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Sharad Pawar के तीसरे मोर्च की कवायद मोदी को टक्कर देने में क्यों रहेगी नाकाम, जानिए तीन वजहें

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नई दिल्ली, 22 जून: तीसरे मोर्चा की चर्चा देश में एक फिर सुर्खियों में है। खासकर जिस तरह से चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार से ताबड़तोड़ घंटों मुलाकात की है, इसका संकेत साफ महसूस किया गया है। बाकी की कमी में हाल ही में टीएमसी में गए पूर्व भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा की गतिविधियां पूरी कर दे रही हैं। लेकिन, ज्यादा पीछे न जाकर बीते तीन दशकों की ही राजनीति को देखें तो ऐसा नहीं लगता कि अभी कोई ऐसे तीसरे मोर्चे की संभावना नजर आ रही है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी अगुवाई वाली बीजेपी सरकार को राजनीतिक तौर पर अकेले चुनौती दे सके।

तीसरे मोर्चे में राष्ट्रीय स्तर का कोई नेता नहीं है

तीसरे मोर्चे में राष्ट्रीय स्तर का कोई नेता नहीं है

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली केंद्र की सत्ताधारी बीजेपी को चुनौती देने के लिए तीसरे मोर्चे की ताजा कवायद पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा को लगे झटके के बाद शुरू हुई है। पिछले दो हफ्तों में बंगाल में ममता बनर्जी की हैट्रिक को कामयाब बनाने के रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर की एनसीपी मुखिया शरद पवार से मुलाकात ने भाजपा विरोधी खेमे में बड़ी उम्मीद जगाई है। बाद में इसमें हाल ही में नरेंद्र मोदी से खुन्नस निकालने के लिए टीएमसी में शामिल हुए यशवंत सिन्हा ने भी जोर लगाने की कोशिश शुरू की है। लेकिन, तथ्य ये है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर टक्कर देने का सपना अभी तृणमूल कांग्रेस और एनसीपी ही देख रही है। इसमें पहली की कमान ममता बनर्जी के हाथों में है और दूसरे की डोर शरद पवार के हाथों में। इस बात में कोई दो राय नहीं कि ममता ने बंगाल में पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जुगलबंदी का सुर-ताल बिगाड़ दिया है। लेकिन, बंगाल के बाहर वो मोदी के मुकाबले कहीं भी टिक पाएंगी, अभी इसकी कल्पना बेमानी लगती है। वैसे भी उन्होंने पिछले चुनाव में बंगाली बनाम बाहरी की लड़ाई की आग सुलगाकर अपना हाथ पहले ही झुलसा लिया हैं। दूसरी ओर पवार साहब हैं। देश के तमाम दलों और उनके नेताओं को एकजुट करने के उनके पावर और अनुभव पर कोई सवालिया निशान नहीं लगा सकता। लेकिन, महाराष्ट्र से बाहर वो मोदी की लोकप्रियता को टक्कर दे पाएंगे, यह बहुत बड़ा सवाल है।

तीसरे मोर्चे की कवायद से कांग्रेस अलग है

तीसरे मोर्चे की कवायद से कांग्रेस अलग है

जब भी देश में बीजेपी के खिलाफ तीसरे मोर्चे की बात उठती है तो उसका मतलब यही होता है- बिना भाजपा-बिना कांग्रेस वाला गठबंधन। कांग्रेस आज जितनी भी कमजोर हो चुकी हो, लेकिन वही एकमात्र पार्टी है, जिसकी अखिल भारतीय मौजूदगी है और उसका पैन इंडिया संगठन भी है। मंगलवार की मीटिंग के लिए राष्ट्रीय मंच के नाम पर जिन कांग्रेसियों को बुलाया गया, उनमें मनीष तिवारी, कपिल सिब्बल और विवेक तन्खा जैसे जी-23 या बदलाव की मांग करने की हिम्मत जुटाने वाले नेता ही शामिल हैं। बाकी कांग्रेसी नेताओं में सिर्फ शत्रुघ्न सिन्हा और रेणुका चौधरी का नाम शामिल था। तथ्य ये है कि इन सारे नेताओं ने किसी न किसी वजह से पवार के घर बुलाई गई बैठक (एंटी-मोदी कैंप ) में पहुंचने से अलग-अलग वजहों से इनकार कर दिया। सवाल ये भी है कि ये तमाम नेता कांग्रेस के हैं तो जरूर, लेकिन न तो इनमें से किसी के पास अपना बड़ा जनाधार है और ना ही इनका कद ही राष्ट्रीय स्तर का है। यानी कुल मिलाकर मुख्यधारा की कांग्रेस इस कवायद में कहीं नजर नहीं है। इसकी वजह अलग हो सकती है, लेकिन सच्चाई यही है कि कांग्रेस को अलग रखकर कोई भी गठबंधन भानुमति का कुनबा जोड़कर नरेंद्र मोदी की लीडरशिप वाली बीजेपी को चुनौती दे पाएगा, इसकी संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती

तीसरे मोर्चे की शुरुआत से पहले ही हौसला पस्त

तीसरे मोर्चे की शुरुआत से पहले ही हौसला पस्त

भाजपा और मोदी के नेतृत्व से निजी तौर पर खफा होकर इधर-उधर भटकते हुए टीएमसी में पहुंचे यशवंत सिन्हा बंगाल में अपनी पुरानी पार्टी की हार देखकर ममता बनर्जी से भी ज्यादा उत्साहित लग रहे हैं। उन्होंने ही सोमवार को ट्वीट कर जानकारी दी थी, 'हम कल शाम 4 बजे राष्ट्र मंच की बैठक करेंगे। शरद पवार अपने आवास पर बैठक आयोजित करने के लिए सहमत हो गए हैं।' लेकिन, सिन्हा की उम्मीदें परवान चढ़ने से पहले ही 15 दिन में दो बार पवार से लंबी बातचीत कर आए चुनावी रणनीतिकार पीके ने एक चैनल से यह कहकर इस सारी कवायद की हवा निकाल दी कि, 'मुझे नहीं लगता कि कोई तीसरा या चौथा मोर्चा मौजूदा सरकार के खिलाफ सफल चुनौती पेश कर सकता है।' उन्होंने कहा कि तीसरे मोर्चे का प्रयोग पुराना है और वर्तमान राजनीति में फिट नहीं बैठता।

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तीसरा मोर्चा या मोदी-विरोधी लामबंदी ?

तीसरा मोर्चा या मोदी-विरोधी लामबंदी ?

इस बीच तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट शुरू होने से पहले ही एनसीपी की ओर से आए बयान ने इस चर्चा को विराम ही लगा दिया है। पार्टी नेता नवाब मलिक के मुताबिक पवार के घर बैठक में सिर्फ भाजपा विरोधी दलों के नेताओं को ही नहीं बुलाया गया है, बल्कि इसमें वरिष्ठ वकील केटीएस तुलसी, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी, पूर्व एंबेसडर केसी सिंह, गीतकार जावेद अख्तर, फिल्कार प्रीतीश नंदी, वरिष्ठ वकील कॉलिन गोन्साल्विस और करण थापर और आशुतोष जैसे मीडिया के खास वर्ग से जुड़े लोग भी शामिल हैं। यानी जिस बीजेपी-विरोधी तीसरे मोर्चे को लेकर चर्चा का बाजार गर्म था, उसमें मोदी-विरोधी बाकी चेहरों का जुटना इसकी राजनीतिक धार को रफ्तार पकड़ने से पहले ही कुंद कर चुका है।

English summary
Sharad Pawar's anti-PM Modi third front exercise failed even before the start, Prashant Kishor raised questions
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