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जे ओमप्रकाश अपनी फ़िल्मों के नाम 'ए' अक्षर से ही क्यों रखते थे?

By प्रदीप सरदाना

जे ओमप्रकाश मेहरा
Hrithik roshan/ twitter
जे ओमप्रकाश मेहरा

आदमी मुसाफ़िर है, आता है जाता है, आते जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है...

फ़िल्म संगीत के लगभग सभी प्रेमी, फ़िल्म 'अपनापन' के इस सुपर हिट गीत से परिचित होंगे. निर्माता निर्देशक जे ओमप्रकाश की 'अपनापन' जब 1978 में प्रदर्शित हुई थी तब इस गीत और इस फ़िल्म ने सफलता-लोकप्रियता के कई नए आयाम बनाकर धूम मचा दी थी.

और अब.... 'अपनापन' सहित 'आया सावन झूम के','आन मिलो सजना', 'आप की कसम','आशा' और 'आखिर क्यों' जैसी अन्य कई सुपर हिट फ़िल्मों के फ़िल्मकार जे ओमप्रकाश इस दुनिया को अलविदा कह सभी को गमगीन कर गए हैं. साथ ही ज़िंदगी के इन आते जाते रस्तों में अपनी बहुत सी यादें छोड़ गए हैं.

यूं जे ओमप्रकाश की सभी फ़िल्मों के गीत लोकप्रिय होने के साथ-साथ अपने सुंदर शब्दों-बोलों के लिए भी याद किए जाते हैं. लेकिन अपनी फ़िल्मों के गीतों में जो गीत उन्हें सबसे ज़्यादा पसंद था, वह गीत- 'आदमी मुसाफ़िर है' ही था.

आज बहुत से लोग जब भी जे ओमप्रकाश की बात करते हैं तो उन्हें मशहूर अभिनेता ऋतिक रोशन के नाना के रूप में याद करते हैं. लेकिन सही मायने में एक फ़िल्मकार के रूप में जे ओमप्रकाश का अपना क़द बहुत बड़ा है.

एक ज़माना था जब उनके नाम की तूती बोलती थी. तब फ़िल्म इंडस्ट्री में सफलता का दूसरा नाम जे ओमप्रकाश था.

राकेश रोशन की पत्नी पिंकी, जे ओमप्रकाश की बेटी हैं. इस नाते वह राकेश रोशन के ससुर थे. लेकिन राकेश उन्हें अपने ससुर से ज़्यादा पिता मानते रहे. जे ओमप्रकाश ने अपने दामाद राकेश के साथ 'आँखों आँखों में' सहित कुछ और भी फ़िल्में बनायीं.

उधर ऋतिक ने भी सबसे पहले 6 साल की उम्र में अपने नाना की फ़िल्म 'आशा' से ही फ़िल्मों में पदार्पण किया. बाद में भी ऋतिक ने अपने नाना संग बाल कलाकार के रूप में 'आस पास' और 'भगवान दादा' जैसी फ़िल्में भी कीं.

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ऋतिक के साथ रिश्ता

जे ओमप्रकाश और ऋतिक यानि इन नाना और नाती के बीच बहुत ही ख़ूबसूरत, मधुर और मजबूत रिश्ता था. दोनों के बीच गज़ब का प्रेम था.

यहाँ तक जे ओमप्रकाश अपनी वसीयत में भी यह लिख गए थे कि उनका अंतिम संस्कार ऋतिक ही करेंगे.

हाल ही में जब ऋतिक की फ़िल्म 'सुपर-30' प्रदर्शित हुई तब ऋतिक ने कहा था, ''मेरे सुपर टीचर तो मेरे नाना जे ओमप्रकाश हैं.'' ऋतिक उन्हें प्यार से डेडा कहते थे.

फ़िल्म अभिनेता ऋतिक रोशन अपने नाना जे ओमप्रकाश के साथ
Hrithik roshan/ twitter
फ़िल्म अभिनेता ऋतिक रोशन अपने नाना जे ओमप्रकाश के साथ

स्पॉट ब्वॉय के रूप में करियर शुरू

आज़ादी से पहले के अविभाजित भारत के सियालकोट में 24 जनवरी 1927 को जन्मे जे ओमप्रकाश के पिता लाहौर के एक स्कूल में शिक्षक थे. इसलिए जे ओमप्रकाश को भी पढ़ने का शौक बचपन से था.

देश आज़ाद होने के बाद ओमप्रकाश मुंबई आ गए. जहां उन्होंने फ़िल्म लाइन में कुछ करने की ठानी. लेकिन राह आसान नहीं थी. ओमप्रकाश को एक स्पॉट ब्वॉय के रूप में काम करना पड़ा.

अपनी एक व्यक्तिगत बातचीत में जे ओमप्रकाश ने एक बार कहा था, "मैं स्पॉट ब्वॉय रहा या फिल्मों में कुछ और छोटे मोटे काम किए लेकिन मैं हमेशा यह देखता था कि निर्देशक किसी दृश्य को कैसे फिल्मांकित करते हैं. इससे मैं काफी कुछ सीखता रहा."

उधर जे ओमप्रकाश शुरू से अपने सबसे बड़े गुरु के रूप में अपने पिता को ही देखते थे. एक बार उन्होंने कहा था, "मैंने अपने पिता से सीखा था कि आप ज़िंदगी में क्या कर रहे हैं, उससे ज़्यादा ज़रूरी यह है कि आपको खुद को हमेशा छात्र समझते हुए, हर काम में अपना ज्ञान बढ़ाने की कोशिश करनी चाहिए. हमको यह कभी नहीं सोचना चाहिए कि हमको सब कुछ आता है, बल्कि हर पल कुछ नया सीखने की ललक होनी चाहिए."

अपने परिवार के साथ जे ओमप्रकाश
Hrithik roshan/ twitter
अपने परिवार के साथ जे ओमप्रकाश

'आस का पंछी' से बंधी आस

फ़िल्मी दुनिया में करीब 10 साल संघर्ष करके जब जे ओमप्रकाश को फ़िल्म विधा की समझ आ गयी तब सन 1960 में उन्होंने खुद निर्माता बनकर अपनी फ़िल्म बनाने का फै़सला किया.

फ़िल्म का नाम रखा गया 'आस का पंछी', जिसे मशहूर लेखक राजेन्द्र सिंह बेदी ने लिखा था. फ़िल्म में उस समय के उभरते नायक राजेंद्र कुमार को हीरो लिया और तब तक 'नागिन','देवदास' 'नया दौर' और 'मधुमती' जैसी फ़िल्मों से सुपर स्टार बन चुकी वैजयंती माला को हीरोइन लिया गया.

'आस का पंछी' का निर्माण तो जे ओमप्रकाश ने किया, लेकिन इसके निर्देशन के लिए उन्होंने पहला मौका मोहन कुमार को दिया. जब एक जनवरी 1961 को यह फ़िल्म प्रदर्शित हुई तो यह हिट साबित हुई.

हालांकि अपनी दूसरी फ़िल्म 'आई मिलन की बेला' को बनाने और उसे प्रदर्शित करने में उन्हें तीन साल लग गए. हीरो इस बार भी राजेन्द्र कुमार थे लेकिन फिल्म की नायिका थी सायरा बानो और उनके साथ शशि कला भी थीं. उधर फिल्म में धर्मेंद्र भी थे.

यहाँ यह भी दिलचस्प है कि धर्मेन्द्र के करियर की यह एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें वह नेगेटिव रोल में थे. जबकि फ़िल्म का निर्देशन इस बार भी मोहन कुमार को सौंपा गया.

यह फ़िल्म भी सुपर हिट साबित हुई और इसके बाद जे ओमप्रकाश ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

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मोहन कुमार से बना पारिवारिक रिश्ता

फ़िल्म इंडस्ट्री में जे ओमप्रकाश की पहचान एक अच्छे और सफल फ़िल्मकार के रूप में तो होती ही है. साथ ही उनके बारे में मेरी जितने भी लोगों से जब भी बात हुई तो सभी ने उन्हें एक अच्छा इंसान बताया. वह रिश्ते बनाने और निभाने के लिए मशहूर थे.

मोहन कुमार को भी ओमप्रकाश ने अपनी फ़िल्म से पहली बार निर्देशक बनने का मौका दिया. इन दोनों की जान पहचान और मित्रता यूं तो सियालकोट के ज़माने से थी.

लेकिन मुंबई में साथ काम करते करते दोनों बेहद करीबी दोस्त बन गए. यह दोस्ती इतनी घनिष्ठ हुई कि जे ओमप्रकाश की पत्नी पद्मा ने अपनी बहन की शादी मोहन कुमार से करा दी, जिससे ओमप्रकाश और मोहन कुमार साडू बन गए.

आगे चलकर मोहन कुमार खुद भी निर्माता बन गए और उन्होंने 'अंजाना', 'आप आए बहार आई', 'अमीर गरीब' और 'अवतार' जैसी कई लोकप्रिय फ़िल्में दीं.

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'ए' अक्षर से ही बनाते थे फिल्में

जे ओमप्रकाश की फ़िल्मों की एक सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह अपनी सभी फ़िल्मों के नाम 'ए' अक्षर से रखते थे.

असल में अपनी पहली दोनों फ़िल्में 'आस का पंछी' और 'आई मिलन की बेला' की सफलता के बाद उन्हें लगा कि 'ए' अक्षर उनके लिए लकी है. तबसे उन्होंने 'ए' को पूरी तरह अपना लिया.

इसके बाद जे ओमप्रकाश ने जो भी फिल्में बनाईं मसलन 'आए दिन बहार के', 'आया सावन झूम के','आन मिलो सजना', 'आँखों आँखों में', 'आप की कसम', ''आक्रमण', 'अपनापन', 'आशिक़ हूँ बहारों का', 'आशा', 'आस पास', 'अपना बना लो', 'अर्पण', 'आखिर क्यों', 'आप के साथ' और 'आदमी खिलौना है' आदि सभी 'ए' अक्षर से रहीं.

PRADEEP SARDANA/BBC

यहाँ तक कि मोहन कुमार ने भी अपने दोस्त जे ओमप्रकाश को फ़ॉलो करते हुए अपनी लगभग सभी फ़िल्मों को 'ए' अक्षर के नाम से बनाया.

मोहन कुमार भी अपनी फिल्मों में कई ऐसे कलाकारों को लेते थे जो ओमप्रकाश की फिल्मों में भी होते थे. इससे कई बार पहली नज़र में जे ओमप्रकाश और मोहन कुमार की फ़िल्मों में भ्रम हो जाता था.

उधर एक लकी शब्द का जे ओमप्रकाश का फॉर्मूला उनके दामाद राकेश रोशन ने भी अपनाया. रोशन भी अपनी लगभग सभी फिल्मों के नाम एक ही अक्षर 'के' से रखते आए हैं.

मसलन 'खुदगर्ज़', 'कामचोर', 'खून भरी मांग', 'कहो न प्यार है', 'कोई मिल गया', 'कृष' और 'काबिल'. बाद में जे ओमप्रकाश के प्रिय हीरो जीतेंद्र और उनकी बेटी एकता कपूर ने भी लंबे समय तक अपने तमाम सीरियल और कुछ फ़िल्मों के नाम 'के' अक्षर से ही रखकर सफलता का नया इतिहास रच दिया था.

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'आए दिन बहार के' से टीम में किया बदलाव

बहरहाल, दो फ़िल्मों के बाद अपनी तीसरी फ़िल्म 'आए दिन बहार के' से जे ओमप्रकाश ने अपनी टीम में कुछ बड़े बदलाव किए.

एक तो यह कि इस बार उन्होंने राजेन्द्र कुमार के स्थान पर धर्मेंद्र को हीरो और आशा पारिख को हीरोइन लिया. साथ ही फ़िल्म का निर्देशन रघुनाथ झालानी को दिया. उधर जहां पहले इनकी फ़िल्मों में संगीतकार शंकर जयकिशन थे वहाँ अब लक्ष्मीकान्त प्यारेलाल आ गए.

'आए दिन बहार के' (1966) भी सुपर हिट साबित हुई तो उन्होंने अपनी अगली फ़िल्म 'आया सावन झूम के' (1969) में भी धर्मेंद्र, आशा पारिख सहित इसी टीम को दोहराया. इस फ़िल्म ने तो बॉक्स ऑफिस पर सफलता की बड़ी पताका फहरा दी थी.

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आशा पारिख ने भी की अपनी यादें साझा

अपने ज़माने की सुप्रसिद्ध अभिनेत्री आशा पारिख से जब मैंने फोन पर बात करके जे ओमप्रकाश के बारे में पूछा तो आशा पारिख भी भाव विभोर हो गईं.

आशा पारिख ने बताया, " मैंने ओमजी के साथ तीन फ़िल्म की हैं. संयोग से इन तीनों फिल्मों की शूटिंग आउटडोर थी. इनमें 'आए दिन बहार के' की शूटिंग दार्जिलिंग में, 'आया सावन झूम के' की केरल में और 'आन मिलो सजना' की कश्मीर में हुई थी. मैंने उस दौरान देखा कि वह सभी का इतना ख्याल रखते थे कि किसी को कहीं ज़रा भी परेशानी न हो."

आशा पारिख यह भी बताती हैं, "उनसे अभी तक बहुत अच्छे संबंध थे. मैं जब 'फ़िल्म इंडस्ट्री वेलफेयर ट्रस्ट' में ट्रस्टी थी तो वह भी ट्रस्टी थे और उसकी मीटिंग के दौरान हमारी मुलाक़ात अक्सर हो जाती थी. लेकिन जब से वह ज़्यदा बीमार हुए तब से उनसे नहीं मिल सकी. मैं उनसे मिलने का काफी दिनों से सोच रही थी लेकिन जा नहीं सकी. इस बात का अफसोस हमेशा रहेगा."

जे ओमप्रकाश के साथ अपनी एक और याद साझा करते हुए आशा बताती हैं," 'आन मिलो सजना' की मुंबई की शूटिंग के दौरान मेरे पैर की उंगली में फ्रैकचर हो गया. लेकिन मैं शूटिंग पर चली गयी. शूटिंग टालने से काफी नुकसान हो जाना था. जबकि मेरे पैर में बहुत दर्द था और मैं जूते तक नहीं पहन पा रही थी."

"ओमप्रकाश जी को जब यह पता लगा तो उन्होंने मुझसे कहा शूटिंग की चिंता मत करो. पहले एक्सरे कराओ. वह मुझे अस्पताल ले गए मेरा एक्सरे कराया तो पता लगा फ्रेकचर है, तब मुझे उन्होंने आराम करने की सलाह दी."

आशा पारिख
BBC
आशा पारिख

'आप की कसम' से संभाली निर्देशन में उतरे

ओमजी ने जब अपनी अगली फ़िल्म 'आप की कसम' शुरू की तो इसके निर्देशन की बागडोर भी उन्होंने खुद ही संभाल ली. हालांकि तब कुछ लोगों को उनके नर्देशन में सफल होने पर शंका थी.

राजेश खन्ना, मुमताज़ और संजीव कुमार इस फ़िल्म का बड़ा आकर्षण थे. साथ ही इस बार फ़िल्म के संगीत के लिए उन्होंने आर डी बर्मन को चुना. सन 1974 में जब 'आप की कसम' प्रदर्शित हुई तो फ़िल्म ने सफलता के कई पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए.

इंटरवल से पहले खूब हँसाने, रोमांस दिखाने और जमकर मनोरंजन करने वाली 'आप की कसम' इंटरवल के बाद दर्शकों को कितनी ही बार आँखें नम कर देती है.

फ़िल्म का संगीत तो इतना लोकप्रिय हुआ कि जहां देखो हर किसी की जुबां पर जय जय शिवशंकर, करवटें बदलते रहें सारी रात हम, ज़िंदगी के सफर में गुज़र जाते हैं जो मुकाम और सुनो सुना कहो कहा कुछ हुआ क्या, जैसे गीत हर तरफ गूँजते सुनाई देते थे.

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सभी फ़िल्मों का संगीत लोकप्रिय हुआ

ओमप्रकाश की फ़िल्मों को ध्यान से देखें तो उनकी पहली फ़िल्म 'आस का पंछी' से लेकर उनकी अंतिम हिट फिल्म 'आखिर क्यों' तक, सभी फ़िल्मों का गीत-संगीत काफी लोकप्रिय रहा.

असल में ओमजी को कविता और संगीत दोनों की बहुत अच्छी समझ थी. वह दर्शकों की नब्ज़ अच्छे से पहचानते थे और अपनी फ़िल्मों के संगीत पर भी वह बड़ा फोकस रखते थे.

उनकी फ़िल्म 'आशा' का शीशा हो या दिल हो आखिर टूट जाता है और 'आन मिलो सजना' का अच्छा तो हम चलते हैं, 'आए दिन बहार के' का मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे, 'आया सावन झूम के' शीर्षक गीत के साथ साथिया नहीं जाना की बात हो या फिर 'आखिर क्यों' के गीत दुश्मन न करे दोस्त ने वो काम किया है, सभी ने जो लोकप्रियता पाई है वह किसी से छिपी नहीं है.

आज भी ये गीत कानों में रस घोल कर मन और मस्तिक तक पहुँचने का दम रखते हैं.\

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राजेश खन्ना रहे सबसे पसंदीदा अभिनेता

जे ओमप्रकाश इस बात को कहते रहे और राजेश खन्ना के निधन पर भी उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि "राजेश खन्ना मुझे सबसे ज्यादा पसंद रहे."

काका के साथ ओमजी ने सबसे पहली फ़िल्म 1970 में 'आन मिलो सजना'' की थी. हालांकि कुछ कारणों से इस फ़िल्म को उन्होंने अपने फ़िल्म युग के बैनर से न बनाकर फ़िल्म कुंज के बैनर से बनाया था.

फ़िल्म में उनका नाम 'जे ओमप्रकाश प्रेजेंट्स' के रूप में गया था.

जबकि 'आप की कसम' राजेश खन्ना के साथ उनके अपने निर्देशन में बनी पहली फ़िल्म थी. इसके बाद 'आक्रमण' में काका को उन्होंने मेहमान भूमिका में लिया.

लेकिन ओमजी काका को इतना पसंद करते थे कि मेहमान भूमिका के बाद उन्होंने 'आक्रमण' में राजेश खन्ना पर दो गीत फ़िल्मांकित किए थे.

यहाँ यह भी बता दें कि ओमप्रकाश अपनी फ़िल्म 'आशा' और 'अर्पण' में भी राजेश खन्ना को लेना चाहते थे. लेकिन उनकी डेट्स न मिलने के कारण जीतेंद्र को लिया.

जीतेंद्र के साथ भी उनकी 'अपनापन' और 'आशा' तो सुपर हिट रहीं. 'अर्पण' भी हिट थी लेकिन 'अपना बना लो' और 'आदमी खिलौना है' नहीं चल सकीं.

जे ओमप्रकाश फ़िल्में तो सन 2001 तक बनाते रहे. लेकिन सही अर्थों में 1985 में प्रदर्शित उनकी 'आखिर क्यों' की अपार सफलता के बाद उनकी कोई और फ़िल्म चली नहीं. यहाँ तक उनकी अंतिम फ़िल्म 'अफसाना दिलवालों' पर तो किसी का ध्यान ही नहीं गया.

राजेश खन्ना
Getty Images
राजेश खन्ना

एक साल से थे बीमार

पिछले एक बरस से जे ओमप्रकाश ज़्यादा बीमार थे. जे ओमप्रकाश के रिश्तेदार मोहन कुमार के भांजे और 'इंसाफ का तराजू', 'आप तो ऐसे न थे' और 'निकाह' फ़िल्मों के अभिनेता दीपक पाराशर ने मुझे अपनी बातचीत में फोन पर बताया, "ओम अंकल पिछले सात आठ महीनों से तो कुछ बोल ही नहीं पा रहे थे, उनका खाना पीना भी नली के सहारे चल रहा था. हालांकि वह कोमा में तो नहीं थे. पर अपनी आँखें कभी कभार ही खोलते थे."

इधर बरसों से जे ओमप्रकाश के सबसे करीबी पड़ोसी रहे सुप्रसिद्द फ़िल्मकार स्वर्गीय रामानन्द सागर के पुत्र प्रेम सागर भी जे ओमप्रकाश के गुणों और उनकी भलमानसता की प्रशंसा करते नहीं थकते.

अपने परिवार के साथ जे ओमप्रकाश
Pradeep sardana
अपने परिवार के साथ जे ओमप्रकाश

सागर ने बताया, ''मैं बरसों से जे ओमजी को बहुत करीब से देख रहा हूँ. उन्हें फ़िल्म लाइन के हर क्षेत्र का पूरा ज्ञान था. इतनी सुपर हिट फ़िल्में देने के बाद भी उनमें कभी अहंकार नहीं आया."

ओमप्रकाश जी की अधिकतर फ़िल्में पारिवारिक होने के साथ-साथ पति पत्नी के संबंधों पर ज़्यादा ज़ोर देती थीं. पति पत्नी के संबंधों को अपनी फ़िल्मों में दिखाने वाले जे ओमप्रकाश का अपना दाम्पत्य जीवन भी बेहद अच्छा रहा. अपनी पत्नी पद्मा रानी और उनके बीच परस्पर समझ और मधुर संबंध अंत तक बरकरार रहे.

BBC Hindi
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English summary
Why did J Omprakash name his films with the letter 'A'?
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