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World Population Day : बढ़ती आबादी वरदान है या अभिशाप ?

जनसंख्या दिवस इसलिए मनाया जाता है ताकि दुनिया बढ़ती आबादी के नकारात्मक परिणामों से अवगत हो और उसको लेकर जागरूक हो सके। भारत अब दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश बन चुका है। उसने जनसंख्या के मामले में चीन को भी पछड़ा दिया है। बढ़ती आबादी वरदान है या अभिशाप ? इस सवाल पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है।

World Population Day

आबादी के अनुपात में संसाधन नहीं बढ़ते
अर्थशास्त्री थॉमस रॉबर्ट माल्थस ने कहा था मानव आबादी की वृद्धि दर उस दर से कहीं ज्यादा होती है जिस दर से मानव निर्वाह के साधन (कृषि उत्पाद) बढ़ते हैं। जनसंख्या दोगुनी रफ्तार से बढ़ती है जब कि जीवन निर्वाह संसाधन सामान्य गति से बढ़ते हैं। इसका मतलब है कि बढ़ती आबादी के कारण जमीन, जंगल, पानी, खनिज कम पड़ते जाएंगे। ये बात अक्सर महसूस की जाती रही है कि बढ़ती आबादी का मतलब ज्यादा गरीबी और ज्यादा असमानता है। दूसरे वर्ग का मानना है कि बढ़ती जनसंख्या भारत की अर्थ व्यवस्था को गति प्रदान करेगी। यह ज्यादा उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करेगी, ज्यादा उत्पादन होगा तो खपत बढ़ेगी और खपत ज्यादा होगी तो विकास भी होगा। भारत सबसे युवा आबादी वाला देश है। भारत की 68 फीसदी काम करने योग्य आबादी देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) को बढ़ाएगी।

अनुपयोगी डिग्रियों से बेरोजगारों की फौज
ये सच है कि भारत में युवा वर्ग की जनसंख्या अधिक है लेकिन यह जनसंख्या देश के विकास में तभी योगदान कर सकती है जब वह कौशल और शिक्षा के मामले में सक्षम हो। ब्लूमबर्ग संस्था की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में बेकार डिग्रियां बेरोजगारों की एक पीढ़ी तैयार कर रही है। भारत में शिक्षा अब उद्योग बन चुका है जो करीब 117 एरब डालर तक पहुंच गया है। जो युवा बिना किसी कौशल के ग्रेजुएट हो रहे हैं वो अर्थ व्यवस्था के विकास को कम कर रहे हैं। भारत में कामकाज करने योग्य लोगों की आबादी जरूर अधिक है लेकिन इसमें स्किल की कमी है। जापान में कुशल श्रणिकों की आबादी 80 फीसदी है जब कि भारत में केवल 3 फीसदी है।

अगर नहीं चेते तो अगला विश्व युद्ध पानी को लेकर होगा
बढ़ती आबादी के कारण प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन हो रहा है जो आत्मघाती है। भावी विनाश के संकेत मिलने भी लगे हैं। जीवन के लिए अन्न जितना जरूरी है उससे ज्यादा जरूरी है पीने का पानी। मीठे पानी के श्रोत लगातार कम हो रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण भूगर्भ जल का स्तर तेजी से से नीचे गिर रहा है। धरती का लगभग तीन चौथाई हिस्सा पानी से भरा है लेकिन इसमें पीने योग्य पानी सिर्फ 3 फीसदी है। इस तीन में से दो फीसदी पानी बर्फ और ग्लेशियर के रूप में है। यानी पीने योग्य पानी (मीठा पानी) सिर्फ एक फीसदी है। इस हिसाब से पेयजल प्रकृति का बहुमूल्य उपहार है जो अत्यंत ही सीमित है। लेकिन मीठे पानी का धड़ल्ले से दुरुपयोग हो रहा है। आज से तीस साल पहले संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव बुतरस घाली ने कहा था, अगर इंसान ने पानी के महत्व को नहीं समझा तो अगल विश्व युद्ध पानी के लिए होगा। वह इसलिए क्यों कि पेयजल के बिना एक दिन भी जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती।

घटते खेत कैसे सबका पेट भरेंगे ?
आबादी बढ़ रही है और खेती योग्य जमीन कम हो रही है। सबका पेट भरने के लिए रसायनिक खादों और कीटनाशकों का आंख मूंद कर प्रयोग हो रहा है। इसकी वजह से जमीन की उर्वरा शक्ति लगातार कम हो रही है। अभी तो यही कहा जा रहा है कि भारत अनाज के मामले में आत्मनिर्भर है। लेकिन अगर रसायनिक खादों और कीटनाशकों का अतिशय प्रयोग नहीं रुका तो एक दिन भारत की अधिकतर जमीन बंजर हो जाएगी। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश की 30 फीसदी जमीन बंजर होने के कगार पर है और इसकी वजह है यूरिया का अंधाधुंध इस्तेमाल। लोग अक्सर महंगाई के लिए कालाबाजारी और सरकार की नीतियों को जिम्मेदार मानते हैं लेकिन इसके लिए बढ़ती आबादी भी एक बड़ा कारण है। कृषि उत्पाद सीमित हैं लेकिन इसके तलबगार बढ़ गये हैं।

क्या आर्थिक तरक्की में भी भारत चीन को पछाड़ेगा ?
भारत अगर आबादी के मामेल में चीन से आगे हो गया है तो क्या वह आर्थिक तरक्की में भी चीन को पीछे छोड़ देगा ? विशेषज्ञों के मुताबिक इसके लिए भारत को चार मोर्चों पर बेहतर प्रदर्शन करना होगा। शहरीकरण, बुनियादी ढांचा, कौशल विकास और विनिर्माण क्षेत्र में तेज प्रगति करनी होगी। भारत में शहरों की संख्या तो बढ़ रही हैं लेकिन उसके मुताबिक सुविधाएं नहीं बढ़ रहीं। शहरी आबादी स्वच्छ हवा और पानी की कमी से जूझ रही है। भारत के शहर दक्षिण कोरिया और चीन जैसे व्यवस्थित होंगे तभी शहरीकरण का फायदा मिलेगा। भारत खेती पर ज्यादा निर्भर है। अब उसे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में चीन की तरह ही कमाल करना होगा तभी जनसंख्या बल का फायदा मिल सकता है।

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