छत्तीसगढ़ नक्सली हमले में बीते 10 सालों में 175 जवान हुए हैं शहीद, बस्तर रेंज आज भी क्यों है माओवादियों का गढ़
छत्तीसगढ़ नक्सली हमले में बीते 10 सालों में 175 जवान हुए हैं शहीद, बस्तर रेंज आज भी क्यों है माओवादियों का गढ़
रायपुर: छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके बीजापुर और सुकमा जिले की सीमा पर हुए नक्सली हमले में 23 जवान शहीद हो गए हैं। रायपुर से लगभग 400 किलोमीरट की दूरी पर बीजापुर और सुकमा बॉर्डर पर शनिवार (03 अप्रैल) को माओवादियों और सुरक्षाबलों में मुठभेड़ हुई और रविवार (04 अप्रैल) को खबर आई कि 23 जवान शहीद हो गए हैं और 31 सुरक्षाकर्मी घायल हैं। ये नक्सली हमला इस साल की अब तक की सबसे बड़ी नक्सली घटना थी। 2010 के चिंतलनार नरसंहार के बाद से, दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर नक्सल प्रभावित इलाकों में 175 से अधिक जवान शहीद हो चुके हैं। चिंतलनार मुठभेड़ में 76 सीआरपीएफ जवानों की मौत हुई थी। इस हमले के बाद से रणनीतिक चूक, खुफिया विभाग की विफलता, जवानों में आपसी तालमेल इत्यादि कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि आखिर कैसे आधुनिक हथियारों से लैस 2000 से अधिक जवानों को 400 माओवादियों ने घेर लिया और इतना नुकसान किया? आइए जानें कि आखिर बस्तर रेंज आज भी माओवादियों का गढ़ क्यों बना हुआ है?

सुरक्षाबलों और माओवादियों में 40 सालों से चल रहा है संघर्ष
सुरक्षाबलों और माओवादियों के बीच पिछले 40 सालों से बस्तर इलाके में संघर्ष जारी है। गृह विभाग की एक रिपोर्ट के मुताबिक जब से छत्तीसगढ़ एक अलग राज्य बना है, 3200 से अधिक मुठभेड़ (एनकाउंटर) और नक्सली हमले की घटनाएं हो चुकी हैं। साल 2001 के जनवरी से 2019 तक माओवादी हिंसा में 1234 जवान शहीद हो गए हैं और 1002 माओवादी मारे गए हैं।
वहीं 2001 से 2009 के बीच सुरक्षाबलों और माओवादियों के संघर्ष में 1782 आम नागरिकों की मौत हुई है। वहीं लगभग 4 हजार माओवादियों ने सरेंडर किया है। 2020 के नवंबर तक छत्तीसगढ़ में 31 माओवादी एनकाउंटर में मारे गए हैं और 270 31 माओवादियों समर्पण किया है।

ज्यादातर नक्सली हमला मार्च से जुलाई के बीच होता है
इंडियन एक्सप्रेस में छपि रिपोर्ट के मुताबिक छत्तीसगढ़ में माओवादी हिंसा के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि बस्तर रेंज में एक पैटर्न के तौर पर नक्सली हमला मार्च से जुलाई के बीच ज्यादा किया जाता है। छत्तीसगढ़ में ज्याजातर नक्सली हमले और हताहत मार्च और जुलाई के बीच हुए हैं। सूत्रों का कहना है कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकिआमतौर पर सीपीआई (माओवादी) फरवरी और जून के बीच में अपना काउंटर अटैक करने की योजना बनाते हैं।
माओवादियों के इस अभियान में आक्रामक सैन्य अभियान की योजना भी शामिल होती है। मार्च से जुलाई के बीच माओवादी हमले की योजना इसलिए बनाते हैं ताकी मानसून से पहले वो इसको निपटा लें। मानसून में इन इलाकों की स्थिति बहुत खराब हो जाती है। चिंता की बात ये है कि लगभग 15 साल पहले शुरू हुए वामपंथी उग्रवादियों के खिलाफ अभियान के बाद भी बस्तर क्षेत्र में सुरक्षा बल अभी भी संघर्ष कर रहे हैं।

इन वजहों से माओवादियों का गढ़ बना हुआ है बस्तर
छत्तीसगढ़ में वैसे तो कई इलाकों में नक्सलियों का प्रभाव है। लेकिन बस्तर इलाके को माओवादियों का गढ़ माना जाता है। इसके लिए कई चीजें जिम्मेदार है। यहां के दूर-दूर तक फैले घने जंगल, सड़कों की कमी, नेटवर्क का ना होना, प्रशासन की अनुपस्थिति ये सभी वजह बस्तर को माओवादियों का गढ़ बनाने में मदद करता है। सुरक्षा प्रतिष्ठान के सूत्रों का कहना है कि पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश और ओडिशा माओवादियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होने के बाद से जिसकी वजह से चरमपंथी वहां से निकलकर बस्तर चले आए हैं। ज्यादातर नक्सली कथित तौर पर एक ही विचारधारा के होते हैं, ऐसे में वो सीमा पार करके कैडर में घुल-मिल जाते हैं।
इन इलाकों में एक बार जाने के बाद ओर-छोर का पता नहीं चल पाता है। ज्यादातर नक्सली आमतौर पर स्थानीय लोगों में से ही होते हैं और वो उन्ही इलाकों में रहते हैं, इसलिए वे उन जगलों और कच्चे रास्तों को अच्छे से जानते हैं, जबकि उन इलाकों में तैनात किए गए जवानों को इसके बारे में जानने में काफी वक्त लग जाता है, जिसका माओवादी फायदा उठाते हैं।

जानें बस्तर की इन परिस्थितियों पर क्या कहते हैं अधिकारी?
सुरक्षा अधिकारियों के सूत्रों का कहना है कि नक्सलियों की वजह से इन इलाकों में ना तो सड़क बन पा रही है और ना ही संचार की सुविधा है। सड़कों का ना होना, घने जगंल और संचार की सुविधा के अभाव की वजह से ही नक्सल यहां खुद को सुरक्षित समझते हैं और यहां डेरा डाले हुए हैं। सड़कों की कमी, रूट मैप का ना होना, संचार की सुविधा की वजह जंगलों के बीच सुरक्षाकर्मी यहां फंस जाते हैं। जवान अगर बस्तर के जंगलों में फंस जाते हैं तो मदद के लिए अपने सीनियर अधिकारी या अन्य टीम को समय रहते सूचना भी नहीं दे पाते हैं। नक्सली अक्सर जंगलों में भूमिगत बमों का जाल बिछा जवानों को ट्रैप करते हैं।
एक सेवारत सीआरपीएफ अधिकारी ने कहा है कि छत्तीसगढ़ के नक्सली प्रभावित इलाके में सड़क नेटवर्क लगभग ना के बराबर है। यहां तक कि बिहार और झारखंड के नक्सल इलाकों में ताबड़तोड़ काम हुए हैं वहां भी बेहतर सड़क नेटवर्क है। संचार नेटवर्क हैं।

छत्तीसगढ़ पुलिस पर भी उठे सवाल?
छत्तीसगढ़ नक्सली हमले और मुठभेड़ को लेकर हमेशा से छत्तीसगढ़ पुलिस पर भी सवाल उठे हैं। नक्सलियों के खात्मे के पीछे राज्य पुलिस की झिझक भी शामिल है। सीआरपीएफ के एक अधिकारी के हावले से इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, आंध्र प्रदेश या ओड़िसा या फिर पश्चिम बंगाल, इन राज्यों में पहले लोकल पुलिस ने माओवादियों के खिलाफ जानकारियां जुटाईं, इसके बाद ये इनपुट सुरक्षा बलों को दी जाती है। फिर स्थायीन पुलिस और सेंट्रल सुरक्षा टीम एक साथ मिलकर काम करती है, जिससे ऑपरेशन आसान हो जाता है।
लेकिन छत्तीसगढ़ में ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है। राज्य में डिस्ट्रिक्ट रिजर्व फोर्स की जगह सीआरपीएफ को ये काम दिया जा रहा है और वो आये दिन शहीद हो रहे हैं।
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