर्ब्युलेंस में उड़ रहा था. हमने एयर ट्रैफिक कंट्रोलर से निवेदन किया कि हमें बहुत झटके लग रहे हैं, इसलिए थोड़ा नीचे आने दिया जाए."
"इस पर कंट्रोलर ने कहा कि 'लेवल मैंटेन' रखें, उसने हमें नीचे नहीं आने दिया, वह हमसे अंग्रेजी में बात नहीं कर पाया कि नीचे न आएं. हमनें उससे सवाल पूछा कि क्यों नीचे नहीं आ सकते. इसके बाद भी वह बोलता रहा कि "प्लीज़ मैंटेन लेवल".
"ऐसे में हमें इमरजेंसी कॉल लिया क्योंकि हम उस ऊंचाई में नहीं उड़ पा रहे थे. इसके बाद उसे हमारी बात समझ में आई. इन कंट्रोलरों को अंग्रेजी के चार या छह फ्रेज़ आते हैं...जैसे हम इस स्पीड पर हैं, हाइट पर हैं, ऐसे में अगर आप जरा भी हटकर कुछ बोलते हैं तो उन्हें समझ नहीं आता."
गुलबानी बताते हैं, "ये अक्सर देखने को मिलता है. मसलन बैंकॉक में अंग्रेजी बोलते वक्त आर शब्द का उच्चारण नहीं करते और वे कतार एयरलाइंस को कताल एयरलाइंस कहते हैं. "
जब भारत में हुआ ऐसा ही हादसा
साल 1996 में दिल्ली में इस वजह से ही 312 यात्रियों की मौत हुई थी.
इस हादसे में नई दिल्ली हवाई अड्डे पर उतरने से पहले ही सोवियत एयरलाइंस और सऊदी अरब के विमान के बीच हवा में हादसा हो गया.
इस मामले की जांच में सामने आया कि सोवियत विमान द्वारा दिल्ली एयरपोर्ट के एयर ट्रैफिक कंट्रोलर की बात नहीं समझ पाना इस हादसे की मुख्य वजह रही.
जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट में ये भी सलाह दी थी कि भारतीय एयरपोर्ट प्राधिकरण को ये सुनिश्चित करना चाहिए कि सिर्फ अंग्रेजी बोलने और समझने में सक्षम एयरलाइंस क्रू को ही लैंड करने की अनुमति मिलनी चाहिए.
क्या कहती है नासा की रिपोर्ट?
अमरीकी स्पेस एजेंसी नासा ने इस मुद्दे पर साल 1981 में एक रिपोर्ट पेश की थी.
इस रिपोर्ट में नासा के एविएशन सेफ़्टी रिपोर्ट सिस्टम में पांच साल के अंदर हवाई यात्राओं में गड़बड़ियों के 28 हज़ार मामले दर्ज कराए गए.
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नासा ने इन मामलों का अध्ययन करके पाया कि 28000 मामलों में से 70 फीसदी मामलों में गड़बड़ियों के लिए सूचनाओं के आदान-प्रदान में कमियां ज़िम्मेदार थे.
विमान और कंट्रोलर के बीच बातचीत में कई बार ये भी देखा गया है कि दोनों में से एक या दोनों पक्ष अपनी क्षेत्रीय भाषा में बोलना शुरू कर देते हैं.
मसलन उच्चारण में दोष की वजह से अंग्रेजी भाषा के 'Two' शब्द को 'To' समझ लिया जाता है.
ऐसे में अंग्रेजी बोलने वाले पायलट या कंट्रोलर को अपनी बात पहुंचाने में दिक्कत होती है.
क्या है इस समस्या का समाधान?
सूचनाओं के आदान-प्रदान में भाषागत दिक्कतों को दूर करने के लिए कमर्शियल फ़्लाइट के पायलटों के लिए अंग्रेजी भाषा की परीक्षा देनी होती है.
कमर्शियल फ़्लाइट उड़ाने वाले एक पायलट ने नाम ना बताने की शर्त बताया, "कमर्शियल फ़्लाइंग लाइसेंस के लिए रेडियो टेलिफोनिक टेस्ट देना होता है. इसमें एविएशन क्षेत्र के मानकों के आधार पर अंग्रेजी की परीक्षा होती है. और डीजीसीए द्वारा इस टेस्ट को लिया जाता है. भारत की बात करें तो यहां पर ये टेस्ट सबसे कठिन तरह से होता है"












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