तो भूला दी गई किसान गजेन्द्र सिंह की शहादत

नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) गजेन्द्र सिंह को बहुत जल्दी भूला दिया। नेपाल और दिल्ली में आए जलजले ने उसके ऊपर से मीडिया का सारा फोकस हटा दिया। उसकी जंतर-मंतर पर फांसी लगाने से लेकर आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष के एक टीवी डिबेट में बहस के दौरान रोना या रोने के नाटक करने के बाद अब लगता है उस सारे मामले का अंत हो गया। सोमवार को राजधानी के एक अखबार में खबर छपी है कि गजेन्द्र सिंह के परिजन उसकी शोक सभा में भाग ले रहे हैं। जाहिर वे सब गमगीन हैं।

Who cares for Gajendra Singh now

किसानों के सवाल

बहरहाल, गजेन्द्र सिंह की दुखद मौत और उसके बाद हुई राजनीति के बाद उसे भूला सा दिया गया। इससे एक बात साफ है कि देश अब किसानों के सवालों को लेकर कोई बहुत संवेदनशील नहीं रहा। अब आप इस बात को इस तरह से भी समझ सकते हैं कि अब हमारे इधर किसानों के जीवन और संघर्षों से जुड़ी फिल्में भी कहां आती हैं,बनती हैं।

उपकार से दो बीघा जमीन तक

एक दौर में उपकार और दो बीघा जमीन जैसी कालजयी फिल्में बनती थीं। उन पर बहस होती थी। देश के प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने मनोज कुमार को जवानों और किसानों के जीवन पर फिल्म बनाने की सलाह दी थी। पर वह अब गुजर चुका है। तो माना जाए कि अब देश किसानों को लेकर लंबे समय तक परेशान नहीं हो सकता।

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