वेस्ट यूपी में मुस्लिम वोट को लेकर इतनी डरी क्यों हुई हैं बहन जी?

नई दिल्ली- पिछले दो चुनावों में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में सभी सियासी खिलाड़ियों की राजनीति खराब कर दी थी। लेकिन, अगर सबसे ज्यादा राजनीतिक नुकसान किसी को पहुंचाया था, तो वो हैं बहन जी। 2014 और 2017 में अपना वोट बैंक बरकरार रखकर भी वो सत्ता तो क्या विपक्ष की भूमिका निभाने की हैसियत में भी नहीं रह गईं। अगर उन्होंने सपा से गठबंधन किया है, तो यह तय है कि इस चुनाव में उनका सबकुछ दांव पर लगा है। वो हर हाल में भारतीय राजनीति में अपना पुराना वजूद हासिल करना चाहती हैं। महागठबंधन ने उन्हें बहुत बड़ा मौका दिया है। पश्चिमी यूपी में उनकी सियासी किस्मत का सारा दारोमदार मुस्लिम-दलित वोटों की जुगलबंदी पर है। दलित खासकर जाटव तो उनके साथ बताए ही जाते हैं। लेकिन, मुस्लिम क्या करेंगे? इसी डर ने उन्हें देवबंद में एक विवादित अपील करने को भी मजबूर कर दिया, जिसके चलते उनपर आचार संहिता की भी तलवार लटक चुकी है। लेकिन, मायावती के पास कोई चारा नहीं है। अगर मुस्लिम वोट बंटने की उनकी आशंका सच साबित हो गई, तो उनकी आगे की सियासत भी खतरे में पड़ जाएगी। यूपी विधानसभा चुनाव में भी अभी तीन साल बचे हुए हैं। इन मुश्किलों के बीच कभी सामने से, तो कभी पीछे से भीम आर्मी चीफ (Bhim Army Chief) चुनौती अलग दे रहे हैं। दलित मसीहा बनने का रसूख क्या होता है, वो बुआ में देख चुके हैं। आइए समझते हैं कि पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोट के मायने क्या हैं, जिसके बंटने की आशंका ने बहन जी को परेशान कर रखा है।

वेस्ट यूपी में मुस्लिम वोट का अंकगणित

वेस्ट यूपी में मुस्लिम वोट का अंकगणित

उत्तर प्रदेश के 20 जिलों में मुसलमानों की आबादी 20% से भी ज्यादा है, जिनमें से 11 पश्चिमी यूपी में हैं। अगर पूरे प्रदेश के हिसाब से देखें तो राज्य में कुल जितनी मुस्लिम जनसंख्या है, उसके 26.2% पश्चिमी यूपी के इन्हीं 11 जिलों में रहते हैं। रामपुर जिले में तो इनकी आबादी आधे से भी ज्यादा यानी 50.6% है। इसके बाद मुरादाबाद (47.1%), बिजनौर (43%), सहारनपुर (41.9%), मुजफ्फरनगर (41.3%), ज्योतिबा फुले नगर (40.7%), मेरठ (34.4%), बागपत (27.9%), गाजियाबाद (25.4%), बुलंदशहर (22.2%) और बदायूं (21.5%) में हैं। जबकि, राज्य में इनकी कुल जनसंख्या 19.3% है। अगर यूपी के 915 शहरों की बात करें तो उनमें से करीब एक-चौथाई यानी 231 मुस्लिम बहुल हैं। अगर गांव एवं शहरों में रहने वाले मुस्लिम आबादी को देखें तो गांव के 15.6% के मुकाबले यूपी के शहरों में दोगुना यानी 32.2% मुसलमान रहते हैं। जाहिर है कि यही कारण है कि मुसलमानों के वोट को लेकर मायावती इतनी ज्यादा संजीदा नजर आ रही हैं।

कांग्रेस की चुनावी कसरत

कांग्रेस की चुनावी कसरत

बसपा सुप्रीमो ने आचार संहिता के उल्लंघन का जोखिम सहारनपुर लोकसभा की जिस सीट पर लिया है, वहां कांग्रेस ने एक बहुत ही सशक्त मुस्लिम उम्मीदवार पर अपना दांव लगाया है। यहां इमरान मसूद को कांग्रेस ने अपना प्रत्याशी बनाया है, जो 'बोटी-बोटी' वाले बयान के कारण कुख्यात हैं। लेकिन, बहन जी की चिंता ये है कि मसूद को वहां पिछली बार करीब 4 लाख वोट मिले थे और वे बीजेपी के मौजूदा प्रत्याशी राघवलखन पाल से केवल 65,000 वोटों से हारे थे। माया को डर है कि मसूद की मौजूदगी से मुसलमानों का वोट उनके और बीएसपी उम्मीदवार हाजी फजलुर्रहमान के बीच बंट सकता है, जिससे उनके प्रत्याशी के जीत का गणित बिगड़ जाएगा। बीएसपी चीफ की इस दुखती नस को दबाने में बीजेपी भी कोई कसर नहीं छोड़ रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मसूद को आतंकी "मसूद अजहर का दामाद" बताकर मुस्लिम वोट को बीएसपी उम्मीदवार से छिटकाने की कोशिश की है। सहारनपुर की तरह ही बिजनौर की सीट भी है, जहां कांग्रेस ने माया के ही पुराने खासमखास नसीमुद्दीन सिद्दीकी को टिकट दे दिया। यहां, सिद्दीकी के चलते बीएसपी उम्मीदवार मलूक नागर की राह भी मुश्किल होने का डर है। दरअसल, कांग्रेस ने सपा की तुलना में बसपा उम्मीदवारों के खिलाफ ही अपने ज्यादातर मजबूत प्रत्याशियों को उतारा है।

सत्ता की 'माया'

सत्ता की 'माया'

कुल मिलाकर पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर बीएसपी और कांग्रेस में मुसलमान वोट बंटने की संभावना नजर आ रही है। पश्चिमी यूपी के मुसलमानों में बहन जी को लेकर एक यह भी धारणा देखी जा रही है कि वह चुनाव के बाद क्या करेंगी, इसका कुछ भी भरोसी नहीं। क्योंकि, यूपी के मुसलमानों के मन में यह बात अभी भी है कि मायावती बीजेपी के साथ रहकर सत्ता सुख भोग चुकी हैं। दूसरी तरफ माया ये बात भी जानती हैं कि मुस्लिम वोटर चुनाव से पहले भले ही असमंजस में दिखे,लेकिन उसका वोट बिखर जाय इसके उदाहरण बिड़ले ही मिलते हैं। ऐसे में माया जानती हैं कि मुसलमान कांग्रेस या बीएसपी में से उसी को वोट करेगा, जिसकी ओर अधिकतम गैर-मुस्लिम वोट आने की संभावना दिखेगी। ऊपर से कांग्रेस के 'न्याय' जैसे लोकलुभावन वादा भी मुसलमानों के एक बड़े वर्ग में 72,000 रुपयों की लालच में बीएसपी से मुंह मोड़ने का बहाना दे रहा है। यहां यह चर्चा भी आम है कि यह दिल्ली का चुनाव है, लखनऊ का नहीं। इलाके में रामपुर की एक कहावत बहुत प्रचलित है- 'टोपी पहना के चाकू फेर देते हैं'। पता नहीं कि बहन जी ने ये कहावत सुनी है या नहीं। लेकिन, उनका डर मौजूदा माहौल में गैर-वाजिब भी नहीं लग रहा।

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