भारतीय रुपया जल्द बनेगा Global करेंसी, कारोबार के लिए 8 देश हुए तैयार, 6 महीने में खुले 49 वोस्ट्रो खाते
भारत में खोले गए 49 वोस्ट्रो अकाउंट्स में रूस, मॉरीशस, श्रीलंका, मलेशिया, म्यांमार, सिंगापुर, इजराइल और जर्मनी के बैंक शामिल हैं, जो कि रुपये में इन देशों के साथ व्यापार करने की सुविधा प्रदान करेंगे।

Image: Oneindia
भारतीय मुद्रा तेजी से इंटरनेशनल करेंसी बनने की राह पर है। भारत ने कुछ ही महीनों में 8 देशों के साथ रुपये में व्यापार करने का करार कर लिया है। रूस, इजराइल, जर्मनी मॉरीशस, श्रीलंका, मलेशिया, म्यांमार और सिंगापुर जैसे देश भारत के साथ रुपये में व्यापार करने के लिए तैयार हो चुके हैं। इतना ही नहीं लगभग 100 देश भारत के साथ रुपये में ट्रेड सेटलमेंट के लिए बातचीत कर रहे हैं। अभी तक भारत में 49 वोस्ट्रो खाते खोले जा चुके हैं जो दूसरे देशों के साथ रुपये में व्यापार करने के लिए जरूरी हैं।

ट्रेड सेटलमेंट सिस्टम की जरुरत
आपको बता दें कि बीते साल जुलाई महीने में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने वैश्विक व्यापार को बढ़ाने और डॉलर पर निर्भरता घटाने के उद्देश्य से रुपये में ट्रेड सेटलमेंट सिस्टम का प्रस्ताव किया था। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिम और यूरोपीय देशों द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के बाद कई देशों को व्यापार करने में मुश्किलें आई थी, जिसके बाद भारत, अर्जेंटीना, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका सहित मध्य पूर्व से दक्षिण पूर्व एशिया तक कई देशों ने डॉलर पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए अन्य देशों के साथ डील के लिए इस सिस्टम को अपनाना शुरू किया।

क्या है वोस्ट्रो खाता?
इसी प्रयास में सबसे पहले रूस के दो सबसे बड़े बैंक स्बेरबैंक (Sberbank) और वीटीबी बैंक (VTB Bank) ने रुपये में ट्रेंड करने के लिए वोस्ट्रो अकाउंट खोला था। 6 महीने में ही इसकी संख्या 50 को छूने वाली है। आपको बता दें कि वोस्ट्रो खाता बैंक द्वारा नियोजित खाता है, जो ग्राहकों को दूसरे बैंक की ओर से पैसा जमा करने की सुविधा प्रदान करता है। विदेश का कोई बैंक वोस्ट्रो खाता खोलने के लिए भारत में बैंक से संपर्क कर सकता है। लेकिन इसके लिए बैंक को RBI से मंजूरी लेनी होती है। इसके बाद दोनों ही पक्ष करेंसी का एक्सचेंज रेट, मार्केट रेट आदि जरूरी चीजें तय कर लेते हैं और व्यापार शुरू कर सकते हैं।

माल दो, रुपया लो...
वोस्ट्रो एकाउंट खुलवाने की जरूरत तब पड़ती है जब किसी बैंक की विदेश में कोई शाखा नहीं होती है। वोस्ट्रो से ग्राहकों को किसी दूसरे बैंक के खाते में पैसा जमा करने की सुविधा मिलती है। अब जैसे किसी भारतीय आयातक को इजरायल में कारोबार करना है तो पहले उसे डॉलर में ही भुगतान करना होता था। लेकिन अब वह उसे रुपये में भी भुगतान कर सकता है। उसकी भुगतान राशि इस वोस्ट्रो खाते में जमा हो जाती है। इसी तरह, जब किसी भारतीय निर्यातक को माल और सेवाओं के लिए रुपये में भुगतान करना होता है, तो इस वोस्ट्रो खाते से राशि काट ली जाएगी और उसे निर्यातक के नियमित खाते में जमा कर दिया जाएगा।

ग्लोबल करेंसी बनने की राह पर रुपया
आपको बता दें कि कोरोना काल में डॉलर के मजबूत होने से दुनिया भर के कई देशों के लिए आयात महंगा हो रहा है। भारतीय रुपये भी डॉलर के मुकाबले लगातार गिरते जा रहे हैं। रुपये में कारोबार शुरु करने के पीछे उद्देश्य यही है कि इससे अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम होगी। रुपये में व्यापार बढ़ने के साथ ही भारत को भारतीय मुद्रा के लिए खरीदार तलाशने की जरूरत नहीं होगी। इतना ही नहीं इंटरनेशनल बैंकों को कंवर्जन फीस नहीं देना होगा। इससे भारतीय रुपये की डिमांड में भी इजाफा होगा।

8 दशकों से डॉलर का दबदबा
आपको बता दें कि अमेरिकी Dollar दुनिया में हर जगह मान्यता प्राप्त मुद्रा है, इसलिए ज्यादातर लेन-देन डॉलर में ही किए जाते हैं। पूरी वित्तीय दुनिया में 8 दशकों से इसका दबदबा है। द्वितीय विश्व युद्ध के अंत के बाद दुनिया पस्त हो गई थी। तब 1944 में 44 देशों के प्रतिनिधि युद्ध के बाद विश्व अर्थव्यवस्था की मरम्मत के लिए ब्रेटन वुड्स, न्यू हैम्पशायर में मिले। तब इस बात पर सहमति बनी कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में अमेरिका, डॉलर के मूल्य को सोने के मुकाबले तय करेगा और अन्य देश बदले में अपनी मुद्राओं को डॉलर के मुकाबले तय करेंगे। देशों को अब अपनी विनिमय दर को बनाए रखने के लिए रिजर्व में डॉलर रखना पड़ा, जिससे यह प्रमुख वैश्विक मुद्रा बन गई।

ब्रेटन वुड्स फेल, डॉलर पास
हालांकि 1970 के दशक तक ब्रेटन वुड्स एग्रीमेंट ध्वस्त हो गया क्योंकि अमेरिका के पास अपने डॉलर को वापस करने के लिए पर्याप्त सोना नहीं था। फिर भी डॉलर अन्य देशों द्वारा उपयोग की जाने वाली आरक्षित मुद्रा के रूप में बना रहा। अमेरिका के गहरे और लचीले वित्तीय बाजार, तुलनात्मक रूप से पारदर्शी कॉरपोरेट गवर्नेंस मानदंड और डॉलर की स्थिरता की वजह से पूरी दुनिया का इस पर भरोसा बना रहा। हालांकि यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद से दुनिया का भरोसा अब डॉलर पर से थोड़ा डगमगाया है। देशों को डर है कि अमेरिका के खिलाफ जाने पर उसे भी व्यापार में भारी दिक्कतें हो सकती हैं।

डॉलर बना रहेगा बॉस?
हालांकि उपर हम आपको बता चुके हैं कि अपना 'सिक्का' चलाने की कोशिश बाकी देश भी कर रहे हैं, लेकिन विश्लेषकों के मुताबिक डॉलर का प्रभुत्व निकट भविष्य में बदलने की संभावना नहीं है। उनका मानना है कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार और लेनदेन की प्रमुख मुद्रा बनी रहेगी। कोई भी अन्य मुद्रा इसे बदलने के करीब नहीं है। हालांकि वैश्विक वित्तीय प्रणाली पर इसकी पकड़ जरूर कमजोर हो सकती है। यूं तो डॉलर के प्रभाव को तोड़ने की कोशिशें पहले भी हुई हैं। साल 1999 में यूरोपिय देशों का ‘यूरो' लाना इसी कड़ी में शामिल था। हालांकि यह भी सफल नहीं हो पाया।

तेजी से बढ़ रही चीनी मुद्रा
वर्तमान में दुनिया के केंद्रीय बैंकों द्वारा रखे गए लगभग 60 प्रतिशत विदेशी मुद्रा भंडार डॉलर में हैं। साल 2000 में यही आंकड़ा 70 फीसदी था। ऐसे में यह वैश्विक वित्तीय व्यवस्था के भीतर एक क्रमिक बदलाव की ओर इशारा करता है। इन 22 सालों में यूरो 18 से 20 फीसदी आंकड़े पर पहुंचा है। वहीं अगर चीन की बात करें तो चीनी मुद्रा रॅन्मिन्बी अभी 2.76 फीसदी आंकड़े पर पहुंचा है। लेकिन 2016 के बाद से सबसे तेजी से बढ़ने वाली मुद्रा चीन की रॅन्मिन्बी ही है। आपको बता दें कि चीन की मुद्रा युआन और रॅन्मिन्बी में अंतर है। रेनमिनबी (RMB) चीन की मुद्रा का आधिकारिक नाम है। RMB की प्रमुख इकाई को चीनी युआन (CNY) कहा जाता है।

2047 से पहले रुपया बनेगा ग्लोबल करेंसी
RMB दुनिया में अमेरिकी डॉलर, यूरो, येन और ब्रिटिश पाउंड के बाद पांचवी सबसे बड़ी मुद्रा है। चीन के साथ भारत का भी प्रयास रुपये को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बनाने की ओर है। पहली बार यूरोपीय यूनियन में शामिल देश जर्मनी एशिया की किसी मुद्रा यानी भारतीय मुद्रा रुपये के साथ व्यापार करने के लिए आगे आया है। अगर 30 देशों के साथ भारत का रुपए में कारोबार शुरु हो गया तो फिर रुपया अंतरराष्ट्रीय करेंसी बन जाएगा। भारत सरकार की मंशा साल आजादी के 100 साल होने पर 2047 तक इंडियन करेंसी को अंतरराष्ट्रीय करेंसी के तौर पर स्थापित करने की है।
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