क्या ऐसे स्टूडेंट को अमेरिका में दोबारा लेनी पड़ेगी वैक्सीन ? भारतीय छात्रों की बढ़ी चिंता

नई दिल्ली ,4 जून: आने वाले महीनों में अमेरिका के 400 से ज्यादा कॉलेज और यूनिवर्सिटी में नया सत्र शुरू होने वाला है। वहां के शिक्षण संस्थाओं ने पहले से ही घोषणा कर रखी है कि जो स्टूडेंट पढ़ाई के लिए उनके संस्थानों में आना चाहते हैं, वह कोरोना वायरस वैक्सीन लगवाकर ही आएं। लेकिन, चिंता इस बात को लेकर बढ़ गई है कि कोवैक्सिन और स्पूतनिक वी का टीका लगवाने वाले स्टूटेंड के सामने कुछ यूनिवर्सिटी दोबारा वैक्सीन लगवाने की शर्त रख रहे हैं। अब सवाल है कि इस तरह का जोखिम लेने के लिए कौन तैयार होगा ? क्या ऐसा करना सुरक्षित होगा ? इसकी वजह से पहले से ऐसी वैक्सीन लगवा चुके छात्रों की चिंता बढ़ गई है।

दोबारा वैक्सीनेशन की शर्त से स्टूडेंट चिंतित

दोबारा वैक्सीनेशन की शर्त से स्टूडेंट चिंतित

न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी एक खबर उन हजारों भारतीय स्टूडेंट की चिंता बढ़ा सकता है, जो आने वाले दिनों में अमेरिका जाने की तैयारियों में लगे हैं। 25 साल की भारतीय स्टूडेंट मिलोनी दोशी उन्हीं में से एक हैं, जो कोलंबिया यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल एंड पब्लिक अफेयर्स में मास्टर्स की पढ़ाई के लिए जाने वाली हैं। उन्हें भारत बायोटेक की कोवैक्सिन की दोनों डोज पड़ चुकी है। लेकिन, अब कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने उनसे कहा है कि कैंपस में आने के बाद उन्हें फिर से दूसरी वैक्सीन की डोज फिर से लेनी पड़ेगी। दोशी के मुताबिक, 'मेरी चिंता सिर्फ दो अलग-अलग तरह की वैक्सीन को लेकर है।' इस तरह की बात बहुत सारे कॉलेजों की ओर से कही जा रही है।

वैक्सीन इंटरचेंजेबल नहीं है-सीडीसी

वैक्सीन इंटरचेंजेबल नहीं है-सीडीसी

खुद अमेरिका की सबसे बड़ी नियामक संस्था सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन ने भी वैक्सीन की इस तरह की मिलावट को लेकर सुरक्षा संबंधी घोर चिंता जाहिर की है। सीडीसी के प्रवक्ता क्रिस्टेन नोर्डलंड ने कहा है, 'क्योंकि कोविड-19 की वैक्सीन इंटरचेंजेबल नहीं है, कोविड-19 की दो अलग वैक्सीन लेने पर उसकी सुरक्षा और प्रभाव पर शोध नहीं हुआ है।' उन्होंने सिर्फ इतनी सलाह दी है कि जो लोग अमेरिका से बाहर बिना डब्ल्यूएचओ की मंजूरी वाली वैक्सीन लगवा चुके हैं, उन्हें फूड एंड ड्रग एडिमिनिट्रेशन (एफडीए) से मंजूर की गई वैक्सीन की पहली डोज के लिए कम से कम 28 दिनों तक इंतजार करना चाहिए। सवाल है कि जब दुनिया भर में दो वैक्सीन की दो अलग-अलग डोज पर ही ठोस डेटा सामने नहीं है, ऐसे में कौन स्टूडेंट पूरी तरह से वैक्सीनेशनेड होने के बाद फिर से दूसरी वैक्सीन लगवाने का जोखिम लेगा ?

'जो गुजर रहा है उसे बताना मुश्किल है'

'जो गुजर रहा है उसे बताना मुश्किल है'

रिपोर्ट के मुताबिक कुछ अमेरिकी शिक्षण संस्थानों की इस शर्त ने भारत से जाने वाले छात्रों के सामने इसबार बहुत बड़ी चुनौती पेश कर दी है, जहां से हर साल करीब 2,00,000 स्टूडेंट पहुंचते हैं। अमेरिका में भारतीय छात्रों की सहायता करने वाले नॉर्थ अमेरिकन एसोसिएशन ऑफ इंडियन स्टूडेंट के सुधांशु कौशिक ने कहा है, 'हर दिन हमारे पास 10 से 15 मैसेज और इंक्वायरी आ रहे हैं कि इसका मतलब क्या है ? इससे हमपर क्या असर पड़ेगा?' इंडियाना यूनिवर्सिटी की वाइस प्रेसिडेंट फॉर इंटरनेशनल अफेयर्स हल्लाह बक्सबउम कहती हैं कि रोजाना 200 कॉल और 300 ईमेल आते हैं, 'जो गुजर रहा है उसे बताना मुश्किल है। कोई सवाल ही नहीं है कि हमारे इंटरनेशनल स्टूडेंट को चिंता और घबराहट नहीं हो रही है।'

कोवैक्सिन को जुलाई-अगस्त तक मिल सकती है मंजूरी

कोवैक्सिन को जुलाई-अगस्त तक मिल सकती है मंजूरी

कई अमेरिकी यूनिवर्सिटी सिर्फ उन्हीं स्टूडेंट को इजाजत दे रहे हैं जो डब्ल्यूएचओ से मंजूर वैक्सीन लगवा चुके हैं। यानी जो स्टूडेंट ऐसी वैक्सीन सेमेस्टर शुरू होने तक नहीं लगवा पाएंगे, उनके सामने बड़ी मुश्किल आने वाली है। गौरतलब है कि भारत बायोटेक ने हाल ही में भारत सरकार को भरोसा दिलाया था कि वह इस महीने में विश्व स्वास्थ्य संगठन से मंजूरी के लिए अपने सभी बचे हुए दस्तावेज उसके पास जमा कर देगा। माना जा रहा है कि सबकुछ सही रहा तो जुलाई-अगस्त तक उसे जरूरी मंजूरी मिल जाएगी।

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