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पश्चिम बंगाल में क्या अध्यक्ष बदलने से बदलेगी बीजेपी की किस्मत?

By BBC News हिन्दी
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बीजेपी समर्थक
Getty Images
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दो मई, 2021 से पहले पश्चिम बंगाल में बीजेपी दो सौ से ज्यादा सीटें जीत कर सरकार बनाने के दावे करते नहीं थक रही थी और अब अपने बिखरते कुनबे को बचाने में जुटी है.

विधानसभा चुनाव में नाकामी और कुनबे के बिखराव का सिलसिला जारी रहने का खामियाजा प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष को भुगतना पड़ा है. उनको अचानक प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से हटा कर पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया है.

विधानसभा चुनावों से पहले बीजेपी के सरकार में आने की स्थिति में वे मुख्यमंत्री पद के रेस में सबसे आगे माने जा रहे थे. लेकिन माया मिली न राम की तर्ज पर मुख्यमंत्री बनना तो दूर, अब पार्टी अध्यक्ष पद भी उनसे छिन गया है.

https://www.youtube.com/watch?v=jyPbUpEQdPA

बीजेपी से घर वापसी का सिलसिला

वैसे तो विधानसभा चुनाव में महज 77 सीटों तक सिमटने के बाद से ही बीजेपी के विधायकों और टीएमसी से भगवा खेमे में जाने वाले नेताओं के भविष्य पर अटकलों का दौर शुरू हो गया था.

चुनाव से पहले जिस तरह टीएमसी से बीजेपी में जाने की होड़ मची थी, चुनाव के बाद उसी तर्ज पर रिवर्स माइग्रेशन शुरू हो गया.

घर वापसी की शुरुआत बीते 11 जून को मुकुल रॉय से शुरू हुई जो अब तक जारी है. उसके बाद चार अन्य विधायक भी टीएमसी में लौट चुके हैं.

लेकिन भगवा खेमे को सबसे करारा झटका दिया पूर्व केंद्रीय मंत्री और आसनसोल के बीजेपी सांसद बाबुल सुप्रियो ने.

बीती जुलाई में राजनीति से संन्यास लेने का एलान करने वाले बाबुल का मन उनके शब्दों में 'महज तीन दिनों के भीतर' अचानक बदला और बंगाल के लोगों की सेवा करने के लिए उन्होंने दीदी का दामन थाम लिया.

इसके बाद अपनी प्रेस कांफ्रेंस में उनका कहना था, "देश के लोग दीदी को ही देश की अगली प्रधानमंत्री के तौर पर देखना चाहते हैं." उन्होंने सोमवार को राज्य सचिवालय में ममता बनर्जी से मुलाक़ात की.

बाबुल कहते हैं, "दीदी मुझे जो भी जिम्मेदारी देंगी, मैं उसे बखूबी निभाने का प्रयास करूंगा. मैं राज्य के लोगों की सेवा का मौका नहीं छोड़ना चाहता था. मैं प्लेइंग इलेवन में रहना चाहता था. लेकिन बीजेपी में मुझे मौका नहीं मिल रहा था इसलिए मैंने टीएमसी में शामिल होने का फ़ैसला किया. मैं किसी पद के लालच में नहीं आया हूं."

बाबुल का टीएमसी में शामिल होना बीजेपी के लिए करारा झटका था. भवानीपुर सीट पर 30 सितंबर को उपचुनाव होना है. उसमें बीजेपी उम्मीदवार प्रियंका टिबरेवाल के पक्ष में प्रचार के लिए पार्टी ने जिन स्टार प्रचारकों की सूची बनाई थी उनमें बाबुल का नाम भी शामिल था.

यह बात अलग है कि प्रदेश बीजेपी नेताओं ने इसे ज़्यादा अहमियत देने से इंकार कर दिया. प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष ने बाबुल को राजनीतिक पर्यटक बताते हुए कहा कि उनके टीएमसी में जाने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

लेकिन, उसके 48 घंटे के भीतर ही दिलीप घोष को उनके पद से हटा कर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया. मुकुल रॉय के टीएमसी में शामिल होने के बाद से ही यह पद खाली था. ऐसे में इसे दिलीप का डिमोशन मानने वालों की भी कमी नहीं है. घोष बार-बार कहते रहे हैं कि वे केंद्र की बजाय बंगाल में ही काम करना चाहते हैं.

अध्यक्ष के तौर पर दूसरे कार्यकाल का करीब 16 महीना बाक़ी रहते दिलीप घोष को अचानक क्यों हटाया गया? इस सवाल के कई अलग-अलग जवाब मिल रहे हैं. बीजेपी नेताओं के एक गुट का कहना है कि विधानसभा चुनावों में पार्टी के खराब प्रदर्शन की वजह से ही उनको हटाया गया है.

लेकिन, दिलीप के समर्थकों की दलील है कि अगर पार्टी का प्रदर्शन ख़राब था तो इसकी जिम्मेदारी केंद्रीय नेतृत्व की है, दिलीप की नहीं. इस गुट के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "केंद्रीय नेतृत्व ने अपनी नाकामी को छिपाने के लिए दिलीप को बलि का बकरा बना दिया है." पार्टी का एक अन्य गुट दिलीप के विवादित बयानों को इसके लिए ज़िम्मेदार मानता है.

प्रदेश बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "दरअसल, दिलीप को हटाने की वजह दूसरी है. वर्ष 2019 में उत्तर बंगाल में पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहा था. इसलिए 2024 के चुनावों में अपनी ज़मीन मजबूत बनाने के लिए ही उत्तर बंगाल के नेता को अध्यक्ष की कुर्सी पर बिठाया गया है."

कौन हैं नए प्रदेश अध्यक्ष

सुकांत मजूमदार उत्तर बंगाल से बीजेपी के पहले प्रदेश अध्यक्ष हैं. वैसे, पूर्व अध्यक्ष तपन सिकदर भी उत्तर बंगाल के ही रहने वाले थे. लेकिन वे ज्यादातर कोलकाता में ही रहते थे और दमदम केंद्र से चुनाव लड़ते थे.

खुद दिलीप घोष कहते हैं, "बीती जुलाई में अध्यक्ष जे.पी.नड्डा के साथ बैठक के दौरान मैंने नई पीढ़ी को नेतृत्व सौंपने की सिफ़ारिश की थी. मैंने प्रदेश अध्यक्ष के लिए जिन नेताओं के नाम की सिफ़ारिश की थी उनमें सुकांत भी शामिल थे."

बालूरघाट से बीजेपी सांसद सुकांत मजूमदार भी दिलीप घोष की तरह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आए हैं. उनकी नियुक्ति से साफ़ है कि बीजेपी वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर बंगाल पर ध्यान केंद्रित करना चाहती है.

सुकांत ने अपनी नियुक्ति के तुरंत बाद कहा, "मैं उत्तर बंगाल और जंगलमहल का पिछड़ापन दूर करने के मुद्दे पर केंद्र से बात करूंगा."

हालांकि, राजनीतिक पर्यवेक्षक प्रोफेसर समीरन पाल कहते हैं, "मौजूदा दौर में जिस तरह बीजेपी से टीएमसी में शामिल होने का सिलसिला जारी है, सुकांत को पद संभालने के साथ ही इस सिलसिले पर अंकुश लगाने की कड़ी चुनौती से जूझना होगा. इसके अलावा खासकर ग्रामीण इलाक़े में दिलीप घोष की पकड़ बेहद मजबूत है. नए अध्यक्ष को वहां पार्टी कार्यकर्ताओं के असहयोग का सामना भी करना पड़ सकता है."

घोष ने मजबूत किया बीजेपी को

पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस के ख़िलाफ़ मैदान में उतरे विपक्षी नेताओं में से अगर किसी की सबसे ज़्यादा चर्चा हो रही थी तो वे दिलीप घोष ही थे. घोष भले ही कई बार अपने अटपटे और विवादित बयानों के लिए सुर्खियाँ बटोरते रहे हों लेकिन बीजेपी अगर चुनावों में ममता बनर्जी को कड़ी चुनौती देने का दावा कर रही थी तो इसके पीछे घोष का योगदान बेहद अहम था. यह घोष ही थे जिन्होंने पार्टी को आंतरिक राजनीति से उबार कर पहले लेफ्ट और कांग्रेस को धकेलते हुए प्रमुख विपक्षी पार्टी के तौर पर स्थापित किया था.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से आए दिलीप घोष ने वर्ष 2015 में प्रदेश बीजेपी की कमान ऐसे मुश्किल दौर में संभाली जब राज्य में अंदरुनी गुटबाज़ी चरम पर थी. वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों से पहले केंद्रीय नेतृत्व ने बंगाल में बीजेपी को एकजुट कर उसे सांगठनिक तौर पर मजबूत करने की ज़िम्मेदारी घोष को सौंपी.

प्रदेश की कमान संभालने के बाद केंद्रीय नेतृत्व के वरदहस्त का फ़ायदा उठाते हुए उन्होंने संगठन में व्यापक फेरबदल किया और प्रदेश से जिलास्तर तक तमाम पदाधिकारियों को बदल डाला. वर्ष 2016 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने पूर्व मेदिनीपुर जिले की खड़गपुर सदर सीट कांग्रेस के दिग्गज ज्ञानसिंह सोहनपाल को हरा कर जीती थी. ज्ञान सिंह लगातार सात बार वह सीट जीत चुके थे. उसके बाद वर्ष 2019 में उन्होंने लोकसभा का चुनाव लड़ा और उसमें भी जीत हासिल की.

विवाद भी जुड़े रहे

घोष ने बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर पार्टी के भीतर और बाहर भले काफी प्रशंसा बटोरी हो, उनके साथ विवाद भी कम नहीं जुड़े हैं. चुनाव आयोग के समक्ष पेश हलफ़नामे में उन्होंने झाड़ग्राम स्थित पॉलिटेक्निक कॉलेज से इंजीनियरिंग में डिप्लोमा की पढ़ाई का दावा किया था.

इस मुद्दे पर कलकत्ता हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की गई थी लेकिन अदालत ने उसे ख़ारिज कर दिया था. इलाक़े में स्थित एकमात्र ईश्वर चंद्र विद्यासागर पॉलिटेक्निक ने तब कहा था कि घोष ने वर्ष 1975 से 1990 के बीच डिप्लोमा की पढ़ाई नहीं की थी.

देश में कोरोना वायरस का प्रकोप फैलने के बाद उन्होंने कहा था कि गोमूत्र पीने में कोई बुराई नहीं है और वे खुद इसका सेवन करते हैं. इससे कोरोना ठीक हो सकता है. उनके इस बयान की काफ़ी आलोचना हुई थी.

उसी साल यानी 2020 के सितंबर में उन्होंने कहा था कि बंगाल में कोरोना महामारी ख़त्म हो चुकी है और ममता बनर्जी ने राज्य में जानबूझ कर लॉकडाउन किया है ताकि बीजेपी को रैलियों के आयोजन से रोका जा सका. दिलचस्प यह है कि बंगाल को कोरोनामुक्त घोषित करने के एक महीने बाद 16 अक्तूबर 2020 को कोरोना की चपेट में आकर घोष को एक निजी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा.

राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि घोष ने भले ही बीजेपी की अंतरकलह पर काबू पाकर उसे तृणमूल कांग्रेस के सामने चुनौती देने की स्थिति में पहुंचाया लेकिन विधानसभा चुनाव में हार और विवादित बयानों की वजह से केंद्रीय नेतृत्व उनसे नाराज था.

पार्टी के कई नेता भी केंद्रीय नेतृत्व से लगातार उनकी शिकायत कर रहे थे. विश्लेषक समीरन पाल कहते हैं, "घोष को हटाने के कयास तो चुनावी नतीजे आने के बाद से ही लगने लगे थे. लेकिन यह अचानक होगा, इसकी उम्मीद शायद खुद उनको भी नहीं रही होगी. अब नए अध्यक्ष के लिए घोष की विरासत से जूझते हुए पार्टी को एकजुट रखना ही सबसे कड़ी चुनौती होगी."

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English summary
Will changing state president change fate of BJP in West Bengal?
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