क्या यूपी में कभी बीएसपी का स्थान ले पाएगी कांग्रेस? दलित वोट बैंक के दम पर खड़े होने की कोशिश
कांग्रेस इस समय विचार-परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। पार्टी के नेता राहुल गांधी जिस तरह से ओबीसी वोट बैंक को सहेजने की कोशिश में लगे हैं, वह कई बार पिछड़ी जातियों के आधार पर टिकी हुई क्षेत्रीय पार्टियों से भी ज्यादा दिखाई पड़ता है।
राहुल आज जो 'जितनी आबादी, उतना हक' का नारा दे रहे हैं, वह कभी दलितों के बड़े नेता और बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशी राम दिया करते थे। उनका नारा था, 'जितनी जिसकी संख्या भारी, उतनी उसकी हिस्सेदारी'।

कांग्रेस की ओर से दलितों को रिझाने का अभियान
कांग्रेस नेता पूरे देश में ओबीसी की आबादी की गिनती के लिए जातीय जनगणना की वकालत कर रहे हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी का मुख्य फोकस दलित वोट बैंक पर ही टिका हुआ है। इसीलिए पार्टी ने कांशी राम के परिनिर्वाण दिवस यानी 9 अक्टूबर, 2023 को दलित गौरव यात्रा और दलित गौरव संवाद शुरू करने के लिए चुना है। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को भी राज्य के किसी रिजर्व सीट से चुनाव लड़वाए जाने की चर्चा चल रही है।
संविधान दिवस तक चलेगा दलित गौरव संवाद
इसके तहत पार्टी की टॉप लीडरशिप से लेकर अन्य कार्यकर्ताओं अगले महीने के 29 नवंबर को संविधान दिवस तक यूपी में दलित बस्तियों में जाएंगे और उन्हें पार्टी की नीतियों और दलितों के लिए उसकी योजनाओं की जानकारी देंगे। इस दौरान कांग्रेस की ओर प्रदेश के सभी 75 जिलों की दलित बस्तियों में रात्रि चौपाल जैसे कार्यक्रम भी आयोजित होने हैं। पार्टी दलित समाज के प्रबुद्ध लोगों से भी संपर्क करने की कोशिश में हैं, जो आसानी से उसकी बातों को समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा सके।
दलित वोट बैंक पर मायावती की पकड़ ढीली पड़ने का अनुमान
कांग्रेस को लग रहा है कि बसपा प्रमुख मायावती की पकड़ दलित वोट बैंक पर ढीली पड़ी है। राज्य में दलितों की जनसंख्या करीब 21% मानी जाती है। इनमें से 9% से ज्यादा तो सिर्फ जाटव समाज से माने जाते हैं, जिससे बीएसपी सुप्रीमो खुद ताल्लुक रखती हैं। बाकी आबादी गैर-जाटव जातियों के हैं।
यूपी में कांग्रेस का लगभग खत्म हो चुका है अपना जनाधार
असल में कांग्रेस पिछले कुछ चुनावों से यूपी में पूरी तरह से हाशिए पर पहुंच चुकी है। उसका जनाधार लगभग हवा हो चुका है। इसे पिछले 6 चुनावों में उसके खराब होते प्रदर्शनों से समझा जा सकता है।
यूपी में पिछले 6 चुनावों से कांग्रेस का प्रदर्शन
2009- 18.25% वोट (80 लोकसभा सीटों में 21 जीती)
2012- 11.63% वोट (403 विधानसभा क्षेत्रों में से 28 पर जीत)
2014- 7% वोट (66 लोकसभा सीटों पर लड़कर 2 जीती)
2017- 22.09% वोट (114 विधानसभा सीटों पर लड़कर 7 जीती, सपा के साथ गठबंधन)
2019- 6% (80 लोकसभा सीटों में से 1 पर जीत)
2022- 2.33% (399 सीटों पर लड़कर 2 जीती)
घोसी उपचुनाव के परिणाम ने जगाई उम्मीद ?
कांग्रेस को उम्मीद है कि अगर दलित उसके साथ जुड़ जाएं तो वह फिर से लखनऊ होते हुए 2024 में दिल्ली की सत्ता तक पहुंच सकती है। उसकी यह उम्मीद जगाने में शायद हाल में हुए घोसी उपचुनाव का परिणाम एक कारण हो सकता है। इस सीट पर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार की सत्ताधारी बीजेपी से सीधी टक्कर थी। सपा प्रत्याशी 42 हजार से भी ज्यादा वोटों से जीता।
इस सीट में इंडिया ब्लॉक यानी कांग्रेस समेत अन्य बीजेपी-विरोधी पार्टियों ने अखिलेश यादव के दल के उम्मीदवार को समर्थन दिया था। जबकि, बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अपने समर्थकों से कहा था कि या तो मतदान से दूर रहें या फिर नोटा को वोट करें।
लेकिन, नोटा पर बटन दबाने वालों की संख्या 1,700 से कुछ ही अधिक रही। ऐसे में सपा उम्मीदवार को मिले भारी वोट से विश्लेषकों को लगता है कि मायावती की दलित मतदाताओं ने ज्यादा नहीं सुनी और उन्होंने स्थानीय मुद्दों को लेकर यहां सपा का समर्थन किया।
कांग्रेस में बीएसपी का स्थान भरने की जगी उम्मीद?
कांग्रेस को लगता है कि यहां दलित वोटरों के लिए टीना फैक्टर (देयर इज नो अल्टरनेटिव या कोई विकल्प नहीं) ने काम किया और उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार से मायूसी की वजह साइकिल वाला बटन दबा दिया। वैसे यह तथ्य है कि दलित वोटरों पर मायावती का प्रभाव कम होता नजर आ रहा है।
2017 के चुनावों तक दिखी थी बीएसपी की ताकत
जैसे 2017 में जब यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा मिलकर मैदान में थे, तो बीएसपी अकेले 403 सीटों पर लड़ी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा सामने होने की वजह से परिणाम एक तरफा बीजेपी के पक्ष में चला गया। मायावती की पार्टी को भले ही तब सिर्फ 19 सीटें मिली थीं, लेकिन फिर भी 22.23% वोट लाकर उसने अपनी वास्तविक शक्ति का प्रमाण दिया था।
2022 में सबसे बुरा रहा बीएसपी का प्रदर्शन
लेकिन, वही बीएसपी जब 2019 के लोकसभा चुनावों में सारे मतभेद भुलाकर सपा से गठबंधन का स्वाद चखा और 10 सांसद दिल्ली भेजे तो सियासी समीकरण तेजी से बदलने शुरू हो गए। 2022 के विधानसभा चुनावों में अकेले अपने दम पर मैदान में उतरी तो उसे अबतक के सबसे बुरे प्रदर्शन का सामना करना पड़ा। पार्टी सिर्फ 1 ही सीट जीत सकी और उसका वोट शेयर घटकर मात्र 12.88% रह गया। कहा जाता है कि यह वोट भी मूल रूप से जाटवों का वोट था, जिस समाज से बीएसपी चीफ खुद आती हैं।
गैर-जाटव वोट बैंक में भाजपा ने भी गहरी पैठ बनाई है
जहां तक गैर-जाटव दलितों की बात है तो पिछले चार चुनावों से बीजेपी ने उसमें अपनी अच्छी पैठ बनाई है। भाजपा के बारे में यह भी कहा जाता है कि जाटव मतदाताओं को भी अपने साथ जोड़ने के लिए वह लगातार काम कर रही है। वहीं सपा भी आजाद समाज पार्टी के माध्यम से उन्हें अपने साथ करने की कोशिशों में जुटी रही है। क्योंकि, उसे लगता है कि 2019 के चुनावों से साइकिल के खिलाफ वोट देने वाली मायावती के वोटरों की सोच में जरूर बदलाव आया है।
कांग्रेस से किस आधार पर जुड़ेगा दलित वोटर?
ऐसे में अगर कांग्रेस दलितों से उम्मीद लगा रही है तो यह देखना जरूरी है कि समाज का यह बड़ा तबका उसकी ओर किस भरोसे के साथ देखना चाहेगा? परंपरागत तौर पर यूपी में दलित, मुसलमान और ब्राह्मण कांग्रेस के कोर वोटर जरूर माने जाते थे। लेकिन, मुसलमान अब कांग्रेस को वहीं वोट देता है, जहां उसके पास बीजेपी को हराने का कोई विकल्प नहीं बचता।
दलित वोटर यहा कांशी राम की राजनीति शुरू होने के बाद से कांग्रेस से पीछा छुड़ाए हुए हैं। रही बात ब्राह्मण वोटरों की तो जातिगत जनगणना वाली पिच पर जिस अंदाज में राहुल बैटिंग कर रहे हैं, उसके बाद बचे-खुचे ब्राह्मण वोटरों का भी उससे मोह बना रहेगा यह बड़ा सवाल है।
ऐसे में प्रश्न ये है कि अगर दलित खासकर जाटव कांग्रेस की ओर रुख करें भी तो उन्हें प्रदेश में सत्ता की किरण किधर नजर आएगी? क्योंकि, मायावती के शासन में उन्हें भी सत्ताधारी दल के साथ जुड़े रहने का लुत्फ उठाने का मौका मिल चुका है। खासकर युवा दलित वोटरों में यह क्रेज काफी बढ़ा है। इस स्थिति में शायद यूपी में फिलहाल उन्हें बीजेपी या सपा में ही कांग्रेस से ज्यादा उम्मीद दिख सकती है। वैसे भी भारतीय जनता पार्टी ने प्रदेश के दलित समाज के नेता को देश के सर्वोच्च पद तक पर बिठाया है और राजभवनों में भी जगह दी है।
इसलिए कांग्रेस ने यूपी में जो अभियान शुरू किया है, वह दिलचस्प तो है, लेकिन पार्टी के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण भी है। आगे यह भी देखना पड़ेगा कि इंडिया ब्लॉक को बचाने के लिए प्रदेश में सपा और कांग्रेस के बीच लोकसभा सीटों पर किस तरह से बात बन पाती है।












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