महेंद्र सिंह टिकैत ने अचानक विशाल धरना क्यों ख़त्म कर दिया था

महेंद्र सिंह टिकैत ने अचानक विशाल धरना क्यों ख़त्म कर दिया था

सोफ़े पर पालथी मार कर खाँटी गोरखपुरिया लहजे में अपने अफ़सरों को निर्देश देने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने कभी सपने में नहीं सोचा था कि खाँटीपन में कोई और भी उन्हें मात दे सकता है.

उन्हें इसका एहसास तब हुआ जब 1987 में वीर बहादुर सिंह करमूखेड़ी बिजलीघर पर प्रदर्शन से शुरू हुए किसान आंदोलन से आजिज़ आ गए तो उन्होंने भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष महेंद्र सिंह टिकैत से संपर्क साध कर कहा कि वो उनके गाँव सिसौली आ कर किसानों के पक्ष में कुछ फ़ैसलों की घोषणा करना चाहते हैं.

टिकैत इसके लिए राज़ी भी हो गए लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि इस बैठक में न तो कांग्रेस पार्टी का कोई झंडा होगा और न ही वीर बहादुर सिंह के साथ काँग्रेस का कोई नेता या पुलिस आएगी.

11 अगस्त 1987 को जब वीर बहादुर सिंह के हेलिकॉप्टर ने सिसौली में लैंड किया तो उनका स्वागत करने के लिए वहाँ कोई भी मौजूद नहीं था और उन्हें सम्मेलन स्थल जाने के लिए क़रीब आधा किलोमीटर पैदल चलना पड़ा. मंच पर जब उन्होंने पानी पीने की इच्छा प्रकट की तो उन्हें टिकैत के लोगों नें उनके दोनों हाथ जुड़वा कर चुल्लू में पानी पिलाया.

वीर बहादुर सिंह ने इस तरह से पानी पिलाने को अपने अपमान के तौर पर लिया. टिकैत यहाँ पर ही नहीं रुके. जब वो मंच से बोलने खड़े हुए तो उन्होंने वीर बहादुर सिंह की मौजूदगी में ही उन्हें काफ़ी खरी खोटी सुनाई. वीर बहादुर इससे इतने नाराज़ हुए कि वो बिना कोई घोषणा और बातचीत किए हुए वापस लखनऊ लौट गए.

महेंद्र सिंह टिकैत ने अचानक विशाल धरना क्यों ख़त्म कर दिया था

राजनेताओं को हमेशा अपने मंच से दूर रखा

छह फ़िट से भी अधिक लंबे, हमेशा गाढ़े का कुर्ता और गाँधी टोपी पहनने वाले और कमर पर दर्द से छुटकारा पाने के लिए एक पट्टा बाँधने वाले महेंद्र सिंह टिकैत का जन्म 6 अक्टूबर 1935 में शामली से 17 किलोमीटर दूर सिसौली गाँव में हुआ था.

अपने पिता की मृत्यु के बाद जब वो बालियान खाप के चौधरी बने तो उनकी उम्र थी मात्र आठ साल.

वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री बताते हैं कि 'महेंद्र सिंह टिकैत संयोगवश किसान नेता बने थे. दरअसल, चौधरी चरण सिंह की मौत के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक बहुत बड़ा राजनीतिक शून्य पैदा हुआ. उसी दौरान उत्तर प्रदेश की सरकार ने किसानों को दी जानेवाली बिजली के दाम बढ़ा दिए. किसानों ने उसके विरोध में प्रदर्शन शुरू कर दिया. चूँकि टिकैत बालियान खाप के चौधरी थे इसलिए उनको आगे किया गया. उस प्रदर्शन में पुलिस की गोली से दो लोग मारे गए. उस घटना ने महेंद्र सिंह टिकैत को अचानक किसानों का नेता बना दिया.'

एक और वरिष्ठ पत्रकार और बीबीसी में काम कर चुके क़ुर्बान अली बताते हैं कि 'फ़ायरिंग के दो या तीन दिन बाद जब मैं टिकैत का इंटरव्यू करने उनके गाँव पहुंचा तो मैंने देखा कि सैकड़ों लोग उनके आसपास बैठे हुए थे और उन्होंने अपने घर में देसी घी का एक चिराग जला रखा है. उस समय वो सियासत का एबीसीडी भी नहीं जानते थे. बल्कि जब उन्होंने भारतीय किसान यूनियन बनाई तो बड़े मोटे अक्षरों में उन्होंने उसके पहले लिखा 'अराजनीतिक.'

किसी भी राजनीतिक दल को उन्होंने अपने मंच पर आने नहीं दिया. यहाँ तक कि जब चरण सिंह की विधवा गायत्री देवी और उनके बेटे अजित सिंह जब उनके मंच के पास पहुंचे तो उन्होंने हाथ जोड़ कर कहा कि हमारे मंच पर कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं आ सकता.'

महेंद्र सिंह टिकैत ने अचानक विशाल धरना क्यों ख़त्म कर दिया था

दिल्ली के पत्रकारों को नहीं समझ आता था टिकैत का लहजा

महेंद्र सिंह टिकैत की ख़ासियत थी कि वो सर्वसुलभ थे. विनोद अग्निहोत्री बताते हैं कि 'जब टिकैत अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे तब भी वो अपने हाथों से खेती किया करते थे. मैंने ख़ुद अपने हाथों से उन्हें गन्ना काटते देखा है. वो ठेठ गाँव की भाषा में हर व्यक्ति से संवाद करते थे. शहरी बोली बोलना उन्हें नहीं आता था.'

'जब मैं नवभारत टाइम्स का पश्चिमी उत्तर प्रदेश का संवाददाता था. मेरठ में तब दिल्ली से आने वाला हर पत्रकार मुझे अपने साथ टिकैत के पास ले जाता था ताकि मैं उनके लिए दुभाषिए का काम करूँ क्योंकि उन्हें टिकैत की बोली समझने में मुश्किल होती थी. टिकैत बहुत ही स्पष्टवादी थे और अगर किसी की बात उन्हें पसंद न आई तो वो उसके मुँह पर ही उसे झिड़क देते थे.'

मेरठ दंगों को न फैलने देने में टिकैत की भूमिका

वो प्रेम विवाह और टेलीविजन देखने के सख़्त ख़िलाफ़ थे लेकिन शोले फ़िल्म देखने के लिए कभी मना नहीं करते थे. टिकैत को चौधरी चरण सिंह के बाद किसानों का दूसरा मसीहा कहा जाता था.

प्रचलित कहानी है कि सातवीं सदी के राजा हर्षवर्धन ने उनके परिवार को टिकैत नाम दिया था. लेकिन बीसवीं सदी में अस्सी का दशक आते आते महेंद्र सिंह टिकैत ख़ुद 'किंगमेकर' बन चुके थे और 12 लोकसभा और 35 विधानसभा क्षेत्रों में रह रहे दो करोड़ 75 लाख जाट मतदाताओं में उनका असर साफ़ देखा जा सकता था.

1987 में मेरठ में बहुत ख़ौफ़नाक सांप्रदायिक दंगे हुए थे. क़ुर्बान अली बताते हैं कि 'ये दंगे तीन महीनों तक चले थे लेकिन टिकैत ने मेरठ शहर की सीमा के बाहर इन दंगों को जाने नहीं दिया था. उन्होंने गाँव-गाँव जा कर पंचायत की और हिंदुओं और मुसलमानों को एकजुट रखा.'

उनके मंच पर हमेशा एक मुसलमान नेता होता था. वो ख़ुद मंच पर नहीं बैठते थे. हमेशा किसानों के साथ नीचे बैठते थे और मंच पर भाषण दे कर फिर किसानों के बीच चले जाते थे.

महेंद्र सिंह टिकैत ने अचानक विशाल धरना क्यों ख़त्म कर दिया था

'सिसौली से दिल्ली तक बुग्गी से बुग्गी जोड़ेंगे'

टिकैत के करियर का सबसे बड़ा क्षण तब आया जब उन्होंने 25 अक्टूबर 1988 को दिल्ली के मशहूर बोट क्लब के लॉन पर क़रीब पाँच लाख किसानों को इकट्ठा किया. उनकी माँग थी कि गन्ने का अधिक मूल्य दिया जाए, पानी और बिजली की दरों कम की जाएं और किसानों के कर्ज़े माफ़ किए जाएं.

दिल्ली आने से पहले उन्होंने शामली, मुज़फ़्फ़रनगर और मेरठ में बहुत बड़े धरने दिए थे. मेरठ में उन्होंने 27 दिनों तक कमिश्नरी का घेराव किया था.

विनोद अग्निहोत्री याद करते हैं, 'दिल्ली जाने की घोषणा उन्होंने अपनी ख़ास शैली में की थी. सिसौली में उनके गाँव में महीने की हर 17 तारीख़ को एक पंचायत हुआ करती थी किसानों की. उसी में उन्होंने ऐलान किया था कि एक हफ़्ते बाद हम सिसौली से दिल्ली तक बुग्गी से बुग्गी जोड़ेंगे. उसके बाद केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस के हाथ पाँव फूल गए थे.'

'पहले कोशिश की गई कि वो दिल्ली न आएं इसके लिए उस समय के गृह मंत्री बूटा सिंह. राजेश पायलट, बलराम झाकड़ और नटवर सिंह ने बहुत कोशिश की लेकिन वो टिकैत को मना नहीं पाए. बाद में उन्हें दिल्ली आने दिया गया. ये माना गया कि किसान दिल्ली में एक या दिन दो दिन रुक कर वापस चले जाएंगे लेकिन उन्होंने तो इंडिया गेट और विजय चौक के बीच एक तरह का डेरा जमा दिया.'

राजपथ पर जले चूल्हे

मध्य दिल्ली के इस प्रतिष्ठित इलाके पर इस तरह किसानों का कब्ज़ा न तो पहले कभी हुआ था और न ही आज तक हो पाया है. वो पश्चिमी उत्तर प्रदेश से ट्रैक्टरों, ट्रॉलियों और बैल गाड़ियों के काफ़िले में क़रीब एक हफ़्ते का राशन लिए दिल्ली में घुसे थे और आनन-फ़ानन में उन्होंने बोट क्लब को अपना अस्थायी घर बना लिया था.

एक दो दिन तो सरकार ने उनकी तरफ़ कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन जब उन्होंने राजपथ के अगल बगल तंबू तानकर अपने चूल्हे जलाने शुरू कर दिए और उनके साथ आए मवेशियों ने बोट क्लब की घास चरनी शुरू कर दी तो सत्ता के गलियारों में खलबली मच गई.

दिन में ये किसान टिकैत और दूसरे किसान नेताओं के भाषण सुनते और रात में गाने बजाने का दौर चलता. विजय चौक से इंडिया गेट तक किसानों के लेटने के लिए पुआलें बिछा दी गई थीं.

दिल्ली के संभ्रांत वर्ग के लिए वो एक बहुत बड़ा झटका था जब उन्होंने इन दबे कुचले किसानों को क्नॉट प्लेस के फव्वारों में नहाते देखा. रात में बहुत से लोग क्नॉट प्लेस बाज़ार के दालान में चादर बिछा कर सोने भी लगे. लेकिन टिकैत को इसकी कोई परवाह नहीं थी. वो वहाँ तब तक टस से मस नहीं होने वाले थे जब तक सरकार उनकी मांगों को मानने के लिए राज़ी नहीं हो जाती. इस बीच उनका प्रिय हुक्का हमेशा उनके सामने रहता और वो बीच बीच में माइक पर जा कर अपने लोगों का मन लगाए रखते.

महेंद्र सिंह टिकैत ने अचानक विशाल धरना क्यों ख़त्म कर दिया था

शोर भरा संगीत बजा कर टिकैत को हटाने की कोशिश

पुलिस ने राजपथ के पास इकट्ठा हो गए लाखों किसानों को भगाने के लिए हर संभव हथकंडे अपनाए. उस इलाके में पानी और खाने की सप्लाई रोक दी गई.

आधी रात के बाद उन लोगों और उनके मवेशियों को परेशान करने के लिए लाउड स्पीकर पर शोर भरा संगीत बजाया जाता. दिल्ली के सभी स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए गए और दिल्ली के सभी वकील भी किसानों के समर्थन में हड़ताल पर चले गए.

नैनीताल के कुछ अमीर किसानों ने वहाँ धरना दे रहे किसानों के लिए सेब से भरे ट्रैक्टर और गाजर का हलवा भिजवाया. उस समय हरियाणा के मुख्यमंत्री और कद्दावर जाट नेता देवी लाल को महेंद्र सिंह टिकैत का इस तरह प्रदर्शन करना रास नहीं आया था.

उनकी नज़र में उन्हें राजनीतिक सत्ता हासिल करने के लिए पहले लड़ाई लड़नी चाहिए थी. उस ज़माने में न तो मोबाइल फ़ोन थे और न ही इंटरनेट और टेलिविजन चैनल. लेकिन इसके बावजूद टिकैत का आंदोलन कृषि विशेषज्ञों और सरकार का ध्यान अपनी तरफ़ खींचने में सफल रहा था.

अचानक धरना वापस लेने का किया ऐलान

महेंद्र सिंह टिकैत और राहुल गांधी
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महेंद्र सिंह टिकैत और राहुल गांधी

बोफ़ोर्स स्कैंडल से जूझ रहे राजीव गाँधी को उनके सलाहकारों ने टिकैत से न उलझने की सलाह दी थी. सरकार की तरफ़ से रामनिवास मिर्धा और श्यामलाल यादव टिकैत से बात कर रहे थे. इस बात का भी दबाव था कि 31 अक्तूबर से पहले सारा मामला निपटा लिया जाए क्योंकि उसी स्थान पर इंदिरा गाँधी की पुण्यतिथि का समारोह मनाया जाने वाला था.

आख़िरकार सरकार ने इंदिरा गाँधी की पुण्यतिथि की रैली का स्थान बदल कर शक्ति स्थल कर दिया. सरकार को परेशानी में देख टिकैत को मज़ा आ रहा था.

वो बार-बार कह रहे थे, 'पता नहीं कब तक हमें यहाँ रुकना पड़े. किसानों को किराए पर यहाँ नहीं लाया गया है.'

लेकिन 30 अक्टूबर को अचानक शाम को चार बजे टिकैत ने ऐलान किया कि भाइयों बहुत दिन हो गए. हमें घर पर कामकाज करना है. हम ये धरना ख़त्म करते हैं और अपने गाँवों को वापस चलते हैं.

राजनीतिक टीकाकारों के लिए ये आश्चर्यजनक था क्योंकि तब तक सरकार ने औपचारिक रूप से टिकैत की 35 सूत्री माँगों में से एक भी माँग को नहीं माना था. ये आश्वासन ज़रूर दिया गया था कि उनकी माँगों पर सहानुभूति पूर्वक विचार किया जाएगा.

टिकैत के इस ऐलान के बाद किसानों ने राजपथ से अपना सामान समेटना शुरू कर दिया था. किसानों के इस शक्ति प्रदर्शन के बाद से ही बोट क्लब पर रैलियों के आयोजन पर प्रतिबंध लगा दिया गया.

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