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अब हेड कांस्टेबल तक ले सकेगा रेटिना स्कैन जैसा निजी डाटा

नई दिल्ली, 05 अगस्त। आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022, चार अगस्त से पूरे देश में लागू हो गया. नया कानून पुलिस को किसी भी अपराध के लिए दोषी पाए गए या गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की संवेदनशील निजी जानकारी लेने और 75 सालों तक अपने पास रखने का अधिकार देता है.

हालांकि इस तरह के अधिकार पुलिस को पहले से प्राप्त थे, लेकिन अभी तक डाटा लेने की एक सीमा थी और प्रावधान कड़े थे. नए कानून में डाटा की श्रेणी का काफी विस्तार किया गया है और पुलिस के लिए पूरी प्रक्रिया को और आसान भी बनाया गया है.

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बंदी पहचान अधिनियम, 1920, के तहत पुलिस को कुछ विशेष तरह के अपराधियों या गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों की सिर्फ तस्वीरें, उंगलियों के निशान और पैरों के निशान लेने की अनुमति थी.

नए कानून के तहत हेड कांस्टेबल की रैंक का अधिकारी भी हर तरह का निजी डाटा ले सकता है

यह डाटा भी सिर्फ ऐसे लोगों का लिया जा सकता था जिन्हें ऐसे अपराधों का या तो दोषी पाया गया हो या उनके आरोप में गिरफ्तार किया गया हो जिनके लिए एक साल या उससे ज्यादा के कठोर कारावास की सजा का प्रावधान है.

इसके अलावा यह डाटा लेने का अधिकार जांच अधिकारी, पुलिस स्टेशन इन चार्ज या सब-इंस्पेक्टर या उससे ऊपर की रैंक के अफसर को दिया गया था. नए कानून में पुलिस के अधिकारों का दायरा बढ़ा दिया गया है.

पुराने और नए कानून में फर्क

अब किसी भी तरह के अपराध के लिए दोषी पाए गए या गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का निजी डाटा लिया जा सकता है. डाटा की श्रेणियों में आंखों की पुतलियों और रेटिना का स्कैन, बायोलॉजिकल सैंपल और उनका एनालिसिस, खून, वीर्य, बालों के सैंपल और स्वाब और यहां तक की डीएनए प्रोफाइल जैसी जानकारी भी ली जा सकती है.

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यह जानकारी हेड कांस्टेबल की रैंक का अधिकारी भी ले सकता है. केंद्रीय आपराधिक रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) इस तरह की निजी जानकारी को 75 सालों तक अपने पास रख सकता है. ब्यूरो इस डाटा को जांच एजेंसियों के साथ साझा कर सकता है.

अगर कोई व्यक्ति बिना सुनवाई के या सुनवाई और हर तरह की अपील के बाद रिहा कर दिया जाता है तो इस डाटा को मिटा देना होगा. लेकिन इसमें भी अदालतों और मजिस्ट्रेटों को लिखित कारण दे कर रिहाई के बावजूद डाटा रखे रहने का आदेश देने का अधिकार दिया गया है.

निजता विशेषज्ञ शुरू से नए कानून के प्रावधानों पर चिंता जताते आए हैं. पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च संस्था के मुताबिक कि इस कानून से लोगों के निजता के अधिकार और बराबरी के अधिकार दोनों का उल्लंघन होने की संभावना है.

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सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर संस्था के मुताबिक यह कानून निजता के अधिकार को मूलभूत अधिकार बताने वाले सुप्रीम कोर्ट के 2017 के फैसले की कसौटियों पर खरा नहीं उतरता है.

Source: DW

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