Year 2015: जब याकूब मेमन के लिए पूरी रात खुला रहा सुप्रीम कोर्ट
नयी दिल्ली (ब्यूरो)। साल 2015 का सबसे हॉट टॉपिक रहा मुंबई बम ब्लास्ट के आरोपी याकूब मेमन की फांसी। यही एक मात्र ऐसा केस था जिसमें देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट को देर रात खोलना प ड़ा। कोर्ट सिर्फ खुला ही नहीं बल्कि 1 घंटे तक सुनवाई भी हुई।
इस फाइनल सुनवाई के बाद 30 जुलाई को याकूब मेमन को नागपुर सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई थी। उल्लेखनीय है कि याकूब मेमन मुंबई बम ब्लास्ट के मुख्य आरोपी टाइगर मेमल का भाई था। तो आईए साल 2015 के विदा होने पर इस पूरे घटनाक्रम को फिर से याद कर लेते हैं:

रात 2 बजे खुला था सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट के कुछ सीनियर वकीलों ने याकूब की फांसी पर 14 दिन की रोक लगाने की मांग को लेकर रात दो बजे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे। 3 बजकर 20 मिनट पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई थी। करीब डेढ़ घंटे चली सुनवाई के बाद कोर्ट ने याकूब की फांसी को बरकरार रखते हुए वकीलों की याचिका खारिज कर दी थी।

याकूब को बचाने की हर कोशिश नाकाम
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा याकूब की दया याचिका खारिज किए जाने के बाद वकीलों ने उसे बचाने के लिए देर रात नया दांव खेलना शुरू कर दिया था। रात करीब 10:45 बजे प्रशांत भूषण सहित कुछ अन्य वकील फांसी पर रोक लगाने के लिए मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू के घर पहुंचे।

वकीलों की दलील
सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले को आधार बनाते हुए इन वकीलों ने कहा था कि दया याचिका खारिज होने के कम से कम 14 दिन बाद ही किसी को फांसी दी जा सकती है। इसलिए याकूब की फांसी पर रोक लगाई जाए। सुप्रीम कोर्ट के वकीलों ने याकूब की फांसी पर 14 दिन की रोक लगाने की मांग लेकर रात ढाई बजे सुप्रीम कोर्ट खुलवाया था।

कौन था याकूब मेमन
याकूब का पूरा नाम याकूब अब्दुल रज्जाक मेमन है जो कि पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट था। मुंबई में 12 मार्च 1993 को सिलसिलेवार 12 धमाके हुए थे, जिसमें 257 लोगों की मौत हुई थी। टाडा कोर्ट ने 27 जुलाई 2007 को याकूब को आपराधिक साजिश का दोषी करार देते हुए सजा-ए-मौत सुनाई थी। इसके बाद उसने बॉम्बे हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति तक के पास अपील की थी लेकिन उसे राहत नहीं मिली थी।

कानून की भी उड़ी थी धज्जियां
साल 2015 में ही एक और अजीब चीज सामने आई और वो ये थी कि सुप्रीम कोर्ट में अभी सुनवाई चल रही थी उसी बीच नागपुर जेल प्रशासन ने मेमन की बॉडी उसके परिजनों को सौंपने का फैसला सुना दिया। जबकि जेल मैन्अल में यह नहीं है कि वो किसी के शव को उसके परिवार वालों को सौंपे। यह शायद कानून के साथ सबसे बड़ा खिलवाड़ था। ऐसा शायद ही देखने को मिला हो












Click it and Unblock the Notifications