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क्या युद्ध की कगार पर खड़े हैं अमरीका और ईरान

By Bbc Hindi
अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन
AFP/Getty Images
अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन

अमरीका ने ईरान को एक 'स्पष्ट और सीधा' संदेश देने के लिए मध्य पूर्व में अपना एक यद्धपोत तैनात किया है.

अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने कहा है कि ट्रंप प्रशासन ने ये फ़ैसला 'कई परेशान करने वाले और उकसाने वाले संकेतों और चेतावनियों के जवाब में' लिया है.

एक अमरीकी अधिकारी ने नाम न लेने की शर्त पर बताया कि ईरान में मौजूद अमरीकी सुरक्षाबलों के ठिकानों पर हमले की आशंका जताई जा रही थी इस कारण अमरीका ने ये कदम उठाया है.

जॉन बोल्टन ने कहा कि वो किसी भी तरह के हमले का जवाब 'पूरे ज़ोर-शोर' से देंगे.

बोल्टन ने अपने एक बयान में कहा, "अमरीका यूएसएस अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप और एक बॉम्बर टास्क फ़ोर्स को अमरीका के 'सेंट्रल कमांड' क्षेत्र में भेज रहा है. हम ऐसा ईरानी शासन को एक स्पष्ट और सीधा संदेश देने के लिए कर रहे हैं. संदेश ये है कि अगर अमरीका या उसके सहयोगियों पर किसी तरह का हमला हुआ तो हम उसका मुंहतोड़ जवाब देंगे."

बोल्टन ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, "अमरीका ईरान के साथ युद्ध नहीं चाहता लेकिन हम किसी भी तरह के हमले का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, चाहे ये इस्लामिक रेवोल्यूशनरी गार्ड्स या ईरान की सेना द्वारा शुरू किया गया छद्म युद्ध ही क्यों न हो."

इससे पहले अमरीका ईरान के एलीट रिवोल्यूशनरी गार्ड को 'विदेशी आतंकवादी संगठन' कह चुका है.

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AFP
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फ़िलहाल अमरीका द्वारा ईरान की कार्रवाइयों के बारे गए लगाए आरोपों के बारे में कोई विस्तृत जानकारी नहीं है. हमें ठीक से नहीं पता कि अमरीका की ओर जारी की गई चेतावनी और युद्धपोत तैनात किए जाने के पीछे असल में क्या वजह है.

वैसे खाड़ी देशों में किसी एयरक्राफ़्ट कैरियर और इसकी युद्धक टुकड़ी का भेजा जाना असामान्य नहीं है. हालांकि इन क्षेत्रों में ज़मीन और हवा में मार करने वाले हथियारों को फिर से भेजा जाना थोड़ा असामान्य है.

हाल के महीनों में अमरीका ख़ुद ही ईरान पर दबाव बना रहा है. फिर चाहे वो ईरान के एलीट रिवोल्यूशनरी गार्ड को 'विदेशी आतंकवादी संगठन' कहना हो या फिर इस पर पाबंदियां लगाना.

हालांकि इन सबके बावजूद ट्रंप प्रशासन का मकसद साफ़ नहीं है. ट्रंप के प्रवक्ता ज़ोर देकर कहे हैं कि अमरीका ईरान के साथ युद्ध नहीं चाहता लेकिन साथ ही वो ईरान में सत्ता परिवर्तन कराने की अपनी प्रबल इच्छा को मुश्किल से छिपा पाते हैं.

अमरीका ने मध्य पूर्व में अपना युद्धपोत ऐसे वक़्त में भेजा है जब उसके और ईरान के रिश्ते पहले से तनावपूर्ण हैं.


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इससे पहले अमरीकी विदेश माइक पोम्पियो ने अपने यूरोप दौरे पर पत्रकारों से कहा था, "हमने ईरान की तरफ़ से उकसाने वाले कदम निश्चित तौर पर देखे हैं और हम ख़ुद पर होने वाले किसी भी तरह के हमले के लिए उन्हें ज़िम्मेदार ठहराएंगे."

हालांकि पोम्पियो ने ये स्पष्ट नहीं किया कि वो किन 'उकसाने वाली कदमों' के बारे में बात कर रहे थे.

एक तरफ़ जहां अमरीका अपने सहयोगी देशों को ईरान से तेल न खरीदने पर मजबूर करके ईरान की अर्थव्यवस्था को धराशायी करना चाहता है वहीं ईरान का कहना है कि वो किसी भी हालत में झुकने वाला नहीं है.

अमरीका पिछले साल ईरान समेत छह देशों के बीच हुई परमाणु संधि से बाहर हो गया था.

राष्ट्रपति ट्रंप के इस समझौते को रद्द करने के पीछे ये वजह बताई जा रही थी कि वो साल 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के समय ईरान से हुई संधि से ख़ुश नहीं थे.

इसके साथ ही अमरीका ने यमन और सीरिया युद्ध में ईरान की भूमिका की आलोचना भी की थी.

ट्रंप प्रशासन को उम्मीद है कि वो ईरान सरकार को नया समझौता करने के लिए मजबूर कर लेंगे और इसके दायरे में सिर्फ़ ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही नहीं बल्कि बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम भी होगा.

अमरीका का ये भी कहना है कि इससे मध्य पूर्व में ईरान का "अशिष्ट व्यवहार" भी नियंत्रित होगा.

वहीं, ईरान ने अमरीकी पाबंदियों को ग़ैरक़ानूनी बताया है.

ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़
Reuters
ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़

ईरानी मीडिया के मुताबिक़, अमरीका के ऐलान के जवाब में ईरान के विदेश मंत्री मोहम्मद जवाद ज़रीफ़ ने कहा है कि उनके पास अमरीकी प्रतिबन्धों का जवाब देने के लिए कई विकल्प हैं.

जवाद जरीफ़ ने कहा कि ईरान कई विकल्पों पर विचार कर रहा है और इनमें 'परमाणु अप्रसार संधि' से अलग होना भी शामिल है. उन्होंने कहा कि अगर ईरान को उसका तेल बेचने से रोका गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे.

इस बीच ईरान के शीर्ष जनरल ने चेतावनी दी है कि अगर ईरान 'और ज़्यादा विद्वेष का सामना करना पड़े तो वह सामरिक रूप से महत्वपूर्ण होरमुज़ जलसंधि मार्ग को बंद कर सकता है.

उन्होंने कहा, "अगर हमारे तेल के जहाज जलसंधि से नहीं जाएंगे तो निश्चित तौर पर बाकी देशों के तेल के जहाज भी जलसंधि को पार नहीं कर पाएंगे."

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BBC Hindi
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English summary
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