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World Environmental Day 2025: भारत में बसता है एशिया का सबसे साफ गांव, जानिए 'गॉड्स ओन गार्डन' की कहानी

World Environmental Day 2025: जब आज, 5 जून को पूरी दुनिया विश्व पर्यावरण दिवस 2025 के दिन साउथ कोरिया के जेजू आईलैंड पर धरती को बचाने के लिए एक मंच पर एकजुट हो रहा है। ऐसे में मन में एक ऐसे स्थान की कल्पना सहज ही आती है जहाँ मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरा सामंजस्य हो।

वहां की जीवनशैली पर्यावरण के अनुकूल हो, और स्वच्छता केवल एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि एक सामूहिक संस्कृति का रूप ले चुकी हो। लेकिन क्या आप जानते हैं ऐसी ही एक जगह है भारत के उत्तर-पूर्वी राज्य मेघालय में, जहां का एक छोटा सा गांव, मावलिननॉन्ग, इसी आदर्श का जीता-जागता उदाहरण है।

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मावलिननॉन्ग: ईश्वर का अपना बगीचा

पूर्वोत्तर भारत को प्रकृति ने बहुत सहजता से संवारा है, चारों ओर फैली हरियाली, ऊंचे-ऊंचे पहाड़ और शांत-सुरमय वातावरण आपके मन को प्रभावित करता है। मेघालय के इस गांव मावलिननॉन्ग को 'गॉड्स ओन गार्डन' के नाम से भी जाना जाता है। यह नाम इस गांव को इसकी प्राकृतिक सुंदरता और स्वच्छता के कारण मिला है। हरे-भरे बाग-बगीचे, लहराते ताड़ के वृक्ष, बांस के झुरमुट, साफ नदियां और घने जंगलों के बीच बसा यह गांव धरती पर स्वर्ग जैसा अनुभव कराता है।

साल 2003 में इस गांव को एशिया का सबसे स्वच्छ गांव घोषित किया गया था, और 2005 में इसे भारत का सबसे साफ गांव होने का गौरव प्राप्त हुआ। आज यह गांव न केवल एक प्रमुख पर्यटन केंद्र है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्थायी जीवनशैली की दिशा में एक प्रेरणास्रोत भी है।

World Environmental Day 2025: मावलिननॉन्ग ऐसे बना सबसे साफ गांव

इस गांव में खासी जनजाति रहती है, जो महिलाओं के नेतृत्व वाले समाज को मानती हैं, यानी यहां महिलाएं परिवार की मुखिया हैं और संपत्ति की वारिस भी होती हैं। खासी संस्कृति में पर्यावरण के साथ सहजीवन की भावना इनकी परंपरा से भरी है। यहां स्वच्छता केवल एक नियम नहीं है, बल्कि जीवन का अभिन्न अंग है। पीढ़ियों से यहां सफाई की परंपरा चली आ रही है, जिसे स्थानीय लोकगीतों में भी गाया जाता है।

गांव के हर कोने में बांस के कूड़ेदान लगे हुए हैं। प्लास्टिक का उपयोग यहां पूरी तरह से प्रतिबंधित है। कचरे से खाद बनाना, वर्षा जल संचयन और बांस के उत्पादों का इस्तेमाल यहां की दिनचर्या का हिस्सा हैं। लगभग 900 लोगों की आबादी वाला यह गांव सामूहिक रूप से अपने पर्यावरण की रक्षा में जुटा हुआ है।

100% साक्षरता: शिक्षा से जागरूकता की ओर

मावलिननॉन्ग की एक और विशेषता है - यहां की 100 प्रतिशत साक्षरता दर। यहां कोई भी निरक्षर नहीं है। ग्रामीण अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में कुशल हैं। यही शिक्षा उन्हें पर्यावरण के प्रति जागरूक बनाती है। बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक, सभी स्वच्छता और स्थिरता के प्रति समर्पित हैं।

नोह्वेट जीवित जड़ों का पुल

मावलिननॉन्ग न केवल अपनी स्वच्छता के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि अपने अद्वितीय प्राकृतिक पुल के लिए भी जाना जाता है, जिसे नोह्वेट लिविंग रूट ब्रिज कहा जाता है। यह पुल फिकस इलास्टिका पेड़ो की जीवित जड़ों से बनाया गया है। यह केवल एक पुल नहीं है, बल्कि खासी वास्तुकला और प्राकृतिक निर्माण का एक अद्भुत उदाहरण है। इस पुल को पीढ़ियों से बुना गया है, और यह समय के साथ और भी मजबूत होता जाता है।

इस पुल को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल का दर्जा भी मिला है। यह दर्शाता है कि किस प्रकार इंसान और प्रकृति मिलकर ऐसे संरचनात्मक चमत्कार रच सकते हैं जो पर्यावरण के साथ भी तालमेल बिठाते हैं

आज, जब विश्व जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और प्राकृतिक संसाधनों की कमी जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है, मावलिननॉन्ग जैसे गांव हमें उम्मीद की किरण दिखाते हैं। यह गांव यह साबित करता है कि यदि एक छोटा सा समुदाय इच्छाशक्ति और जागरूकता के साथ आगे बढ़े, तो वह पर्यावरण संरक्षण और विकास दोनों में एक साथ सफलता प्राप्त कर सकता है। मावलिननॉन्ग पूरी दुनिया को यह सीखा रहा है कि कैसे परंपरा और पर्यावरण को एक साथ लेकर अपने वर्तमान को बदला जा सकता है।

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