तो अब मनमोहन-आडवाणी की इनके दलों को नहीं जरूरत
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) कांग्रेस के नेता और पूर्व प्रघानमंत्री मनोमहन सिंह और भाजपा के शिखर नेता और पूर्व प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी दशकों से दिल्ली में रहे रहे हैं। दोनों अपने-अपने दलों के बड़े नेता हैं। दोनों दिल्ली में चुनाव लडते रहे हैं।
कैंपेन से दूर
पर दोनों इस विधानसभा चुनावों में प्रचार से दूर हे। दोनों ने एक भी सभा को संबोधित नहीं किया। एक दौर में आडवाणी दिल्ली की राजनीति में खूब दिलचस्पी लेते थे। वे यहां से महानगर पार्षद से लेकर सांसद तक रहे।
लड़ा लोकसभा चुनाव
उधर, मनमोहन सिंह ने यहां से लोकसभा का चुनाव लडा। वे इधर पढ़ाते रहे। दशकों से तो इधर ही रहे हैं। जानकारों का कहना है कि लगता है कि दोनों को इनके दलों ने अब कैंपेन के लायक नहीं माना। इसलिए ये चुनाव कैंपेन से दूर रहे।
हो सकती थीं कुछ सभाएं
कायदे से देखा जाए तो इन दोनों की कुछ सभाएं कराई जा सकती थीं। इन दोनों का देश आदर करता है। हैरानी की बात है कि लालकृष्ण आडवाणी कैंपेन के दौरान रायपुर में भी गए। वहां उन्होंने खुलासा किया कि पहले अटल बिहारी वाजपेयी जनसंघ के स्थान पर नई पार्टी बनाने के लिए सहमत नहीं थे। उनका मानना था कि नई पार्टी को खड़ा करना बेहद कठिन काम था। लेकिन उन्होंने (आडवाणी) ने उन्हें मनाया कि आप और मैं मिलकर यह कर लेंगे। और भाजपा आज सबसे बड़ी पार्टियों में से एक है।
रायपुर में आडवाणी
वे रायपुर में एक पुस्तक विमोचन समारोह में भाग लेने के लिए गए थे। उस समारोह मेंआडवाणी ने एक दिलचस्प बात कही कि एक समय संघ अखबार को छूने को भी तैयार नहीं था। लेकिन वे जब राजनीति में आए तो अखबार वालों से कहना पड़ता था कि हमारे बारे में छापो। बहरहाल इन दोनों नेताओं के ताजा देश के हालतों पर विचार सुनने से देश वंचित रह गया।













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