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अनुष्का और दीपिका जैसी सफल अभिनेत्रियां क्यों फ़िल्में बना रही हैं

हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पहले की तुलना में काफी बदल चुकी है. जिस तरह दर्शकों की मांग बदल रही है उसी तरह फ़िल्म निर्माण की प्रक्रिया में भी बदलाव हो रहे हैं.

पुरुष प्रधान हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री अब फ़िल्मों में लिंग समानता की ओर झुक रही है. फ़िल्म अभिनेता शाहरुख़ ख़ान, सलमान ख़ान, आमिर ख़ान, अक्षय कुमार, अजय देवगन, रणबीर कपूर जैसे कलाकार फ़िल्म निर्माण का रुख़ कर फ़िल्म निर्माण में आगे आए हैं. लेकिन अब अभिनेत्रियां भी पीछे नहीं हैं.

Why are successful actresses like Anushka and Deepika making films?

अपने अभिनय से फ़िल्म इंडस्ट्री में जगह बनाने वाली अनुष्का शर्मा ने भाई कर्नेश शर्मा के साथ मिलकर 'क्लीन स्लेट फ़िल्म्स' नामक प्रोडक्शन हाउस खोला है. इसके तहत उन्होंने NH10, परी, फ़िल्लौरी और बुलबुल जैसी फ़िल्में बनाई हैं.

इंटरनेशनल स्टार बन चुकी प्रियंका चोपड़ा ने 'पर्पल पेबल्स पिक्चर्स' नामक प्रोडक्शन हाउस खोल कई हिंदी और क्षेत्रीय फ़िल्मों का निर्माण किया जिसमें शामिल है मराठी फ़िल्म वेंटीलेटर, नेपाली फ़िल्म पहुना और साल के शुरुआत में OTT पर रिलीज़ हुई फ़िल्म व्हाइट टाइगर.

अपनी अदाकारी का लोहा मनवा चुकी दीपिका पादुकोण ने फ़िल्म निर्माण में "का प्रोडक्शन" से कदम रखा और फ़िल्म छपाक बनाई.

वहीं अभिनेत्री आलिया भट्ट, तापसी पन्नू, कंगना रनौत, करीना कपूर भी अपने निर्माता बनने की घोषणा कर चुकी हैं.

इस ट्रेंड को सकारात्मक नज़रिए से देखने वाले इतिहासकार एस एम एम औसजा का कहना है कि अब अभिनेत्रियां भी अभिनेताओं की बराबरी कर रही हैं. हालांकि फ़िल्म निर्माण में भागेदारी का ट्रेंड अभिनेताओं ने शुरू किया था लेकिन ये बहुत ही सकारात्मक क़दम है.

ट्रेंड की वजह ?

फ़िल्म कारोबार के जानकार अतुल मोहन कहते हैं, ''आज के कलाकारों की पीढ़ी बहुत ही चतुर है. वो निरंतर भविष्य के बारे में सोचती रहती है कि कैसे पैसा बनाया जा सकता है. बतौर कलाकार वो कैसे सुरक्षित रह सकते हैं.''

वह कहते हैं,"पहले फ़िल्में बनती थीं तो सिर्फ़ सिनेमाघरों में रिलीज़ हुआ करती थीं और सिर्फ़ दूरदर्शन हुआ करता था. पर पिछले 10 साल में बहुत परिवर्तन हुआ है. फ़िल्मों की कमाई के आंकड़े बढ़े हैं. 100 करोड़ - 300 करोड़ हो गया है.

सैटेलाइट से पैसा मिल रहा है, डिजिटल से पैसा मिल रहा है, ऑडियो से पैसा मिल रहा है, ओवरसीज फ़िल्म कारोबार से पैसा मिल रहा है. इतने सारे ज़रिये हैं जिससे पैसा कमाया जा सकता है. इसके साथ साथ आईपीआर (इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स). भविष्य में पैसे कमाने का बहुत बड़ा ज़रिया बन रहा है."

अतुल मोहन आगे कहते हैं कि 'जिस तरह से राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन ने बड़े निर्देशक जैसे यश चोपड़ा के साथ मिलकर फ़िल्म बनाई. वही बच्चन साहब जब टॉप पर आये तो उन्होंने डिस्ट्रीब्यूशन लेने शुरू किये जिसमें अमर अकबर एन्थनी, नसीब जैसी फ़िल्में शामिल हैं. वहीं उनकी अगली पीढ़ी शाहरुख़ ख़ान ने फ़िल्म स्टूडियो खोल दिया. अभिनेताओं को देखकर अभिनेत्रियों को भी महसूस हुआ कि फ़िल्म निर्माण में पैसा है. उनकी मांग है तो फिर फ़िल्म निर्माण में भागेदारी की जाए.'

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फ़ायदा और स्टूडियो का साथ

आज के दौर की अभिनेत्रियां सिर्फ़ हीरो के इर्द गिर्द की कहानियों का हिस्सा नहीं है बल्कि फ़िल्मों में अहम भूमिकाओं में नज़र आती हैं. वहीं ऐसी कई कहानियों में अभिनेत्रियों ने अपने अभिनय का लोहा मनवाया है. फिर चाहे अनुष्का शर्मा की फ़िल्म NH 10 हो या दीपिका पादुकोण की छपाक.

अतुल मोहन आगे कहते हैं, ''आजकल अभिनय दर्शाने वाले कई अनोखे विषयों पर फ़िल्में बन रही हैं. ऐसी बहुत सारी कहानियां होती हैं जिसे निर्माता नहीं मिल पाते और अगर कोई बड़ा हीरो या हीरोइन ऐसी कहानी पर फ़िल्म बनाने का फ़ैसला करता है तो उन्हें बड़े स्टूडियो का सहयोग मिल जाता है जैसेकि एरोस ने अनुष्का शर्मा की फ़िल्मों को दिया और फ़ॉक्स स्टूडियो इंडिया ने दीपिका की फ़िल्म को दिया.

फ़िल्म स्टूडियो फ़िल्म निर्माण के हर विभाग में मदद करता है जिसमें प्रोडक्शन से लेकर मार्केटिंग और रिलीज़ सब कुछ शामिल होता है.

वो कहते है, "उन्हें अपने तरह का सिनेमा बनाने की चाह होती है. जिस तरह के रोल का सम्मोहन होता है पर उन्हें मिल नहीं पाता तो बतौर निर्माता वो उन विषयों को चुनती हैं. जिससे उनका आईपीआर ज़िंदगीभर के लिए सुरक्षित हो जाता है. वो उनकी ज़ायदाद बन जाती है जिसे हर पाँच या सात साल में मोनेटाइज़ कर सकते है और विभिन प्लेटफ़ॉर्म पर चला सकते हैं."

हालांकि उन्होंने साफ़ किया की स्टार के निर्माता बन जाने से फ़िल्म की लागत कम नहीं होती क्योंकि स्टार अपने मार्किट रेट को ख़ुद की बनाई फ़िल्म में भी बरक़रार रखते है. वहीं स्टार ये भी तय करते हैं कि अगर फ़िल्म थिएटर में रिलीज़ होगी तो उनकी फ़ीस कितनी होगी, वहीं अगर सीधे OTT पर रिलीज़ होगी तो उनकी फ़ीस थिएटर रिलीज़ फ़ीस से अधिक होगी.

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ट्रेंड नया नहीं है

हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के शुरुआती दौर में कई ऐसी सशक्त अभिनेत्रियां थीं जिन्होंने फ़िल्म निर्माण की हर कमान संभाली. इतिहासकार अमृत गंगर ने ऐसी सशक्त अभिनेत्रियों पर प्रकाश डाला है.

फ़ातिमा बेग़म ने अपना करियर उर्दू मंच से शुरू किया. उसके बाद आर्देशिर ईरानी की 'वीर अभिमन्यु' फ़िल्म से फ़िल्मों में अभिनय की शुरुआत की. आगे चलकर आर्देशीर ईरानी ने इम्पीरियल फ़िल्म कंपनी बनाई जिसने 1931 में भारत की पहली साउंड फ़िल्म 'आलम आरा' का निर्माण किया.

आलम आरा में फ़ातिमा बेग़म की बेटियां ज़ुबैदा, सुल्ताना और शहज़ादी ने अभिनय किया.

1926 में फ़ातिमा बेगम ने फ़ात्मा फ़िल्म्स नामक अपना प्रोडक्शन हाउस खोला और 1928 में विक्टोरिया - फ़ातिमा फ़िल्म की स्थापना की. फ़ातिमा बेगम बहुमुखी प्रतिभा वाली महिला थीं जिन्होंने बड़े-बड़े स्टूडियो जैसे कोहिनूर और इम्पीरियल स्टूडियो की फ़िल्मों में अभिनय के साथ साथ अपने प्रोडक्शन से फ़िल्म निर्माण भी किया जिसमें वो स्क्रिप्ट राइटिंग और निर्देशन के साथ-साथ अभिनय भी किया करती थीं.

1930 के दशक में उन्होंने अभिनय जारी रखा. वो हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर के महान निर्देशक नानुभाई वकील और होमी मास्टर के साथ काम करती दिखीं.

ज़ुबैदा, 1931 में भारत की पहली साउंड फ़िल्म आलम आरा की स्टार रहीं.

अभिनेत्री ज़ुबैदा ने निर्देशक नानूभाई वकील के साथ मिलकर 1934 में महालक्ष्मी सिनेटोन कंपनी स्थापित की. उन्होंने 1930 के दशक के अंत तक फ़िल्म जगत को विदा कह दिया.

उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर में नवल गाँधी के कई सामाजिक फ़िल्मों में परंपरागत आयाम वाली छवि विकसित की जिसमें शामिल है रवीन्द्रनाथ टैगोर के प्रतिष्ठित नाटक पर आधारित फ़िल्म बलिदान.

जद्दनबाई, 1930 के दशक के हिंदी सिनेमा की बहुमुखी प्रतिभा वाली महिला थीं. जद्दनबाई 1892 में इलाहाबाद में जन्मीं और 1949 में मुंबई में उनका निधन हो गया. 1932 में वो लाहौर के प्लेआर्ट फ़ोटो टोन स्टूडियो से जुड़ीं और चार साल बाद 1936 में उन्होंने संगीत फ़िल्म्स नामक कंपनी की स्थापना की.

1933 से 1935 में उन्होंने कई फ़िल्मों में अभिनय के साथ-साथ गीत भी गाया जिसमें शामिल है इंसान या शैतान,राजा गोपीचंद, सेवा सदन, तलाश-ए-हक़, परीक्षा और नाचवाली.

उन्होंने हिंदी और पंजाबी फ़िल्मों में गाना गाया. दो फ़िल्मों की वो संगीतकार भी रहीं. 1948 में आई फ़िल्म अंजुमन की स्क्रिप्ट भी उन्होंने लिखी थी. बहुमुखी, प्रतिभा की धनी जद्दनबाई हुसैन ने गायिका, संगीतकार, नर्तकी, अभिनेत्री, निर्देशक और निर्माता के तौर पर बख़ूबी अपनी पहचान बनाई.

वह प्रसिद्ध अभिनेत्री नरगिस की माँ थीं. अमृत गंगर के मुताबिक़, ऐसी प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली शख़्सियत आज के दौर की अभिनेत्रियों में मिलना मुश्किल है.

कानन देवी, भारतीय सिनेमा की एक और प्रभावशाली महिला रहीं. उनका हिंदी और बंगाली सिनेमा में योगदान रहा. साइलेंट एरा से अभिनय की शुरुआत करने वाली कानन देवी 1949 में श्रीमती पिक्चर्स से फ़िल्म निर्माण की शुरुआत की. अनन्या फ़िल्म से उन्होंने सव्यसाची कलेक्टिव लांच किया.

उन्होंने क़रीब 11 फ़िल्मों का निर्माण किया. अपनी कई मशहूर फ़िल्मों में वो वो गायिका भी रहीं. के एल सहगल के साथ 1938 में बनी फ़िल्म साथी, स्ट्रीट, सिंगर, 1941 में बनी फ़िल्म लगान और परिचय ऐसी फ़िल्में थीं.

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बीते दौर की महिला निर्माता और कहानियां

इस विषय पर अमृत गंगर टिप्पणी करते हैं, " जब कोई महिला किसी विषय पर फ़िल्म बनाती है, लिखती है, निर्देशन करती है या निर्माण करती है तो उसमें उस महिला का दृष्टिकोण आ ही जाता है, पर व्यक्तिगत तौर पर मुझे लगता है कि 1930 और 1940 के दशक के मुकाबले आज का दौर काफ़ी अलग है. आज का बॉलीवुड उस दौर के हिंदी फ़िल्म स्टूडियो के मुकाबले बेहद सामंती और लिंग भेद वाला नज़र आता है, साथ ही सांप्रदायिक मानसिकता भी है. वरना उस दौर में फ़ातिमा बेगम, ज़ुबैदा और जद्दनबाई जैसी महिलाएँ उभर कर नहीं आतीं.''

वो आगे कहते हैं," उन अभिनेत्रियों ने हर विषय में अपना हाथ आज़माया जिसमें सामाजिक, ऐतिहासिक, साहसी, बाग़ी, करतब दिखानेवाली और थ्रिलर फ़िल्में शामिल थीं. अगर ऐसा नहीं होता तो उस दौर की निडर नाडिया नहीं बनती."

उस समय बनी 'बलिदान' फ़िल्म में माँ काली की जीव हत्या की निंदा की गई थी जिसमें ज़ुबैदा ने अभिनय किया था.

1960 के बाद आया बदलाव

हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर में कई अभिनेत्रियां निर्माता बन अनेक विषयों पर अपनी राय रखती रहीं. पर वक़्त के साथ उनकी संख्या में गिरावट आई. इतिहासकार अमृत गंगर इसमें समाज में बढ़ती पितृसत्तात्मकता को कारण बताते हैं.

''1960 के बाद समाज में पितृसत्तात्मकता और रूढ़िवादिता बढ़ी और साथ ही धार्मिक, सामाजिक और पारिवारिक परम्पराओं को तोड़ने का डर भी बढ़ा.''

वो आगे कहते है," व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि फ़िल्म उद्योग में महिलाओं की बहुमुखी प्रतिभाओं के उभरने के लिए उदार, धर्मनिरपेक्ष, ग़ैर-अराजकतावादी, गैर-नस्लवादी और गैर-भाषावादी दृष्टिकोण वाले माहौल का होना बहुत ज़रूरी है. कल्पना कीजिए, फ़ातिमा बेगम गुजरात में सूरत के पास के राजघराने की थीं जिन्होंने नवाब से शादी की थी. उनकी तीन अभिनेत्री बेटियाँ राजकुमारियां थीं. उनके पुरुष लोग कम अराजक और प्रभावशाली रहे होंगे, हम यह अनुमान लगा सकते हैं."

इक्कीसवीं सदी के हिंदी सिनेमा की अभिनेत्रियां बदलते वक़्त के साथ कई ऐसे विषयों वाली फ़िल्मों का हिस्सा बनी हैं जिसने समाज में एक संवाद छेड़ा है और दर्शकों को सिनेमाघर तक खींचकर कमाई भी की है.

इतिहासकार एस एम एम औसजा मानते हैं कि टॉप अभिनेत्रियाँ जो बॉक्स ऑफ़िस का भार अपने कंधों पर ले रही हैं, उन अभिनेत्रियों की फ़िल्म निर्माण में सक्रियता से दर्शकों को कई अनोखी नई कहानियां देखने को मिलेंगी.

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