जब नवाब ने मुहर्रम के दिन होली मनाई

अवध गंगा-जमुनी तहज़ीब का घर है. यहां होली का पर्व नवाबों के समय से ही मनाया जाता है. जब लखनऊ के हिंदू-मुसलमान मुहर्रम और होली में शरीक होते थे तो उन्होंने साझा संस्कृति की नींव रखी थी.

होली
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लखनऊ की होली के बारे में मैं आपको क्या बताऊँ! बस इतना समझ लें कि यह यहां त्योहार से बढ़कर है. ये भारत का बहुसांस्कृतिक मुकुट है. लखनऊ के नवाबों को यहाँ की सांस्कृतिक और धार्मिक सद्भाव के अग्रदूत होने का श्रेय दिया जाता है.

भारत का सबसे उल्लासपूर्ण और रंगीन त्योहार होली बसंत के आगमन का प्रतीक माना जाता है. इसे पूरे जोशो-ख़रोश के साथ मार्च महीने में फाल्गुन पूर्णिमा के दिन देशभर में मनाया जाता है, पर उत्तर प्रदेश में इसकी रंगीनी कुछ अलग ही होती है.

अवध गंगा-जमुनी तहज़ीब का घर है. यहां होली का पर्व नवाबों के समय से ही मनाया जाता है. जब लखनऊ के हिंदू-मुसलमान मुहर्रम और होली में शरीक होते थे तो उन्होंने साझा संस्कृति की नींव रखी थी.

गुलाल गोटे मार होलीः मारो तो फूटे हंसी का फव्वारा

बुरा मान लो होली है....जोगीरा सा रा रा रा

उर्दू शायरी में होली

लखनऊ की उर्दू शायरी में भी होली साफ़ झलकती है. लखनऊ के कई मुसलमान कवियों ने नवाबों के होली खेलने को बेहतरीन अंदाज़ में बयां किया है.

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जब मशहूर शायर मीर दिल्ली से लखनऊ आए, तो उन्होंने तत्कालीन नवाब आसफ़उद्दौला को होली इतने उत्साह से मनाते देखा कि उन्होंने इस पर एक कविता ही रच दी.

होली खेले असफउद्दौला वज़ीर, रंग सोबत अजब हैं ख़ुरदोपीरकुमकुमे जो मारकर भरकर गुलाल, जिसके लगता आकर फिर मेहंदी लाल

नवाब सादात अली ख़ान के होली समारोह का वर्णन भी अद्भुत है.

बुरा न मानो होली है

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संग होली में हुज़ूर अपने जो लावे हैं हर रात कन्हैया भएं और सर पे धर लेवें मुकुट

अवध के आख़िरी नवाब वाज़िद अली शाह भी होली खेलने के बेहद शौक़ीन थे. वह न केवल उत्साह से होली खेलते, बल्कि उन्होंने होली पर कई कविताएं भी रची थीं.

होली
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मोरे कन्हैया जो आए पलट के, अबके होली मैं खेलूँगी डटके , उनके पीछे मैं चुपके से जाके, रंग दूंगी उन्हें भी लिपटके

गंगा-जमुनी तहज़ीब

गंगा-जमुनी तहज़ीब के शहर लखनऊ में होली मनाने की कुछ यही भावना थी.

एक दिलचस्प क़िस्सा अवध के लोगों के बीच भाईचारे का बंधन दर्शाता है. नवाब वाज़िद अली शाह के शासन के दौरान ऐसा हुआ कि संयोग से होली और मुहर्रम एक ही दिन पड़ गए.

होली हर्षोल्लास का मौक़ा है, जबकि मुहर्रम मातम का दिन. लखनऊ अवध की राजधानी थी. वहां हिंदुओं ने मुसलमानों की भावनाओं की क़द्र करते हुए उस साल होली न मनाने का फ़ैसला किया.

मुहर्रम के मातम के बाद नवाब वाज़िद अली शाह ने पूछा कि शहर में होली क्यों नहीं मनाई जा रही. उन्हें जब वजह बताई गई, तो वाज़िद अली शाह ने कहा कि चूंकि हिंदुओं ने मुसलमानों की भावनाओं का सम्मान किया इसलिए अब ये मुसलमानों का फ़र्ज़ है कि वो हिंदुओं की भावनाओं का सम्मान करें.

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ये कहने के साथ ही उन्होंने घोषणा की कि पूरे अवध में उसी दिन होली भी मनेगी और वह ख़ुद होली खेलने वालों में सबसे पहले शामिल हुए.

ज़ायकों की खुशबू

ऐसी घटनाएं दिखाती हैं कि त्योहारों के ज़रिए देश रिश्तों में बंधता है और रसोई से निकली अलग-अलग क़िस्म के ज़ायकों की ख़ुशबू उन्हें साथ लाती है. फिर चाहे वह बच्चे का जन्म हो या 100 साल की उम्र में मौत, शादी के 50 साल पूरे होना हो या रमज़ान का महीना, सभी त्योहार और उत्सव जोश के साथ मनाए जाते हैं.

इन त्योहारों की अलग संस्कृति, धर्म और पहचान हैं और ये भारत की प्राचीन परंपराओं का चेहरा और आवाज़ हैं.

इन त्योहारों में देश के कई चेहरे, इसके जीवंत रंग और लोगों की रचनात्मकता दिखती है. त्योहार रोज़मर्रा की ज़िंदगी की नीरसता तोड़ते हैं.

होली मौज करने और विभिन्न पकवानों का स्वाद लेने का त्योहार है. ठंडाई से भांग तक पीने का पर्व. होली में दूसरे ज़ायकेदार पकवानों के अलावा गुजिया और मालपुआ सर्वाधिक लोकप्रिय हैं.

पापड़ी और दही वड़ा, भांग के वड़े, कांजी वड़ा और ठंडाई ख़ासकर होली के मौक़े पर तैयार होते हैं.

गुलाल के रंग में सब माफ़ होता है. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि बिना गुजिया के होली कैसी?

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