Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

सरकार से इतने नाराज़ क्यों हैं ट्रांसजेंडर?

ट्रांसजेंडर
Getty Images
ट्रांसजेंडर

"हमें ज़िंदगी भर क्या कम तकलीफ़ और बेइज़्ज़ती झेलनी पड़ती है जो अब स्क्रीनिंग कमेटी के सामने कपड़े उतारकर अपने ट्रांसजेंडर होने का सबूत दें?"

ये सवाल भारत में ट्रांसजेंडर समुदाय के हजारों लोग कर रहे हैं. उनके सवालों में दर्द भी है और ग़ुस्सा भी. वजह है ट्रांसजेंडर पर्सन्स (प्रोटेक्शन ऑफ़ राइट्स) बिल, 2016, जिसे संसद के इसी शीतकालीन सत्र में लोकसभा में दोबारा पेश किया जाना है.

इससे पहले यह बिल अगस्त, 2016 में लोकसभा में पेश किया गया था. अभी इसे राज्यसभा में पेश किया जाना बाकी है.

संसद में यह विधेयक लाया तो गया है 'थर्ड जेंडर' को उनका हक़ और इंसाफ़ दिलाने के लिए, लेकिन इस समुदाय का कहना है कि इसके बुनियादी ढांचे में ही गड़बड़ी है.

ट्रांसजेंडर
Getty Images
ट्रांसजेंडर

ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए काम करने वाले एक समूह के साथ काम करने वाले मृदुल का कहना है कि बिल में 'ट्रांसजेंडर' शब्द की परिभाषा ही ग़लत है.

कैसे और कितने दिन में बदल जाता है सेक्स

ट्रांसजेंडर मॉडल, एयर होस्टेस क्यों नहीं बन सकती?

मृदुल ख़ुद भी एक ट्रांसजेंडर हैं. उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, "साल 2015 के नालसा फ़ैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कई अच्छे सुझाव दिए थे लेकिन ट्रांसजेंडर बिल में उनमें से शायद ही कोई सुझाव शामिल किया गया है."

जेंडर और सेक्शुअलिटी के जानकारों की मानें तो सरकार शायद ये समझ ही नहीं पा रही है कि ट्रांसजेंडर है कौन. अगर ट्रांसजेंडर की सही पहचान ही नहीं हो पा रही है तो उनके लिए कायदे-क़ानून कैसे बना दिए गए.

ट्रांसजेंडर
Getty Images
ट्रांसजेंडर

एलजीबीटी समुदाय के काम करने वाली संस्था हमसफ़र ट्रस्ट की ऐडवोकेसी मैनेजर कोनिनिका रॉय कहती हैं, "ट्रांसजेंडर वो शख़्स है जो अपने निर्धारित जेंडर के साथ सहज नहीं है. मुझे लगता है सरकार ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स में बुरी तरह कंफ्यूज़ है."

ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स में क्या फ़र्क है?

जेंडर मुद्दों पर काम करने वाली स्मृति नेवातिया ट्रांसजेंडर शब्द को परिभाषित करने के लिए एक उदाहरण देती हैं.

ट्रांसजेंडर

बच्चे के जन्म के बाद उसके सेक्शुअल ऑर्गन्स को देखकर उसका जेंडर निर्धारित कर दिया जाता है. हालांकि ये ज़रूरी नहीं है कि किसी का असली जेंडर उसके निर्धारित जेंडर से मेल खाए और जब ये मेल नहीं खाता है तो इस स्थिति को 'जेंडर डिस्फ़ोरिया' कहते हैं और ऐसे शख़्स को ट्रांसजेंडर कहते हैं.

इंटरसेक्स

प्लास्टिक सर्जन डॉ. नरेंद्र कौशिक बताते हैं कि कुछ लोगों के जननांगों में विकृतियां होती हैं या कुछ के शरीर में महिला और पुरुष दोनों के जननांग विकसित हो जाते हैं.

ये वैसा ही जैसे किसी बच्चे का होंठ या तालु सटा होना. इसे भी ऑपरेशन करके ठीक किया जा सकता है. ऐसे लोगों को ट्रांसजेंडर नहीं कहा जा सकता.

मिलिए 'प्लेब्वॉय' की पहली ट्रांसजेंडर प्लेमेट से

कम्युनिस्ट पार्टी में पहली बार ट्रांसजेंडर

इस स्थिति को इंटरसेक्स वैरिएशन कहा जाता है. ज़रूरी नहीं कि ऐसे सेक्शुअल ऑर्गन वाला हर शख़्स ट्रांसजेंडर हो.

ट्रांसजेंडर बिल से शिकायतें क्या हैं?

• पहली समस्या ट्रांसजेंडर शब्द की परिभाषा को लेकर. बिल में ट्रांसजेंडर समुदाय की ठीक तरीके से पहचान नहीं हुई है. ट्रांसजेंडर और इंटरसेक्स दोनों को मिला दिया गया हैय

• बिल के प्रावधानों के मुताबिक हर जिले में एक स्क्रीनिंग कमेटी बनाई जाएगी जो यह तय करेगी कि कोई शख़्स ट्रांसजेंडर है या नहीं. कमेटी में एक हेल्थ ऑफ़िसर होगा जो इसके लिए एक सर्टिफ़िकेट देगा.

सुप्रीम कोर्ट ने साल 2015 के अपने फ़ैसले में कहा था कि हर व्यक्ति अपना जेंडर ख़ुद निर्धारित कर सकता है. इसलिए ट्रांसजेंडर समुदाय के लोग और जेंडर एक्टिविस्ट इस बात को लेकर ख़फ़ा हैं कि दूसरे लोगों का एक समूह किसी का जेंडर कैसे तय कर सकता है.

साथ ही किसी की शारीरिक बनावट या सेक्शुअल ऑर्गन से उसके ट्रांसजेंडर होने या न होने का पता चल जाए, ऐसा भी नहीं है. ऐसे में कमेटी अपना फ़ैसला कैसे लेगी, इस पर सवालिया निशान हैं.

• बिल में भीख मांगने को दंडनीय अपराधों की श्रेणी में रखा गया है. ट्रांसजेंडर समुदाय का कहना है कि उन्हें बराबर अधिकार तो अभी मिले ही नहीं है. इससे पहले ही उनके जीने-खाने का साधन छीना जा रहा है. यह कैसा इंसाफ़ है?

• ट्रांसजेंडरों के साथ बलात्कार और यौन उत्पीड़न जैसे मामलों के लिए कड़े क़ानून नहीं हैं. किसी महिला के साथ यौन उत्पीड़न की सज़ा सात साल से लेकर उम्रक़ैद तक है जबकि ट्रांसजेंडर के साथ यौन उत्पीड़न की सज़ा छह महीने से दो साल तक.

सरकार ट्रांसजेंडरों के साथ होने वाली यौन हिंसाओं को गंभीरता से क्यों नहीं ले रही है? क्या हिंसा और शोषण उन्हें कम तकलीफ़ पहुंचाता है?

• बिल के विरोध की एक और बड़ी वजह है और वह 'फ़ैमिली ऑफ़ चॉइस' का मुद्दा.

ट्रांसजेंडर बच्चों और किशोरों को अपने परिवार में तरह-तरह की शारीरिक और मानसिक हिंसा का सामना करना पड़ता है. इसलिए वो कई बार अपना घर-परिवार छोड़कर कहीं और चले जाते हैं.

आम तौर पर घर छोड़ने के बाद वो ट्रांसजेंडरों के लिए काम करने वाले समुदायों या किन्नरों के साथ जुड़ जाते हैं.

वो घर वापस नहीं लौटना चाहते क्योंकि वहां वो अपने तरीक़े से जी नहीं सकते और उन्हें हिंसा का सामना करना पड़ता है. नाबालिग ट्रांसजेंडर अपनी मर्जी से जिन परिवार को चुनते हैं उसे 'फ़ैमिली ऑफ़ चॉइस' कहा जाता है.

ट्रांसजेंडर
Getty Images
ट्रांसजेंडर

बिल के प्रावधान के मुताबिक नाबालिग ट्रांसजेंडर को उसे परिवार में रहना होगा जिसमें उसने जन्म लिया है. उन्हें पनाह देने वाली संस्थाओं और लोगों को भी विधेयक में अपराधी ठहराया गया है.

इस स्थिति में ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों का पूछना है कि किसी को मारपीट और अपमान सहन करने के लिए मजबूर क्यों किया जाए? ख़ासकर जब इन सबसे तंग आकर कई किशोर आत्महत्या तक कर लेते हैं?

तो फिर अब उपाय क्या है?

इस सवाल के जवाब में मृदुल कहते हैं, "उपाय सिर्फ़ एक है. सरकार को यह बिल रद्द करके नया बिल लाना चाहिए. ये बिल इतना कमज़ोर है कि इसमें हेर-फेर करके दोबारा पेश किए जाने की गुंजाइश भी नहीं है."

उन्होंने कहा कि सरकार को जेंडर मुद्दों पर काम करने वालों और ट्रांसजेंडर समुदाय से सलाह मशविरा करना चाहिए और फिर उसके बाद कोई फैसला लेना चाहिए.

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+