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'आयरन डोम' के बाद अब नया एयर डिफेंस सिस्टम 'लेजर वॉल' ला रहा है इस्राएल

जेरूसलम, 2 फरवरी। इस्राएल के प्रधानमंत्री नफताली बेनेट ने माना है कि मिसाइलों से सुरक्षा करने वाला उनका 'आयरन डोम डिफेंस सिस्टम' काफी महंगा है और इस्राएल जल्द ही इसकी जगह लेजर टेक्नोलॉजी वाला डिफेंस सिस्टम तैनात करेगा. बेनेट ने बताया कि नई जेनरेशन की यह टेक्नोलॉजी 'लेजर वॉल' दक्षिणी इस्राएल में अगले साल तक प्रयोग में लाई जा सकती है.

लेजर वॉल तकनीक के बारे में अभी ज्यादा जानकारी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे मिसाइलों, रॉकेट और ड्रोन से सुरक्षा देने में सक्षम बताते हैं. इसे जमीन, हवा या समंदर में तैनात किया जा सकता है. ऊंचाई वाले इलाकों और बुरे मौसम में भी यह कारगर हो सकता है. यह दुश्मन की ओर से दागी गईं मिसाइलों का हवा में ही पता लगा सकता है और यह इस्राएल के मौजूदा डिफेंस सिस्टम 'आयरन डोम' से सस्ता पड़ेगा.

आयरन डोम अपनी ओर आती मिसाइलों को हवा में ही नष्ट कर देता है, जिससे जान-माल का नुकसान नहीं होता.

सस्ते एयर डिफेंस सिस्टम की जरूरत क्यों?

बेनेट मंगलवार को इस्राएल की तेल अवीव यूनिवर्सिटी के इंस्टिट्यूट फॉर नेशनल सिक्योरिटी स्टडीज में बात कर रहे थे. यहां बेनेट बता रहे थे कि इस्राएल ईरान को घेरने की कोशिशों और इस्राएली इन्फ्रास्ट्रक्चर को सस्ते में नुकसान पहुंचाने में सक्षम गुरिल्ला लड़ाकों को लेकर क्या कर रहा है. बेनेट के मुताबिक इस नई टेक्नोलॉजी का मकसद इस्राएल के मौजूदा आयरन डोम और दूसरे सुरक्षा तंत्रों की मदद करना है. वह कहते हैं कि इसे सबसे पहले दक्षिण में तैनात किया जाएगा, जिधर गजा है.

बेनेट ने कहा, "गजा से कोई भी कुछ सौ डॉलर में एक रॉकेट इस्राएल की ओर दाग सकता है, जिसे रोकने में हमें हजारों डॉलर खर्च करने पड़ते हैं. मई में हमास ने हम पर 4,000 से ज्यादा रॉकेट दागे थे. हम यह समीकरण बदलना चाहते हैं. इसमें हम ईरान के रिंग ऑफ फायर को नाकाम कर सकते हैं. यह एयर डिफेंस सिस्टम इलाके में हमारे साथियों की मदद भी कर सकता है, जो ईरान से खतरे का सामना कर रहे हैं."

इस्राएल के सुरक्षा अधिकारियों ने पिछले साल जून में अनुमान लगाया था कि यह नया सुरक्षा सिस्टम 2025 तक प्रयोग में आ जाएगा. हालांकि, अब उन्होंने इसे एयरक्राफ्ट पर तैनात करके इसका सफल परीक्षण करने की बात कही है. उनके मुताबिक यह मानवरहित एयरक्राफ्ट को रोकने में सक्षम है. साथ ही, यह लंबी और मध्यम दूरी की मिसाइलों और ड्रोन को रोकने में कारगर होगा. प्रधानमंत्री बेनेट ने कहा है कि सेना एक साल के भीतर ही इसका इस्तेमाल करने लगेगी.

नए एयर डिफेंस सिस्टम का मकसद क्या है?

इकलौता मकसद है सुरक्षा और कम लागत में सुरक्षा. इस्राएल को सबसे ज्यादा चिंता ईरान और हमास से है. इस्राएल के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार रहे याकोव एमिडरर कहते हैं कि ईरान अपने रॉकेटों को 'गाइडेड मिसाइल' के तौर पर विकसित कर रहा है और वह मध्य पूर्व में इस्राएल के चारों तरफ मिसाइलें तैनात करके उसे घेरना चाहता है. याकोव इसे 'ईरान की रिंग ऑफ फायर' नाम देते हैं.

इस आकलन के पीछे तर्क दिया जाता है कि ईरान लेबनान में हिजबुल्लाह, सीरिया में लड़ाकों और गजा में हमास की हथियारों से मदद कर रहा है. इस्राएली जानकार यह तर्क भी देते हैं कि अगर ईरान इस्राएल को घेरने में कामयाब हो गया, तो इसके परमाणु कार्यक्रम को रोकना नामुमकिन होगा. ऐसे में इस्राएल की निगाहें व्यापक सुरक्षा देने वाली ऐसी तकनीक पर है, जो विरोधियों से सस्ते में निपटने में कारगर सिद्ध हो और जो सहयोगी देशों को बेची भी जा सके.

आयरन डोम का इतिहास क्या कहता है?

2006 में जब इस्राएल का इस्लामी गुट हिज्बुल्लाह से संघर्ष हुआ, तो हिज्बुल्लाह की ओर से दागे गए हजारों रॉकेट ने उसे भारी नुकसान पहुंचाया. दर्जनों इस्राएली मारे गए. तब इस्राएल ने ऐसी तकनीक पर काम शुरू किया, जो हवाई हमलों से इसकी रक्षा कर सके. फिर अमेरिका की मदद से इस्राएल ने एक मिसाइल डिफेंस सिस्टम विकसित किया, जिसे अप्रैल 2011 में तैनात किया गया. इसका नाम था आयरन डोम.

यह सिस्टम पता लगा सकता है कि इस्राएल के शहरों को निशाना बनाकर दागी दागी कौन सी मिसाइल रिहायशी इलाकों में गिर सकती है. फिर यह सिस्टम उस मिसाइल को हवा में ही नष्ट कर देता है. 2011 से अब तक इस्राएल के जितने भी हथियारबंद संघर्ष हुए हैं, उनमें आयरन डोम उसके लिए रक्षा कवच साबित हुआ है. इससे जान-माल का नुकसान काफी कम हुआ है, लेकिन यह सिस्टम अपने आप में काफी महंगा है.

हालांकि, इसकी सफलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस्राएली सेना खुद कहती है कि गजा पट्टी पर अब तक जो चार युद्ध हुए हैं, उनमें आयरन डोम मिसाइल नष्ट करने में 90 फीसदी सफल रहा है. पिछले साल इस्राएल और फलस्तीनी संगठनों के संघर्ष में इस्राएल पर हजारों रॉकेट दागे गए थे, लेकिन नुकसान फलस्तीनियों को ही ज्यादा उठाना पड़ा था, क्योंकि उनके पास इस्राएली रॉकेटों से बचने का कोई रास्ता नहीं था.

Source: DW

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