तमिलनाडु में अधीनम कौन होते हैं, ब्राह्मणवाद और राजनीति से उनका क्या संबंध है? सबकुछ जानिए
नई संसद में पवित्र सेंगोल की स्थापना के लिए तमिलनाडु से आए अधीनम संतों को लेकर भी राजनीति हो रही है। उन्हें ब्राह्मणवाद से जोड़कर भाजपा सरकार पर आरोप लगे हैं। जबकि, कहानी अलग है।

नए संसद भवन के उद्घाटन के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस पवित्र सेंगोल को लोकसभा में स्पीकर के आसन के पास स्थापित किया, उसके लिए तमिलानाडु से विशेष रूप से अधीनम संत दिल्ली आए थे। इस भव्य नजारे का गवाह पूरा विश्व बना है। लेकिन, फिर भी यह प्रक्रिया राजनीतिक विवाद से अछूती नहीं रह गई है। इसके चलते बीजेपी सरकार पर ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगाए गए हैं।

अधीनम को लेकर क्या विवाद हुआ?
उत्तर प्रदेश की मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह का बायकॉट करने वाले राजनीतिक दलों में शामिल रही। पार्टी के महासचिव स्वामी प्रसाद मौर्य ने इस अवसर पर सेंगोल की स्थापना को लेकर एक बहुत ही विवादित बयान दिया है। उन्होंने दावा किया कि 'नए संसद भवन में सेंगोल की स्थापना के लिए सिर्फ रूढ़िवादी ब्राह्मण गुरुओं को ही आमंत्रित किया गया था।'

अधीनम कौन हैं?
अधीनम संत तमिलनाडु के गैर-ब्राह्मण शैव मठों में रहने वाले लोग हैं। अधीनम का मतलब एक मठ भी हो सकता या इसके पुजारी भी हो सकते हैं, जिन्हें अधीनमकार्थर कहा जाता है। तमिलनाडु में लगभग 20 प्रमुख अधीनम हैं, जिनमें से प्रत्येक मठों के पास करोड़ों की संपत्ति है।

अधीनम का ब्राह्मणवाद से क्या संबंध है?
अधीनम ब्राह्मण नहीं होते। प्रत्येक अधीनम की अलग जाति और क्षेत्रीय विशेषता होती है। मसलन, तिरुवदुथुरै और मदुरै के अधीनम प्रमुख परंपरागत रूप से शिव पिल्लई या मुदलियार समाज से होते हैं, जो उस इलाके में काफी प्रभावी हैं। वहीं पेरुर और सिरूर के अधीनम प्रमुख गौंडार होते हैं। पश्चिमी तमिलनाडु में इनकी अच्छी जनसंख्या है। जबकि, चेट्टिनाड इलाके में कुंद्राकुडी अधीनम की अगुवाई चेट्टियार करते हैं।

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अधीनम का इतिहास क्या है?
इतिहास को लेकर सभी अधीनमों के अपने दावे हैं। हालांकि, चोल, चेरा और पांडिया राजा प्रमुख अधीनमों को संरक्षण देते थे, इसका रिकॉर्ड मौजूद है। जैसे मदुरै के अधीनम का दावा है कि वह 1,300 साल पुराने हैं और उसके मौजूदा अधीनमकार्थर 293वें प्रमुख हैं।

अधीनम परंपरागत रूप से क्या करते हैं?
कई अति-प्राचीन मंदिरों का संचालन अभी भी अधीनमों के हाथों में है। सदियों से ये शैव दर्शन और तमिल साहित्य को बढ़ावा देते आए हैं। पिछली कुछ सदियों में इनकी मदद से दुर्लभ ताड़ के पत्तों की पांडुलिपियों का पता लगाने और उन्हें प्रकाशित करने में सहायता मिली है। कुल मिलाकर यह तमिल संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन का भी काम करते आए हैं।

अधीनम का राजनीति से क्या संबंध है?
आज भी अधीनम मूल रूप से अपने इलाके में धार्मिक और सांस्कृतिक मामलों को लेकर ही सक्रिय रहते हैं। वह आमतौर पर सक्रिय राजनीतिक विचारों से दूर होते हैं और न ही अपने अनुयायियों को अपनी पसंद के बारे में कोई इशारा करते हैं। अपवाद को छोड़ दें तो अधीनम खुद को राजनीतिक मसलों से काफी अलग रखते हैं।

मौर्य की टिप्पणी पर भाजपा का जवाब
अधीनम संतों को ब्राह्मणवाद से जोड़कर सपा के नेता ने जो विवाद खड़ा करने की कोशिश की थी, उसपर बीजेपी के मुख्य प्रवक्ता अनिल बलूनी ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने स्वामी प्रसाद को यह कहकर आईना दिखाया है कि उन्होंने आरोप लगाने से पहले ठीक से होमवर्क नहीं किया था।
ओबीसी समाज से आते हैं अधीनम-बीजेपी
भाजपा नेता ने कहा है, 'अधीनम को जो समुदाय चलाते है, वह पिछड़ी जाति और अन्य पिछड़ी जाति (OBC) की श्रेणियों में आते हैं। तमिल साहित्य का उनका एक गौरवशाली इतिहास रहा है, जो कि भगवान शिव के उपासक हैं। ऐसी टिप्पणियां करना इन पवित्र अधीनमों और हिंदू धर्म की विविधता का अपमान है।'












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