India
  • search
क्विक अलर्ट के लिए
नोटिफिकेशन ऑन करें  
For Daily Alerts
Oneindia App Download

आज़मगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनाव के लिए अखिलेश यादव ने क्यों नहीं किया प्रचार?

By BBC News हिन्दी
Google Oneindia News
अखिलेश यादव
Getty Images
अखिलेश यादव

मंगलवार 21 जून को शाम पाँच बजे उत्तर प्रदेश के लोकसभा उपचुनाव का प्रचार समाप्त हुआ और अब पार्टियां 23 जून को मतदान की तैयारियों में जुट गईं.

चुनावों में रथ पर सवार होकर प्रचार करने वाले प्रदेश के नेता विपक्ष और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने एक भी रैली नहीं की और न ही अपने चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव के लिए कोई रोड शो किया. धर्मेंद्र यादव की उम्मीदवारी की घोषणा भी नामांकन भरने के दिन हुआ.

हालांकि सपा के समर्थक दल सुभासपा के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर और आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी, धर्मेंद्र यादव के प्रचार के लिए आज़मगढ़ पहुँचे थे.

पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और अखिलेश यादव के क़रीबी माने जाने वाले राजेंद्र चौधरी कहते हैं, "तैयारी तो वहां की जनता और मतदाता ने समाजवादी पार्टी के पक्ष में कर रखी है. भाजपा की सरकार से तीन महीने में ही लोग ऊब गए हैं.

"रोज़गार का कोई इंतज़ाम नहीं हुआ. किसानों के साथ न्याय नहीं हुआ. क़ानून व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ. स्वास्थ्य सेवाओं में कोई सुधार नहीं हुआ. इसलिए इन दोनों बाई इलेक्शन में समाजवादी पार्टी के जो उम्मीदवार हैं वहीं जीतेंगे."

अखिलेश यादव के रामपुर और आज़मगढ़ में प्रचार नहीं करने के सवाल पर राजेंद्र चौधरी ने कहा, "जनता पर विश्वास है अखिलेश यादव को, और जनता का विश्वास अखिलेश के साथ है. वहां के लोगों ने आकर कहा है हम समाजवादी पार्टी के साथ हैं और हम बीजेपी के ख़िलाफ़ वोट करेंगे. वहां पर पार्टी के नेताओं और विधायकों ने कहा कि जनता सपा के साथ है अखिलेश यादव को वहां आकर प्रचार करने की ज़रूरत नहीं है. बीजेपी हार रही है इसलिए मुख्यमंत्री वहां पर प्रचार कर रहे हैं बीजेपी के लोग डरे हुए हैं."

अखिलेश यादव
Getty Images
अखिलेश यादव

आज़मगढ़ जीतना सपा के लिए कितना मुश्किल या आसान?

2019 के लोकसभा चुनाव में आज़मगढ़ लोकसभा सीट में लगभग 19 लाख मतदाता थे. जिनमें से क़रीब साढ़े तीन लाख यादव मतदाता हैं. सीट पर तीन लाख से ज़्यादा मुसलमान मतदाता हैं. और तीन लाख से ज़्यादा दलित मतदाता हैं.

ये वो जातीय समीकरण हैं जिनके दम पर समाजवादी पार्टी पूरी मज़बूती से आज़मगढ़ में चुनाव लड़ती और बड़े अंतर से जीतती रही है. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजे भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि आज़मगढ़ का मुस्लिम-यादव समीकरण समाजवादी पार्टी को बड़ी जीत दिलाने में कारगर रहा था. अखिलेश यादव ने यह सीट क़रीब दो लाख 60 हज़ार वोटों से जीती थी.

तब महागठबंधन के चलते बहुजन समाज पार्टी ने सपा को अपना वोट ट्रांसफ़र किया था और अखिलेश यादव की इस बड़े बहुमत की जीत का कारण यही था. 2019 में भाजपा प्रत्याशी और भोजपुरी फ़िल्म स्टार दिनेश लाल यादव उर्फ़ निरहुआ को तीन लाख 61 हज़ार वोट मिले थे.

निरहुआ, अखिलेश यादव, आज़मगढ़, लोकसभा चुनाव 2019, चुनाव 2019, दिनेश लाल यादव
Kumar Harsh/BBC
निरहुआ, अखिलेश यादव, आज़मगढ़, लोकसभा चुनाव 2019, चुनाव 2019, दिनेश लाल यादव

लेकिन इस बार बसपा ने शाह आलम उर्फ़ गुड्डू जमाली को मैदान में उतारा है और राष्ट्रीय उलेमा काउंसिल ने गुड्डू जमाली को समर्थन देने का ऐलान भी किया है. शायद इसीलिये सपा के मुस्लिम चेहरा कहे जाने वाले आज़म ख़ान को भी आज़मगढ़ आकर धर्मेंद्र यादव के लिए माँगना पड़ा.

पिछले चुनावों के आंकड़ों और इस सीट के समीकरण को देखते हए अखिलेश यादव को आज़मगढ़ में मज़बूती तो महसूस होती होगी लेकिन क्या अखिलेश यादव ने इस चुनाव में नैरेटिव बनाने का मौक़ा गंवाया है?

इस बारे में द हिन्दू के उत्तर प्रदेश के संवादाता उमर रशीद कहते हैं, "आज़मगढ़ में कैंपेन ना करके, और इस चुनाव में अग्निवीर का मुद्दा ना उठा वो अपने आप को संभावित सकारात्मक जीत से जोड़ने का मौक़ा गंवा रहे हैं. सिर्फ़ ट्वीट न करके अगर वो कुछ जनसभाएं भी करते तो वो कह सकते थे कि हमने यह जवलंत मुद्दे उठाये और जनता ने हमें उन मुद्दों पर वोट दिया है. लेकिन उन्होंने इस उपचुनाव से दूरी रख कर इसे लोकल और अप्रासंगिक बना दिया है. यह 2024 के बड़े चुनाव के लिए एक छोटा संकेत हो सकता था, जिसे पार्टी आने वाले समय में इस्तेमाल कर सकती थी."

रैली तो नहीं हो पाई लेकिन प्रचार का समय ख़त्म होने के बाद मंगलवार देर रात को समाजवादी पार्टी ने अखिलेश यादव का एक 15 सेकंड का वीडियो ट्वीट किया जिसमें उन्होंने कहा, "रामपुर और आज़मगढ़ दोनों सीटें पार्टी ऐतिहासिक वोटों से जीतेगी, और वहां पर जो अग्निवीर हैं, वो सब हरा देंगे भारतीय जनता पार्टी को."

दूसरी तरफ़ आज़मगढ़ में भाजपा प्रत्याशी निरहुआ के लिए प्रचार करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विवादित अग्निवीर योजना का मुद्दा उठाते हुए कहा, "दुनिया ने इस योजना का स्वागत किया है, लेकिन विपक्षी दल युवाओं के जीवन के साथ खिलवाड़ करने के लिए साज़िश के तहत युवाओं को गुमराह कर रहे हैं. आज़मगढ़, जो पूर्वांचल क्षेत्र के अंतर्गत आता है, देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में से एक है और बड़ी संख्या में युवाओं को रक्षा और अर्धसैनिक बलों में भेजता है. इस योजना से सिर्फ़ 1.5 सालों में 10 लाख युवाओं को नौकरी मिलेगी."

आज़मगढ़ को लेकर अखिलेश यादव के रवैये के बारे में वरिष्ठ पत्रकार शादाब रिज़वी कहते हैं, "आज़मगढ़ की परिस्थितियां पिछले चुनाव के मुक़ाबले अलग हैं. अखिलेश यादव पिछली बार चेहरा थे. इस बार के उम्मीदवार धर्मेंद्र यादव आख़िरी मौक़े पर उतरे हैं. वो भले ही उनके भाई हों और उसके नाते उनको वोट मिल जाए. लेकिन बसपा के उम्मीदवार शाह आलम इनका खेल बिगाड़ने की स्थिति में काफ़ी हद तक हैं. अगर शाह आलम पिछले चुनावों की तरह चल गए तो हो सकता है कि सपा को नुक़सान हो. अखिलेश यादव का आज़मगढ़ जाना इसलिए बनता था क्योंकि वो ख़ुद वहां से सांसद थे और उनके इस्तीफ़ा देने के बाद सीट रिक्त हुई. अपनी सीट के लिए दिल जान एक लगाना पड़ता है, जैसे आज़म ख़ान रामपुर में लगाए हुए हैं. और वो चुनाव प्रचार में इसी तरह उतरे हुए हैं कि मेरी सीट थी, और रहनी चाहिए."

आज़म ख़ान
Getty Images
आज़म ख़ान

रामपुर में आज़म ख़ान के भरोसे सपा?

रामपुर लोकसभा क्षेत्र में क़रीब 16 लाख से अधिक मतदाता हैं. रामपुर क्षेत्र में कुल 50.57 % मुस्लिम आबादी है. मुस्लिम बाहुल्य सीट होने के बावजूद बीजेपी तीन बार रामपुर में लोक सभा चुनाव जीत चुकी है. लेकिन इस बार पार्टी ने एक समय में आज़म ख़ान के क़रीबी रहे घनश्याम लोधी को टिकट दिया है. वहीं आज़म ख़ान के क़रीबी आसिम राजा सपा के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं.

अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के विश्लेषण के मुताबिक़ भाजपा ने योगी सरकार के 16 मंत्रियों को घनश्याम लोधी के लिए चुनाव में प्रचार और तैयारी की ज़िम्मेदारी दी है. रामपुर में भाजपा के इस तरीक़े की ताक़त झोंकने के बारे में पत्रकार शादाब रिज़वी कहते हैं, "भाजपा आक्रामक होकर चुनाव लड़ती है. यह उनकी रानीति का एक हिस्सा है. अब तक जितने भी चुनाव और उपचुआव हुए हैं, उन्होंने इसी तरह लड़े हैं. उनके जीतने न जीतने से केंद्र की मोदी सरकार न बन रही है और ना ही बिगड़ रही है."

प्रचार के आख़िरी दिन ख़ुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने रामपुर में रैली कर कहा, "पहले भू-माफ़िया ग़रीबों की ज़मीन पर अतिक्रमण करते थे और अक्सर उन्हें प्रताड़ित करते थे. सत्ता में आने के बाद, हमारी सरकार ने ग़रीबों को ज़मीन वापस दे दी और ऐसे माफ़िया को उचित सज़ा देने के लिए उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की."

https://twitter.com/ANINewsUP/status/1539160719605866496?s=20&t=gC4D1G-TCiZcMQx-UXj3wA

उधर सपा से सिर्फ़ आज़म ख़ान और उनके बेटे अब्दुल्लाह आज़म आसिम राजा के लिए प्रचार कर रहे हैं और पार्टी का कोई अन्य क़द्दावर नेता रामपुर में दिखाई नहीं दिया है. आज़म ख़ान 89 मामलों में बेल मिलने के बाद जेल से रिहा हुए हैं. इन मुक़दमों का ज़िक्र करते हए आज़म ख़ान ने कहा, "हज़ारों मुक़दमें हैं, कई सौ ज़िंदगियाँ चाहियें मुक़दमा लड़ने के लिए. लेकिन यह जिगर बाक़ी है."

रामपुर में सपा के चुनावी प्रचार के बारे में पत्रकार शादाब रिज़वी कहते हैं, "आज़म ख़ान के आगे अखिलेश यादव पूरी तरह से सरेंडर कर गए हैं अगर वो आज़मगढ़ चुनाव प्रचार करने आते तो उनको रामपुर में भी प्रचार करने जाना पड़ता यही वजह रही कि वो कहीं भी लोकसभा उपचुनाव के लिए प्रचार करने नहीं पहुंचे. अखिलेश को लगा आज़म ख़ान मुसलमानों का बड़ा चेहरा हैं और मुसलमान सपा के साथ हैं और आज़म की नारज़गी से नुक़सान हो सकता है."

वो हाल ही में हुए राज्य सभा चुआवों में आज़म ख़ान के वकील रहे कपिल सिबल को सपा के समर्थन से चुने जाने का ज़िक्र भी करते हैं. और कहते हैं कि अखिलेश का रामपुर से दूरी बनाना एक सोची समझी रणनीति है.

तो क्या रामपुर और आज़मगढ़ के चुनावी नतीजे यादव-मुसलमान वोट की राजनीती से जुड़ा कोई एहम सन्देश देंगे? पत्रकार उमर रशीद कहते हैं, "रामपुर में तो मुसलामानों के पास कोई विकल्प नहीं है. वहां पर बसपा और कांग्रेस चुनाव लड़ नहीं रहे और वहां सपा और भाजपा में सीधा मुक़ाबला है. आज़मगढ़ में अगर सपा धर्मेंद्र यादव को टिकट नहीं देती तो सपा वहां थोड़ी हलकी हो जाती. वहां पर उन्हें बसपा के शाह आलम उर्फ़ गुड्डू जमाली में एक विकल्प नज़र आने लगता. और आज़मगढ़ में यादव-मुस्लिम समीकरण एक मज़बूत फ़ैक्टर है. हो सकता है कुछ लोग सपा की हिन्दू-मुस्लिम माहौल में चुप्पी के कारण बसपा के गुड्डू जमाली की ओर झुकें लेकिन अंत में आंकड़ों से ही साफ़ होगा. लेकिन यह बात जग ज़ाहिर है कि सपा के मुक़ाबले बसपा काफ़ी कमज़ोर पार्टी है."

क्या है भाजपा का कहना?

उपचुनाव में अखिलेश यादव के प्रचार न करने के बारे में बीजेपी के प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी का कहना है, "अखिलेश यादव जान रहे हैं कि दोनों जगहों पर समाजवादी पार्टी की हार हो रही है. इसलिए उसको महसूस करके स्थानीय कारणों का बाद में हवाला दिया जा सके, उपचुनाव थे सरकार ने दुरुपयोग किया, ये सब बातें आसानी से कह सकें, इसके लिए प्रचार करने नहीं जा रहे हैं. उन्हें इस बात का पूर्वानुमान है. यही कारण है कि वो चुनाव प्रचार में नहीं जा रहे हैं."

https://twitter.com/rakeshbjpup/status/1539188338686849024?s=20&t=n_y1xx2cQVi0JwOkXi9taA

आज़मगढ़ यादव ख़ानदान के लिए पारिवारिक सीट रही है और उसका हवाला देते हुए राकेश त्रिपाठी कहते हैं, "जिस तरह से आज़मगढ़ में पहले मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और अब धर्मेंद्र यादव को टिकट देकर परिवारवाद को बढ़ाने का काम किया है. यानी आज़मगढ़ में कोई समाजावादी पार्टी का कार्यकर्ता इस योग्य नहीं है जो वहां पर प्रतिनिधित्व कर सके, चुनाव लड़ सके. इस बात की बड़ी प्रतिक्रिया है. जबकि दिनेश लाल यादव निरहुआ आज़मगढ़ में स्वाभाविक अपनी पहचान से उभरा हुआ नेता है. दिनेश लाल यादव निरहुआ आज़मगढ़ की पहचान से जुड़ते हैं. अपने हुनर से भोजपुरी सिनेमा में एक नाम बनाया है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

BBC Hindi
Comments
देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
English summary
Why did Akhilesh Yadav not campaign for Azamgarh and Rampur Lok Sabha by-elections?
तुरंत पाएं न्यूज अपडेट
Enable
x
Notification Settings X
Time Settings
Done
Clear Notification X
Do you want to clear all the notifications from your inbox?
Settings X
X