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बीएसपी चीफ मायावती और भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर में जुबानी जंग से फायदे में कौन?

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नई दिल्ली- उत्तर प्रदेश में तेजी से उभरे दलितों के संगठन भीम आर्मी (Bhim Army)ने बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो मायावती को ऐन चुनाव के वक्त में असहज कर दिया है। निश्चित तौर पर उन्हें लग रहा होगा कि अगर दलितों के एक बड़े वर्ग में भीम आर्मी चीफ (Bhim Army Chief)के तेजी से बढ़ते प्रभाव को रोकने में नाकाम रहीं, तो उनकी अबतक की सारी राजनीति धरी की धरी रह जाएगी। 2014 और 2017 के चुनावों में अपना वोट शेयर बरकरार रखने के बावजूद भी उनकी पार्टी जिस तरह से संसद और विधानसभा से दूर हो गई, उसने उन्हें पहले ही बहुत विचलित कर रखा है। ऐसे में भीम आर्मी चीफ (Bhim Army Chief) चंद्रशेखर आजाद रावण (Chandrashekhar Azad Ravan)से मिलने वाली हर चुनौती उन्हें खतरे की बड़ी घंटी लग रही है। क्योंकि, अब तक सिर्फ मायावती का सम्मान करने की बात करने वाले रावण अब उनके खिलाफ मुखर उठे हैं। उन्होंने बीएसपी लीडरशिप (BSP Leadership) की नीतियों पर जो सवाल उठाए हैं, उससे उन्हें काफी नुकसान भी हो सकता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि दलितों की एक स्थापित मसीहा और उग्र दलित राजनीति के नए प्रवर्तक के बीच अगर प्रभुत्व की जंग होती है, तो फायदा किसे मिलेगा?

दलितों का दबंग कौन?

दलितों का दबंग कौन?

यूपी (UP) की 21% दलित आबादी का सियासी महत्त्व क्या है, यह राजनीति की मामूली समझ रखने वाला हर शख्स जानता है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को राज्य में 39.67% वोट मिले थे और वहां एनडीए 73 सीटें जीत गई थी। 2017 के विधानसभा चुनावों में पार्टी को 42.63% वोट मिले थे और उसने 312 सीटों पर कब्जा कर लिया था। इन दोनों चुनावों में समाजवादी पार्टी (SP) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) अलग-अलग चुनाव मैदान में उतरी थी। लोकसभा में तो बहुजन समाज पार्टी (BSP) का खाता भी नहीं खुला और समाजवादी पार्टी (SP) से सिर्फ मुलायम के परिवार के 5 उम्मीदवार जीत पाए थे। विधानसभा चुनाव में एसपी (SP) मुश्किल से 47 सीटें जीत पायी और बीएसपी (BSP) 19 सीटों पर ही अटक गई। इसमें लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बीएसपी (BSP)को क्रमश: 19.77% और 22.23% वोट मिले थे, जबकि एसपी (SP) को क्रमश: 22.35% और 21.82% वोट मिले थे। अगर ये दोनों पार्टियां तब मिलकर मैदान में उतरतीं तो 2014 में इन्हें 42.12% वोट मिलते और 2017 में 44.05% वोट मिले होते। पिछले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में जो नहीं हो पाया उसी सपने को पूरा करने के लिए बुआ ने अबकी बार सारी सियासी दुश्मनी भुलाकर बबुआ की साइकिल का हैंडल थामने का फैसला किया है।

ऐसे में मायावती को डर है कि अगर उनके दलित वोट बैंक में भीम आर्मी (Bhim Army)ने सेंध मारी तो यूपी में महागठबंधन का खेल खराब हो सकता है। जबकि, भीम आर्मी चीफ (Bhim Army Chief) चंद्रशेखर आजाद रावण (Chandrashekhar Azad Ravan)खुद को मायावती के बाद उनके एकमात्र उत्तराधिकारी एवं दलित आइकन (Dalit Icon) के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। कुछ इसी मकसद से उन्होंने वाराणसी में नरेंद्र मोदी के खिलाफ दावेदारी भी पेश की है। शायद उन्होंने सोचा होगा कि युवा दलितों पर उनके बढ़ते प्रभाव को देखकर मोदी-विरोधी विपक्ष उनको समर्थन की घोषणा कर देगा। अगर ऐसा नहीं भी हुआ तो भी वो मोदी-विरोधी तीखी बयानबाजी करके और प्रधानमंत्री के खिलाफ चुनाव लड़के अपनी छवि एक राष्ट्रीय दलित आइकन (Dalit Icon) की बना सकते हैं।

किसने बिगाड़ी बात?

किसने बिगाड़ी बात?

2017 में यूपी के सहारनपुर के शब्बीरपुर गांव में जातीय हिंसा के बाद से चंद्रशेखर आजाद रावण (Chandrashekhar Azad Ravan) सुर्खियों में आ गए। मायावती ने शुरू से उनके प्रति नरम रवैया अपनाए रखा था। बीच-बीच में उन्हें बीजेपी (BJP)के एजेंट के रूप में जरूर पेश करती रहीं। लेकिन, भीम आर्मी चीफ (Bhim Army Chief)आमतौर पर मायावती के खिलाफ कुछ भी कहने से परहेज करते रहे। वे माया को दलित आंदोलन की एक अगुवा बताते रहे। लेकिन, जब कुछ हफ्ते पहले मेरठ के एक अस्पताल में प्रियंका गांधी वाड्रा ने रावण से मुलाकात की तो मायावती का माथा ठनक गया। दरअसल, उसी मुलाकात के बाद भीम आर्मी चीफ (Bhim Army Chief)ने वाराणसी में मोदी को चुनौती देने का ऐलान कर दिया था। मायावती को लगा कि ये तो उनके वोट बैंक को हड़पने की साजिश है। अगर चंद्रशेखर ने मोदी को टक्कर दे दी, तो फिर कौन दलित उन्हें पूछने के लिए तैयार होगा? इसमें वाराणसी में चंद्रशेखर के रोड शो ने उन्हें इतना नाराज कर दिया कि उन्होंने ट्विटर पर अपनी भड़ास निकाल दी। मायावती ने भीम आर्मी (Bhim Army) को न सिर्फ बीजेपी (BJP)की साजिश की उपज बताया, बल्कि अपने समर्थकों से उसे वोट नहीं देने की अपील तक जारी कर दी।

बीएसपी सुप्रीमो के प्रहार ने भीम आर्मी चीफ (Bhim Army Chief)चंद्रशेखर आजाद रावण (Chandrashekhar Azad Ravan)को भी भड़का दिया। उन्होंने मायावती पर जो सियासी हमला बोला है, वह निश्चित तौर पर उन्हें राजनीतिक तौर पर परेशान कर सकता है। रावण ने कहा है कि बीएसपी में सवर्णों को टिकट देकर बहुजन मिशन में क्या योगदान दिया जा रहा है? उन्होंने पार्टी में सतीश चंद्र मिश्रा के प्रभाव के बहाने भी मायावती पर निशाना साधा है। जबकि, खुद के बीजेपी एजेंट होने के बचाव में उनका तर्क है कि भाजपा सरकार ने उन्हें 16 महीने रासुका(NSA)के तहत जेल में डाला। यानी यूपी के इन दो दलित चेहरों के बीच अब तक जो एक सियासी शिष्टाचार कायम था, अब पूरी तरह से टूटता नजर आ रहा है। अगर दोनों के बीच का मतभेद मतदाताओं तक भी पहुंचा गया, तो ऐन चुनाव से पहले यूपी का पूरा सियासी समीकरण बदल भी सकता है।

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फायदे में कौन?

फायदे में कौन?

एसपी और बीएसपी दोनों का वोट एक-दूसरे के उम्मीदवारों में ट्रांफसर होने को लेकर पहले से ही कई तरह की आशंका जताई जा रही है। एक विश्लेषण के मुताबिक महागठबंधन होने से बीजेपी के मुकाबले एसपी और बीएसपी को सीधे-सीधे 35 सीटों का फायदा हो सकता है। जाहिर है कि अगर दलित वोटरों में किसी तरह की उलझन की स्थिति पैदा हुई, तो यह बीजेपी के लिए फायदेमंद रहेगा। वैसे ये बात भी सच है कि रावण ने प्रियंका से मुलाकात के बाद ही वाराणसी से चुनाव लड़ने की घोषणा की थी। खबरें तो ये भी है कि प्रियंका को उनसे मिलने के लिए सहारनपुर से कांग्रेस उम्मीदवार इमरान मसूद ने ही भेजा था, जो पिछले लोकसभा चुनाव में मोदी के खिलाफ 'बोटी-बोटी.....'वाले विवादास्पद बयान के कारण चर्चित हुए थे। ऐसे रावण बीजेपी कांग्रेस या खुद में से किसके लिए काम कर रहे हैं कहना बहुत मुश्किल है। लेकिन, इतना तय है कि अगर उन्होंने खुद को युवा दलित आइकन (Youth Dalit Icon) के तौर पर स्थापित करने के लिए पूरी शक्ति लगा दी, तो वो यूपी में सपा-बसपा की मुश्किलें निश्चित तौर पर बढ़ा सकते हैं, जिसका फायदा उठाने में बीजेपी भी पीछे नहीं रहेगी।

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English summary
who will be benefited from fight between mayawati and Bhima Army's chief Chandrasekhar?
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