जब सरदार का वेष रखकर सुब्रमण्यम स्वामी ने संसद भवन में मारी थी एंट्री

जब सरदार का वेष रखकर सुब्रमण्यम स्वामी ने संसद भवन में मारी थी एंट्री

डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी अगर नेता नहीं होते तो इकनॉमिक्स के नोबेल पुरस्कार विजेता हो सकते थे। भारतीय राजनीति में गिनती के लोग ही हैं जो उनके ज्ञान की बराबरी कर सकें। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि सुब्रमण्यम स्वामी ने राजनीति में आकर अपनी विशिष्ट प्रतिभा के साथ अन्याय किया। वे भाजपा के बड़े नेता हैं लेकिन योग्यता के अनुरूप उन्हें पार्टी और सरकार में जगह नहीं मिली। अख्खड़ स्वभाव और स्पष्टवादिता के कारण भाजपा के शीर्ष नेता उनसे परहेज करते हैं। नरेन्द्र मोदी भी उनसे दूरी बना कर रहते हैं। पार्टी में डॉ. स्वामी की उपेक्षा पर उमा भारती ने ट्वीट किया है, कलयुग की त्रासदी है कि कौआ खीर खा रहे हैं और हंस मोती की जगह दाना चुग रहे हैं। क्या नरेन्द्र मोदी ने निजी खुन्नस में सुब्रमण्यम स्वामी को वित्त मंत्री नहीं बनाया ? उन्हें गणितीय अर्थशास्त्र का सबसे बड़ा जानकार माना जाता है। तब फिर नरेन्द्र मोदी ने डॉ. स्वामी को नजरअंदाज क्यों किया ? क्या नरेन्द्र मोदी वैसे लोगों से खुन्नस पाल लेते हैं जो उनसे अधिक प्रतिभाशाली होते हैं?

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    उमा भारती के गुरु

    उमा भारती के गुरु

    उमा भारती डॉ. स्वामी को अपना राजनीतिक गुरु मानती हैं। उनके मुताबिक, डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी भारतीय राजनीति के सर्वाधिक बुद्दिमान नेता हैं जिन्हें अर्थनीति की गहरी समझ है। भाजपा की मौजूदा राजनीति में नरेन्द्र मोदी को सिर्फ मोदी के नाम से बुलाने वाले डॉ. स्वामी अकेले नेता हैं। उन्होंने नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए पूरे देश में प्रचार किया था। इसके बावजूद नरेन्द्र मोदी उनसे दूरी बना कर रहते हैं। ऐसा नहीं है कि डॉ. स्वामी, यशवंत सिन्हा की तरह मोदी के कट्टर आलोचक हैं। वे आज भी नरेन्द्र मोदी को भाजपा का केन्द्रबिन्दु मानते हैं। लेकिन वे मोदी के अंधसमर्थक नहीं हैं। वे मोदी सरकार की गलत नीतियों पर बेधड़क बोलते हैं।

    “मैं शाह-मोदी के खांचे में फिट नहीं”

    “मैं शाह-मोदी के खांचे में फिट नहीं”

    2019 के लोकसभा चुनाव के बाद उन्होंने बीबीसी को दिये एक लंबे इंटरव्यू में कहा था, जेटली हों या नरेन्द्र मोदी, इन्हें इकनॉमिक्स की समझ नहीं है.... मैं मोदी-शाह के राजनीतिक खांचे में फिट नहीं बैठता... मेरा अलग नजरिया है... मैं भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ता रहूंगा... अगर मैं मंत्री बन गया तो मैं अपने दल के भ्रष्ट लोगों को भी नहीं छोड़ूंगा... ये मुझे मंत्री बनाएं या न बनाएं, कोई फर्क नहीं पड़ता... जब समय आएगा तो मुझे कोई नहीं रोक पाएगा। बीबीसी ने उनसे पूछा, आप मोदी सरकार का आंकलन कैसे करेंगे ? तब डॉ. स्वामी ने कहा, कहने के लिए कई बाते हैं लेकिन ये तो सही है कि इस सरकार ने देश की सुरक्षा के लिए मुंहतोड़ जवाब दिया। सीमा की रक्षा के लिए साहसिक फैसले लिये। सबसे बड़ी बात यह कि इस सरकार के किसी मंत्री पर भ्रष्टाचार का कोई प्रमाणिक आरोप नहीं लगा। यानी डॉ. स्वामी नरेन्द्र मोदी के खिलाफ नहीं बल्कि सरकार की कमियों और खूबियों पर बोलते हैं। लेकिन दिक्कत ये है कि सच बोलने वाले को कितने लोग पसंद करते हैं ?

    कितने विद्वान नेता हैं डॉ. स्वामी ?

    कितने विद्वान नेता हैं डॉ. स्वामी ?

    डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी 81 साल के हैं। लेकिन आज भी उनके काम करने की ऊर्जा बरकरार है। उनका जन्म तमिलनाडु में हुआ। उनके पिता भारतीय सांख्यिकी सेवा के अधिकारी थे। सुब्रमण्याम स्वामी बचपन से कुशाग्र बुद्धि के रहे हैं। उन्होंने दिल्ली के हिंदू कॉलेज से मैथेमेटिक्स में ऑनर्स किया। फिर इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टीट्यूट से मास्टर डिग्री हासिल की। पोस्टग्रेजुएशन के बाद उन्हें अमेरिका के प्रसिद्ध हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ने के लिए रॉकफेलर स्कॉलरशिप मिली। 1964 में वे हार्वर्ड से इकोनॉमिक्स में पीएचडी करने लगे। पीएचडी में उनके गाइड थे साइमन कुजनेट्स। साइमन को इकनॉमिक्स में विशिष्ट योगदान के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। सुब्रमण्यम स्वामी ने साइमन कुजनेट्स और पॉल सैमुअल्सन के साथ मिल कर कई आर्थिक विषयों पर कई शोध किये थे। उनकी प्रतिभा देख कर अमेरिकी प्रोफेसर दंग थे। पीएचडी पूरा होने में अभी एक साल बाकी था फिर भी सुब्रमण्यम स्वामी को हार्वर्ड में असिस्टेंट प्रोफेसर बना दिया गया। उस समय उनकी उम्र सिर्फ 27 साल थी। हार्वर्ड में पढ़ते हुए पढ़ाना बड़े गौरव की बात थी। अमेरिका में उनकी प्रतिभा का डंका बजने लगा। 1969 में ही वे एसोसिएट प्रोफेसर बन गये। अगर वे हार्वर्ड में पढ़ाते रह गये होते तो वे भी नोबेल प्राइज विजेता बने होते।

    इंदिरा गांधी का भी किया था विरोध

    इंदिरा गांधी का भी किया था विरोध

    अर्थशास्त्र में नोबेल पुरस्कार जीतने वाले आमर्त्य सेन तब दिल्ली स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में थे। इस संस्थान को चीनी अर्थव्यवस्था को पढ़ाने के लिए एक योग्य शिक्षक की जरूरत थी। डॉ. स्वामी को उस समय दुनिया में चीनी अर्थव्यवस्था का सबसे बड़ा जानकार माना जाता था। अमर्त्य सेन ने डॉ. स्वामी को बुलावा भेजा। वे अमेरिका छोड़ कर भारत आ गये। लेकिन रीडर पद दिये जाने से खफा हो कर उन्होंने नौकरी छोड़ दी। फिर दिल्ली आईआईटी में गणीतीय अर्थशास्त्र पढ़ाने लगे। तात्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की आर्थिक नीतियों को चुनौती देने के कारण उन्हें 1970 में आइआइटी दिल्ली की नौकरी से निकाल दिया गया। डॉ. स्वामी इस अन्याय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गये। 21 साल बाद कोर्ट ने फैसला सुनाया। डॉ. स्वामी जीत गये। जीतने के बाद वे एक दिन के लिए आइआईआटी दिल्ली गये। जॉब ज्वाइन किया। अगले दिन ही इस्तीफा दे दिया।

    कैसे आये राजनीति में ?

    कैसे आये राजनीति में ?

    जनसंघ के बड़े नेता नानजी देशमुख के कहने पर डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी राजनीति में आये थे। नानाजी देशमुख के सुझाव पर जनसंघ ने उन्हें 1974 में राज्यसभा में भेजा था। कहा जाता है कि उनके पढ़ाये हुए कई छात्र नौकरशाही का हिस्सा थे। इसलिए उन्हें सरकार की कई खुफिया बातें मालूम रहती थीं। जयप्रकाश नारायण भी डॉ. स्वामी की प्रतिभा के प्रशंसक थे। जिस दिन (25 जून 1975) आपातकाल लगा उससे एक दिन पहले वे जेपी के साथ रात का खाना खा रहे थे। तब उन्होंने जेपी को बताया था आपातकाल लगने का अंदेशा है। लेकिन जेपी को विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने कहा, इंदिरा गांधी ऐसी आत्मघाती गलती कभी नहीं करेंगी। लेकिन 4.30 बजे सुबह ही उन्हें पता चल गया कि देश में आपातकाल लग गया है।

    इमरजेंसी के हीरो रहे डॉ. स्वामी

    इमरजेंसी के हीरो रहे डॉ. स्वामी

    डॉ. स्वामी ने आपातकाल के खिलाफ लोगों में हिम्मत जगाने के लिए एक बड़ा जोखिम उठाया था। उन्होंने संसद में घुस कर इमजेंसी का विरोध किया था। वे राज्यसभा के सदस्य थे। अगस्त 1976 में उन्होंने एक दिन सिख का वेष बनाया। सुरक्षाकर्मियों से बचते-बचाते वे राज्यसभा में दाखिल हो गये। उस समय राज्यसभा के तत्कालीन सभापति बीडी जत्ती दिवगंत सांसदों को श्रद्धांजलि दे रहे थे। जब उन्होंने शोकप्रस्ताव पूरा कर लिया तो डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी अपनी सीट से उठे और जोर से चिल्ला कर कहा, महोदय आपने दिवंगत लोगों में भारतीय जनतंत्र का नाम तो लिया ही नहीं। फिर तो सदन में हंगामा मच गया। डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी तेज कदमों से सदन के बाहर निकल गये। सुरक्षाकर्मियों को झांसा दे कर उन्होंने संसद परिसर को भी पार कर लिया। पुलिस उन्हें पकड़ नहीं पायी। फिर वे अमेरिका जा कर दोबारा हार्वर्ड में पढ़ाने लगे। इस घटना के बाद भारत के आम लोगों में भरोसा पैदा हुआ कि इमरजेंसी का विरोध किया जा सकता है। वे आपातकाल के हीरो थे। जयप्रकाश नारायण भी यही मानते थे।

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