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बिहार चुनाव 2020: कन्हैया की 'जन गण मन यात्रा' से किसका बिगड़ेगा वोटो का गणित?

कन्हैया की जन गण मन यात्रा से किसका बिगड़ेगा वोटो का गणित?

नई दिल्ली। बिहार में कन्हैया कुमार की 'जन गण मन यात्रा' काफी सुर्खियां बटोर रहा है। जहां जहां कन्हैया जा रहे हैं वहां-वहां भीड़ उमड़ रही है। लोकसभा चुनाव में बिहार के अपने गृह क्षेत्र बेगुसराय लोकसभा सीट से भले कन्हैया भाजपा के गिरिराज सिंह से चुनाव काफी बड़े अंतर से हार गए हों, लेकिन उनकी सभाओं की भीड़ यह बताती है कि उनकी लोकप्रियता तनिक भी कम नहीं हुई है। कन्हैया कुमार की यही लोकप्रियता बिहार की राजनीति में एक नया कोण बना रहा है।

विधान सभा चुनाव का वर्तमान ट्रेंड

विधान सभा चुनाव का वर्तमान ट्रेंड

दिल्ली विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल के आम आदमी पार्टी की प्रचंड जीत केजरीवाल की लोकप्रियता की भी जीत थी। यह लोकप्रियता असल मुद्दों को तरजीह देने की लोकप्रियता थी। जो लोग केजरीवाल और आम आदमी पार्टी को पसन्द नहीं भी करते थे वे भी इस बात की तारीफ करते दिखे कि केजरीवाल ने दिल्ली का चुनाव जनता के असल मुद्दों पर लड़ा इसलिए वे खुलकर केजरीवाल का विरोध नहीं कर सके। और यह केजरीवाल के पक्ष में गया। इसी तरह दिल्ली चुनाव से पहले हुए झारखंड विधानसभा चुनाव को देखें तो वहां भाजपा की पूर्णकालिक सरकार रहने के बाद भी चुनाव अभियान में नरेंद्र मोदी के चेहरे को तरजीह दी गई थी। वहां भी डबल इंजन वाली सरकार की बात दुहराई गयी लेकिन जनता के असल मुद्दे वहां भी गायब रहे। जनता ने उनके मुद्दों की बात करने वालों पर भरोसा जताया और भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। कुछ ऐसा ही हरियाणा विधानसभा चुनाव में दिखा। वहां भी मंदिर मस्जिद, सेना, देश, राष्ट्रवाद जैसे मुद्दे अपेक्षाकृत जनता के बेसिक मुद्दों पर भारी रहे। हालांकि भाजपा वहां जननायक जनता पार्टी के सहयोग से अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुई लेकिन वहां का परिणाम निश्चित रूप से भाजपा के लिए सकून भरा नहीं रहा।

'जन गण मन यात्रा'

'जन गण मन यात्रा'

राज्य चुनावों के इस ट्रेंड से यह दिखता है कि जहां भी मुद्दे जनता के हित से सीधे जुड़े हैं वहां आम जनता, पार्टी और नेता से ऊपर उठकर मुद्दों पर पार्टियों को समर्थन दे रहे हैं। इसी लिहाज से बिहार में कन्हैया कुमार की 'जन गण मन यात्रा' काफी अहम है। वे 30 जनवरी को भितिहरवा से यह यात्रा लेकर निकले हैं और हर दिन तकरीबन एक जिले में रैली संबोधित कर रहे हैं और विभिन्न मुद्दों पर जनता से बात कर रहे हैं। वैसे तो यह रैली प्रमुख रूप से सीएए-एनआरसी के विरोध में है, लेकिन इस पूरी यात्रा में कन्हैया जो जो मुद्दे उठा रहे हैं, वे बिहार की राजनीति से पूरी तरह रिलेट करते हैं।

कन्हैया जिन मुद्दों पर फोकस कर रहे हैं

कन्हैया जिन मुद्दों पर फोकस कर रहे हैं

कन्हैया कुमार की सभा सीएए-एनआरसी के मुद्दे से शुरू होते हुए आम जनता के हर अहम मुद्दे पर आकर ख़त्म होती है ठीक जैसे दिल्ली में केजरीवाल की चुनावी सभा अंत में जनता के मुद्दों पर आकर खत्म होती थी। चूंकि हर राज्य की परिस्थितियां अलग होती हैं इसलिए तरीकों में बदलाव हो सकता है लेकिन मुद्दों में नहीं। कन्हैया के इस यात्रा के जो प्रमुख मुद्दे हैं वे हैं- शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी, रोटी, कपड़ा, मकान, किसान, जवान, युवा, बेरोजगारी, नौकरी, पेंशन, निजीकरण, सामाजिक सौहार्द, साम्प्रदायिकता, भेदभाव, कॉन्ट्रैक्ट सिस्टम, पुलिसिया अत्याचार, समान काम का समान वेतन, अवसर की समानता, सरकारी लूट, धर्म का धंधा आदि-इत्यादि। ये सारे मुद्दे आम जनता के कोर मुद्दे हैं, और बिहार जैसे राज्य में जहां नीतीश और भाजपा की मिलीजुली सरकार करीब पंद्रह सालों से सत्ता में है, वहां अगर नीतीश और भाजपा गठबंधन अगर इन मुद्दों पर जनता के बीच जाती है तो वह खुद सवालों के घेरे में आ जाती है। यही सवाल कन्हैया अपनी सभा में उठाते हैं और भरपूर समर्थन पा रहे हैं और विरोधी असहज हो रहे हैं।

विपक्ष इस कारण से असहज है

विपक्ष इस कारण से असहज है

नागरिकता कानून हो या कोई भी मुद्दा, कन्हैया उन मुद्दों को आम भाषा में आम लोगों को समझा रहे हैं। वे जनता से सीधा संवाद कायम कर रहे हैं। और उनकी सभा में उमड़ी भीड़ से लगता भी है कि कन्हैया इसमें सफल होते भी दिख रहे हैं। यही एक मुख्य कारण है कि कन्हैया की 'जन गण मन यात्रा' से उनकी विरोधी पार्टियों में काफी बेचैनी दिखती है। अगर कन्हैया बिहार चुनाव से पहले बिहार की राजनीति को जनता के असल मुद्दों के इर्दगिर्द लाने में कामयाब हो जाते हैं तो यह नीतीश कुमार और भाजपा की जुगलबंदी के लिए किसी मुसीबत से कम नहीं होगा।

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