World Environment Day: प्लास्टिक में डूबता समुद्र और फूड वेस्ट से खतरे में भविष्य, ऐसे जोखिम में पड़ रही धरती
Environment: पर्यावरण दिवस के महत्व और उसे बर्बाद करने के पीछे के कारणों को समझना बेहद जरूरी है। आइये जानते हैं कौन से मुख्य कारण पर्यावरण प्रदूषण के जोखिम को बढ़ा रहे हैं। और आने वाली पीढ़ी के लिए खतरा पैदा कर रहे हैं।

Environment Crisis: पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए हर साल पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। ताकि लोग समझ सकें और पर्यावरण के प्रति जागरूक होकर इसे बचाने के लिए ठोस कदम उठा सकें। पर्यावरण के सामने क्या-क्या खतरे हैं ये समझना बहुत ज्यादा जरूरी है।
आज यानी 5 जून को हर साल विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। ऐसे में ये हर नागरिक और विश्व के हर इंसान का कर्तव्य बनता है कि इस दिन के महत्व को समझते हुए वो पर्यावरण के सामने खड़ी चुनौतियों के बारे में जागरूक हो। आने वाले समय में ये चुनौतियां कितना बड़ा खतरा बन सकती हैं, ये बात सबको पता होनी चाहिए।
अगर पर्यावरणीय समस्याओं के बारे में जानकारी नहीं होगी, तो इसे बचाने के लिए ठोस कदम उठाने में लोगों का सहयोग भी नहीं मिलेगा। ऐसे में जरूरी है कि प्रकृति और अपना भविष्य बचाने के लिए इस बात को समझना बेहद जरूरी है कि पर्यावरण खतरे में है। चलिये बात करते हैं उन कारणों पर, जो दिन ब दिन पर्यावरण के लिए बड़ी समस्या बनते जा रहे हैं।
प्लास्टिक
बात चाहे समुद्री जीवों की हो या फिर जमीन पर रहने वाले जीवों की, प्लास्टिक एक बड़ा खतर बनकर उभरा है। ये बात सच है कि समुद्री जीवों पर इसका असर बड़े स्तर पर देखने को मिला है। कई प्रजातियां खत्म होने की कगार पर हैं। ये सिर्फ जानवरों को ही नहीं, बल्कि मनुष्यों को भी कई तरह से प्रभावित करता है। आज से करीब 116 साल पहले साल 1907 में बेल्जियम मूल के अमेरिकी वैज्ञानिक लियो बेकलैंड ही थे, जिन्होंने प्लास्टिक की खोज की थी। उस वक्त ये खोज किसी वरदान से कम नहीं थी। लेकिन तब लोगों को नहीं पता था कि इसका इस्तेमाल वरदान से अभिशाप में बदलने लगेगा।
फूड वेस्ट
अकसर बचा हुआ खाना हम ऐसे ही फेंक देते हैं। शादी समारोह में ये चीज काफी देखने को मिलती है। लेकिन कोई इसके दूरगामी और खतरनाक प्रभावों के बारे में नहीं सोचता। बता दें कि खाने की बर्बादी से न सिर्फ आर्थिक बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय नुकसान भी होते हैं। बचा हुआ खाना जब लैंडफिल यानी कचरे वाली जगह में जाता है तो इससे मीथेन जैसी हानिकारक गैसें बनती हैं। ये गैसें पर्यावरण के लिए बहत ही ज्यादा नुकसानदायक होती हैं।
डीफॉरेस्टेशन या वनों की कटाई
ये बात तो हम सब जानते हैं कि पेड-पौधे हमारे लिए कितने जरूरी हैं। लेकिन अंधाधुंध वनों की कटाई आधुनिकीकरण के इस दौर में सबसे ज्यादा हो रही है। वनों की कटाई से न सिर्फ वायु प्रदूषण बढ़ता है, बल्कि मिट्टी और जल प्रदूषण भी बढ़ता है। पेड़ों को काटने से ऑक्सीजन की मात्रा में कमी आती है। इससे वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों में वृद्धि हो सकती है।
आधुनिक कृषि
आधुनिक कृषि की बात की जाए तो इससे न केवल जैव ईंधन का उत्पादन बढ़ाया जाता है, बल्कि पर्यावरण की समस्याएं भी जन्म लेती हैं। कृषि में विभिन्न तरह के बीज, सिंचाई, उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग किया जाता है। औ उनके उपयोग से पर्यावरण को बेहद नुकसान पहुंचता है। कीटनाशक की बात करें तो इसके उपयोग से न सिर्फ हानिकारक बल्कि लाभकारी कीट भी मर जाते हैं।
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