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ट्यूनीशिया क्यों छोड़ रहा है लोकतंत्र की राह? दुनिया जहान

By BBC News हिन्दी
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ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति कैस सईद को नए संविधान का मसौदा सौंपते संविधान समिति के प्रमुख सादिक़ बेलैद
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ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति कैस सईद को नए संविधान का मसौदा सौंपते संविधान समिति के प्रमुख सादिक़ बेलैद

इस साल जुलाई में ली गई ये तस्वीर पहली नज़र में बेहद मामूली सी लगती है. तस्वीर में दो उम्रदराज़ लोग नज़र आते हैं जिसमें एक शख़्स दूसरे शख़्स को कुछ काग़ज सौंप रहा है. और उनके पीछे नज़र आता है ट्यूनीशिया का झंडा.

दुनिया के कई देशों ख़ासकर मध्य पूर्व के लिए ये तस्वीर उस कहानी का एक ऐसा अनचाहा मोड़ है, जिसकी शुरुआत बहुत उम्मीदों भरी थी.

लगभग एक दशक पहले 'अरब स्प्रिंग' (अरब क्रांति) की शुरुआत ट्यूनीशिया से ही हुई थी. तब इस 'क्रांति' का असर क़रीब क़रीब पूरे अरब जगत में दिखने लगा था और एक के बाद एक देश 'तानाशाही ख़त्म करने' की मांग बुलंद करने लगे.

लेकिन तेज़ी से उभरी उम्मीदें अचानक दरकने लगीं. क्रांति या तो दबा दी गई या फिर संघर्ष छिड़ गया.

इस बीच, ट्यूनीशिया का किस्सा 'कामयाबी की कहानी' के तौर पर सुनाया जा रहा था. इस देश ने लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने का भरोसा बनाए रखा लेकिन अब ये उम्मीदें टूटती दिख रही हैं.

ट्यूनीशिया के राष्ट्रपति कैस सईद संसद भंग करने के साथ ही प्रधानमंत्री को बर्खास्त कर चुके हैं. राष्ट्रपति सईद को संविधान का जो मसौदा सौंपा गया है, उसमें उन्हें कई 'नई और बेहिसाब शक्तियां' हासिल हो गई हैं.

24 जुलाई को हुए जनमत संग्रह में ट्यूनीशिया के लोगों ने इस पर मुहर लगा दी है. कई लोगों की राय है कि ये देश फिर से तानाशाही की तरफ़ बढ़ रहा है.

अगर ऐसा है तो सवाल उठता है कि आख़िर ट्यूनीशिया लोकतंत्र की राह क्यों छोड़ रहा है?

इस सवाल का जवाब जानने के लिए बीबीसी ने चार विशेषज्ञों से बात की.

नया संविधान

ट्यूनिस स्थित 'अरब रिफ़ॉर्म इनीशिएटिव' की रिसर्च फेलो मलेक लखल बताती हैं कि क़ानून के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर कैस सईद साल 2019 के राष्ट्रपति चुनाव में उम्मीदवार थे. सईद ने ट्यूनीशिया के लोगों से वादा किया कि वो भ्रष्टाचार से लड़ेंगे. वो युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो गए.

चुनाव में उन्हें ज़ोरदार जीत मिली. दो साल बाद उन्होंने देश के प्रधानमंत्री को अचानक बर्खास्त कर दिया और संसद भी निलंबित कर दी. अब देश की सत्ता पूरी तरह उनके हाथ में आ गई.

मलेक लखल बताती हैं, "राष्ट्रपति के मुताबिक देश गंभीर संकट में था. ये सच भी है. उस समय देश कोविड से जूझ रहा था. बड़ी संख्या में मामले सामने आ रहे थे. ऑक्सीजन की कमी थी. अस्पतालों में बेड खाली नहीं थे. सरकार इससे निपटने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं कर रही थी. वैक्सीन भी नहीं मिल पा रही थीं. राष्ट्रपति सईद ने बताया कि उन्होंने ये फ़ैसला इसी वजह से किया."

राष्ट्रपति अपने नाटकीय फ़ैसले की वजह भले ही 'देश हित' बता रहे थे लेकिन इसके पीछे कुछ और कारण भी थे.

मलेक लखल बताती हैं, "ट्यूनीशिया की संसद पूरी तरह बंटी हुई थी. बहुमत की स्थिति भी साफ़ नहीं थी. तमाम तरह के संघर्ष चल रहे थे. उन्होंने इस स्थिति का फ़ायदा उठाया और एक व्यक्ति का शासन स्थापित कर दिया."

जनमत संग्रह में वोट डालते लोग
AFP
जनमत संग्रह में वोट डालते लोग

कुछ लोगों ने इसे 'तख़्तापलट' कहा. इस घटना के करीब 12 महीने बाद यानी जून में राष्ट्रपति सईद के हाथों में नए संविधान का मसौदा था.

मलेक लखल कहती हैं, "ये निजी तौर पर लिखी गई इबारत थी. कैस सईद ने शायद इसे कुछ साल पहले लिखा होगा. नया संविधान संसदीय प्रणाली की तरफ से मुंह फेर रहा है ताकि यहां पूरी तरह राष्ट्रपति प्रणाली लागू हो जाए. राजनीतिक तौर पर ये उन सियासी पार्टियों को ख़ारिज करने जैसा है जिन्होंने बीते दस साल के दौरान राजनीतिक प्रक्रिया में हिस्सा लिया है."

राष्ट्रपति सईद ने देश का नियंत्रण सीधा अपने हाथ में ले लिया. इस फ़ैसले का अब तक बहुत कम विरोध हुआ है.

मलेक लखल, "मुझे लगता है कि लोकतंत्र से आर्थिक तौर पर जो हासिल हुआ, उससे लोग संतुष्ट नहीं थे. दिक्कत लोकतंत्र नहीं है. क्रांति आर्थिक मोर्चे पर होनी चाहिए थी लेकिन हम वैसा होता नहीं देख रहे हैं. उसके बजाए लोग संविधान बदल रहे हैं."

इस पूरी प्रकिया में क्या ग़लती हुई, ये समझने के लिए हमें एक दशक से ज़्यादा पीछे जाना होगा और समझना होगा कि उस वक़्त हुई क्रांति के ज़रिए ट्यूनीशिया के लोग किस तरह का बदलाव लाना चाहते थे.

अरब क्रांति के दौरान कई देशों में विरोध प्रदर्शन के दौरान मोहम्मद बोज़ीज़ी की तस्वीर नज़र आती थी.
AFP
अरब क्रांति के दौरान कई देशों में विरोध प्रदर्शन के दौरान मोहम्मद बोज़ीज़ी की तस्वीर नज़र आती थी.

किस बदलाव की थी आस?

ये साल 2010 की घटना है. ट्यूनीशिया में मोहम्मद बोज़ीज़ी सड़क पर फल और सब्ज़ी बेचकर परिवार का गुज़ारा करते थे. 26 साल के बोज़ीज़ी के पास सामान बेचने का परमिट नहीं था और अक्सर उन्हें स्थानीय अधिकारियों को रिश्वत देनी होती थी.

एक दिन उनके पास देने के लिए नकद पैसे नहीं थे तो अधिकारियों ने उनका सामान उठा लिया. वो तारीख थी 17 दिसंबर. मोहम्मद बोज़ीज़ी इस कदर परेशान हो गए कि उन्होंने ख़ुद को आग लगा ली. कुछ हफ़्ते बाद उनकी मौत हो गई.

उस युवा स्ट्रीट वेंडर की तकलीफ़ कई श्रमिकों को अपनी दिक्कत जैसी लगी. ये घटना पूरे देश में विरोध प्रदर्शन की वजह बन गई.

लुंद यूनिवर्सिटी के 'सेंटर फ़ॉर एडवान्स्ड मिडिल ईस्टर्न स्टडीज़' की रिसर्चर सारा एन रेनिक बताती हैं, "मेरे समेत कई लोग इस बात से हैरान थे कि कैसे अलग अलग क्षेत्रों के लोग इतनी जल्दी उठ खड़े हुए और लंबे समय से सत्ता पर काबिज अधिनायकवादी शासक को उखाड़ फेंका."

ट्यूनीशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति ज़िने अल आबिदीन बेन अली को पद से हटाया जाना वाकई एक हैरान करने वाली घटना थी. बेन अली ने दो दशक से ज़्यादा वक़्त तक ट्यूनीशिया की सत्ता पर कड़ा शिंकजा बनाए रखा था लेकिन विरोध प्रदर्शन बढ़ते ही वो भाग निकले.

सारा बताती हैं कि बेन अली जिस तरह सरकार चला रहे थे, उस इलाक़े के कई देशों में सरकारें उसी तरीके से चलाई जा रही थीं.

सत्ता का प्रारूप ऐसा था कि शीर्ष पर मौजूद नेता खुद को 'फादर ऑफ़ द नेशन' बताते थे. वो ही देश चलाने के लिए नियम और शर्तें तय करते थे.

लेकिन शासन के इस तरीके से हर कोई खुश नहीं था.

सारा एन रेनिक बताती हैं, "वहां भ्रष्ट्राचार हो रहा था. कहने का मतलब ये है कि वहां लोग या तो कामयाब थे या फिर नाकाम. तब के सिस्टम में अगर आप नाकाम लोगों में शामिल होते तो उस स्थिति से बाहर निकलने के लिए आपके हाथ में बहुत कुछ नहीं होता."

सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के पास आगे बढ़ने के बहुत कम मौके थे.

सारा बताती हैं, "विरोध की आवाज़ के लिए कोई जगह नहीं थी. लोगों पर काफ़ी अत्याचार होते थे. वहां सीक्रेट पुलिस थी. लोगों को आधी रात में उठा लिया जाता था. वो बताती हैं कि देश चलाने का ढर्रा भी बहुत बेतरतीब था. साल 2007 में जब आर्थिक दिक्कतों की शुरुआत हुई तब देश की अर्थव्यवस्था की खामियां पूरी तरह उजागर हो गईं."

सारा एन रेनिक कहती हैं, "अगर हम ये सोचें कि वो क्रांति क्यों हुई थी तो हम पाएंगे कि उसकी वजह ये सारे कारण ही थे. उसकी वजह थी सामाजिक न्याय का अभाव, भ्रष्टाचार, जुल्म, और जवाबदेही का अभाव. ये एक तरह से सरकार और समाज के संबंधों की दोबारा रचना थी."

सारा बताती हैं कि विरोध करने वाले लोग सबसे पहले तब की सरकार को बदलना चाहते थे. उसके बाद भ्रष्टाचार और जुल्म पर रोक लगाने की मांग थी. सभी नागरिकों की अधिकार समान हों, मांग ये भी थी.

ट्यूनीशिया से शुरू हुई क्रांति लीबिया, मिस्र, मोरक्को, यमन, सीरिया और बहरीन तक फैल गई. इसे 'अरब स्प्रिंग' या 'अरब क्रांति' कहा गया. इसे लोकतंत्र स्थापित करने का प्रयास भी बताया गया.

लेकिन, सारा बताती हैं कि इस इलाके में क्रांति को लोकतंत्र लाने की कोशिश के तौर पर नहीं देखा जा रहा था.

सारा एन रेनिक बताती हैं, "पश्चिमी देश इसे जिस तरह देख रहे थे, इस इलाके में अभियान के मायने वैसे नहीं थे. विरोध प्रदर्शन में शामिल लोग सत्ता बदलने की मांग कर रहे थे लेकिन लोकतंत्र स्थापित करना उनकी शुरुआती मांगों में शामिल नहीं था. वो सरकार बदलना चाहते थे."

इस इलाके के कुछ देशों में तत्कालीन सरकारें गिर गईं और लोगों को लगा कि उन्हें न्याय मिल गया है. ट्यूनीशिया में अपदस्थ नेता बेन अली को कई अपराधों का दोषी ठहराया गया. लेकिन वो सऊदी अरब भाग गए और जेल नहीं गए. कई साल बाद निर्वासन में ही उनकी मौत भी हुई.

उस क्रांति को 10 साल से ज़्यादा लंबा अर्स हो चुका है. इस इलाक़े के तमाम देशों में अधिनायकवादी शासन की वापसी के बावजूद ट्यूनीशिया लोकतंत्र की राह पर बढ़ता रहा लेकिन अब वो कदम पीछे क्यों खींच रहा है?

राष्ट्रपति कैस सईद के समर्थक
Reuters
राष्ट्रपति कैस सईद के समर्थक

टूट गया सपना

पत्रकार रश्मि रोशन लाल कई साल ट्यूनीशिया में रही हैं और वहां की राजनीति को करीब से देखा है.

वो बताती हैं, " ट्यूनीशिया ऐसा देश है जो एक स्लोगन में फंसकर रह गया. अरब स्प्रिंग का जन्म यहीं से हुआ था. ये पूरे अरब जगत के लिए रोल मॉडल था. 2011 की क्रांति की वजह आर्थिक और राजनीतिक दोनों थीं. उसके बाद ट्यूनीशिया को लोकतंत्र के फ़ायदे नहीं मिले. ट्यूनीशिया के लोगों ने खुद को ठगा सा महसूस किया. यही कारण है कि अपने राष्ट्रपति के सत्ता पर कब्ज़ा करने की कोशिश का उन्होंने ज़्यादा विरोध नहीं किया."

ट्यूनीशिया के मौजूदा राष्ट्रपति कैस सईद 2019 में सत्ता में आए. तानाशाह बेन अली को सत्ता से बाहर करने वाली क्रांति को तब तक कई साल बीत चुके थे. क्रांति के बाद जो संविधान तैयार हुआ था, उसके मुताबिक सईद को प्रधानमंत्री के साथ सत्ता में साझेदारी करनी थी. लेकिन राष्ट्रपति चुने जाने के दो साल बाद उन्होंने अचानक संसद को निलंबित कर दिया.

रश्मि रोशन लाल बताती हैं, "लोग सड़कों पर थे. वो चिल्ला रहे थे. मैं कैस हूं. मैं ट्यूनीशिया हूं. वो लोग खुश थे कि ऐसा हुआ. वो खुश थे कि राष्ट्रपति कैस सईद ने सत्ता की बागडोर हाथ में लेने का फ़ैसला किया. राष्ट्रपति के फ़ैसले को लेकर धारणा बनी कि वो ताक़तवर और फैसला लेने वाले व्यक्ति हैं जो उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करेंगे."

रश्मि की राय है कि ट्यूनीशिया के लोगों के मौजूदा राष्ट्रपति के फ़ैसले का विरोध न करने की एक और वजह है. वहां के लोग पीढ़ियों से जिस सिस्टम के तहत जिए हैं, उन्हें उसके साथ अब भी एक जुड़ाव महसूस होता है.

रश्मि दावा करती हैं कि ट्यूनीशिया के कुछ लोग तानाशाह बेन अली के शासन को अच्छी बातों के लिए याद करते हैं. वो कहते हैं कि तब बेरोज़गारी और ग़रीबी कम थी. ऐसे लोग बेन अली के शासन में हुए भ्रष्टाचार और मानवाधिकार हनन के मामलों की तरफ आंखें मूंद लेते हैं.

राष्ट्रपति कैस सईद के समर्थक
AFP
राष्ट्रपति कैस सईद के समर्थक

उधर, मौजूदा राष्ट्रपति के सत्ता हथियाने का विरोध कम होने की वजह ये भी है कि देश में लोकतंत्र आने के बाद लोगों के जीवन स्तर में सुधार नहीं हुआ.

रश्मि रोशन लाल बताती हैं, "उन्हें उम्मीद थी कि ज़्यादा नौकरियां मिलेंगी. ज़्यादा अवसर हाथ आएंगे. वो भ्रष्टाचार ख़त्म होने की आस लगाए थे. मेरी राय में ट्यूनीशिया के लोगों को लगता है कि लोकतांत्रिक बदलाव के ज़रिए जो उम्मीदें लगाई गईं थीं, वो पूरी नहीं हुईं."

लोग आर्थिक सुधार न होने से निराश हैं. ट्यूनीशिया में लोकतंत्र से लगाई गईं उम्मीदें टूटने का एक उदाहरण यहां की 'ऑलिव ऑयल इंडस्ट्री' की दुर्दशा है. ट्यूनीशिया ऑलिव ऑयल उत्पादन के लिहाज से दुनिया के आला देशों में है लेकिन यहां मूलभूत ढांचे पर इतना कम पैसा खर्च किया गया है कि फसल मौसम की मेहरबानी के भरोसे रहती है.

रश्मि रोशन लाल बताती हैं, "अगर बारिश कम होती है तो सिंचाई के इंतजाम नहीं होने से फसल प्रभावित होती है. ब्रैंडिंग को लेकर भी काम नहीं किया गया है. ट्यूनीशिया में ऑलिव आयल उत्पादक बड़े पैमाने पर अपना प्रोडक्ट इटली और स्पेन को निर्यात करते हैं. अगर उनका ब्रैंडेड प्रोडक्ट होता तो ज़्यादा कीमत मिल सकती थी."

रश्मि कहतीं हैं, "लोगों को लगता है कि क्रांति के बाद आए लोकतंत्र के जरिए नतीजे हासिल नहीं हुए."

वो कहती हैं कि ट्यूनीशिया एक तरह से 'प्रयोगशाला' बनकर रह गया. कई लोगों को लगता है कि लोकतंत्र के साथ प्रयोग के नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं रहे.

ट्यनीशिया के राष्ट्रपति कैस सईद
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ट्यनीशिया के राष्ट्रपति कैस सईद

लोकतंत्र का भविष्य

'कावाकिबी डेमोक्रेसी ट्रांजिशन सेंटर' के डायरेक्टर अमीन घाली कहते हैं, "लोकतंत्र को हम क़ानून के राज, बेहतर प्रशासन और मानवाधिकारों को बढ़ावा देने और सुरक्षित रखने वाली प्रणाली के तौर पर देखते हैं. बहुत सारे लोगों के लिए लोकतंत्र का मतलब है प्रशासन का बेहतर तरीका. बेहतर सेवाएं. ज़्यादा सम्मान, नौकरियों के ज़्यादा मौके और बेहतर जीवन स्तर."

अमीन का संगठन मध्य पूर्व में लोकतंत्र, सुधार और शासन प्रक्रिया के बदलाव से जुड़े मुद्दों पर काम करता है.

ट्यूनीशिया में जो हुआ उसके बावजूद अमीन को भरोसा है कि मध्य पूर्व के देशों में लोकतांत्रिक प्रणाली कामयाब होगी लेकिन सवाल है कि अब तक नतीजे नज़र क्यों नहीं आए?

इस सवाल पर अमीन कहते हैं, "क्योंकि यहां तानाशाहों के शासन की एक लंबी परंपरा रही है. फिर ट्यूनीशिया और कुछ और देशों में आर्थिक सुधार भी नहीं हुए. जिन देशों में हाल फिलहाल लोकतंत्र आया वहां के लोग और इन देशों में लोकतंत्र का समर्थन करने वाले अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने राजनीतिक सुधार पर बहुत ज़्यादा ध्यान दिया. आर्थिक सुधारों को या तो नज़रंदाज़ कर दिया गया या फिर उसकी रफ़्तार बहुत धीमी थी."

क्या इसका एक कारण ये भी है कि लोग काफ़ी हद तक एक नेता के हाथ में सत्ता देखने के आदी रहे हैं. जिसे वो दोषी ठहरा सकें या जिसकी वो पूजा करें या तारीफ़ करें, क्या ऐसे में उनके लिए लोकतंत्र साथ तालमेल बिठाने में मुश्किल होती है, अमीन इस सवाल का भी जवाब देते हैं.

वो कहते हैं, "ये सही है. लोकतंत्र को वो एक कमज़ोर प्रणाली के तौर पर देखते हैं. लोगों ने बरसों तक एक ताक़तवर व्यक्ति का शासन देखा होता है. जहां सरकार चलाना 'वनमैन शो' है. वो फ़ैसले नीति नियंताओं के हाथ छोड़ देते हैं और खुद बैठकर या तो तमाशे का मज़ा लेते हैं या फिर कमियां निकालते हैं. मेरी राय में ये तानाशाही शासन की विरासत है. यहां नागरिकों के बीच लोकतांत्रिक संस्कृति को बढ़ावा देने की कोई कोशिश नहीं की गई है."

ट्यूनीशिया में राजनीतिक संकट बढ़ने की वजह आर्थिक चुनौतियां मानी जा रही हैं.
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ट्यूनीशिया में राजनीतिक संकट बढ़ने की वजह आर्थिक चुनौतियां मानी जा रही हैं.

मुस्लिम देशों में मजहब और राजनीति का करीबी गठजोड़ है. यहां एक सार्थक मतदान प्रणाली स्थापित करने में दिक्कत पेश आती हैं. लेकिन क्या वाकई ऐसा है?

इस सवाल पर अमीन कहते हैं, "मुझे लगता है कि अरब या मुस्लिम इलाक़े को लेकर ये बहुत ही सतही तर्क है. पश्चिमी देशों में हमने मुस्लिम समुदाय को लोकतांत्रिक प्रणाली में अच्छी तरह घुलते मिलते देखा है. हमने मुस्लिम जगत के कुछ देशों को लोकतंत्र की तरफ कदम बढ़ाते देखा है."

हालांकि, अमीन घाली ये बताना नहीं भूलते हैं कि अरब जगत के देशों में पड़ोस में होने वाले बदलाव को लेकर चिंता दिखती है. खासकर तब जब उनके यहां तानाशाही हो और पड़ोसी देश का बदलाव लोकतंत्र की तरफ हो.

लौटते हैं उसी सवाल पर कि ट्यूनीशिया लोकतंत्र की राह क्यों छोड़ रहा है?

जैसा कि हमारे एक्सपर्ट ने बताया कि ट्यूनीशिया में हुई क्रांति की सबसे अहम वजह जीवन स्तर में सुधार की आस थी. वहां लोग तत्कालीन शासक को हटाना चाहते थे.

क्रांति के बाद ट्यूनीशिया में गरीबी घटी लेकिन बदलाव इतना नहीं हुआ कि लोग ये मान लें कि तानाशाही ख़त्म होने के बाद उनकी स्थिति बेहतर हुई है. अब ये देश दोबारा एक व्यक्ति के शासन की तरफ बढ़ता दिख रहा है.

इस साल के आखिर में चुनाव होने हैं. ट्यूनीशिया के लोगों के पास तब ये बताने का मौका होगा कि देश के भविष्य को वो किस तरफ ले जाना चाहते हैं.

बदलाव से जुड़े तमाम संकेतों के बीच हमारे चौथे एक्सपर्ट अमीन घाली की राय है, " बेहतर गवर्नेंस, संसाधनों पर ज़्यादा अधिकार और और ज़्य़ादा अवसरों की मांग करने वाले लोकतंत्र बहाली के लिए आवाज़ उठाते रहेंगे."

वो कहते हैं कि फिर एक दिन ऐसा आएगा जब अरब जगत में लोकतंत्र की बयार पिछली क्रांति से भी ज़्यादा दमदार असर पैदा करेगी.

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