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चंद्रशेखर आज़ाद जब भगत सिंह की जगह ख़ुद सेंट्रल असेंबली में फेंकना चाहते थे बम

चन्द्रशेखर आज़ाद के कभी न हार मानने के जज़्बे, बहादुरी, साफ़-सुथरे चरित्र और उनकी असीम देशभक्ति ने उन्हें अपने ज़माने का सबसे लोकप्रिय क्रांतिकारी बना दिया था. हाल ही में बाबू कृष्णमूर्ति ने आज़ाद की जीवनी लिखी है- 'आज़ाद द इनविंसिबल'. विवेचना में रेहान फ़ज़ल नज़र डाल रहे हैं चंद्रशेखर आज़ाद के रोमांचक जीवन पर.

By BBC News हिन्दी
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चंद्रशेखर आज़ाद
Raj Kamal
चंद्रशेखर आज़ाद

चंद्रशेखर आज़ाद 1922 में एचआरए (हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी) के सदस्य बन गए थे. इससे पहले वर्ष 1921 में वो असहयोग आंदोलन के दौरान पकड़ लिए गए थे.

मजिस्ट्रेट ने 15 साल के बच्चे से पूछा था - तुम्हारा नाम?

उनका जवाब था- 'आज़ाद.' तुम्हारे पिता का नाम?- 'आज़ादी.' तुम्हारा पता?- 'जेल.'

इन जवाबों से खीजकर उस अंग्रेज़ मजिस्ट्रेट ने चंद्रशेखर आज़ाद को 15 बेंत लगाने की सज़ा दी थी.

जब आज़ाद को एक खंभे से बाँध कर बेंत लगाए जाने लगे तो वो हर बेंत पर चिल्लाकर कहते थे 'भारत माता की जय.'

बेंत की सज़ा खाने के बाद आज़ाद को जेल से रिहा कर दिया गया. जाते समय उन्हें तीन आने पैसे दिए गए जिसे उन्होंने बड़े तैश में जेलर के मुँह पर दे मारा.

साल 1925 का अंत होते-होते काकोरी कांड के करीब-करीब सभी अभियुक्त पकड़ लिए गए थे सिवाए कुंदन लाल और चंद्रशेखर आज़ाद के.

उन दिनों उनके साथी उनका नाम लेने के बजाए उन्हें नंबर 1 और नंबर 2 कहकर पुकारते थे. उस ज़माने में आज़ाद बहुत फ़ख़्र से कहते थे, "मेरे जीतेजी कोई मुझे पकड़ नहीं पाएगा."

वो कहा करते थे-

दुश्मन की गोलियों का सामना करेंगे

आज़ाद ही रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे

चंद्रशेखर की किशोरावस्था की तस्वीर
Unistar
चंद्रशेखर की किशोरावस्था की तस्वीर

काकोरी ट्रेन डकैती में शामिल थे चंद्रशेखर आज़ाद

काकोरी ट्रेन डकैती के लिए बिस्मिल ने अपनी मदद के लिए 9 क्रांतिकारियों को चुना था, राजेंद्र लाहिरी, ठाकुर रोशन सिंह, सचींद्र बक्शी, अशफ़ाकउल्ला ख़ाँ, मुकुंदी लाल, मन्मथनाथ गुप्त, मुरारी शर्मा, बनवारी लाल और चंद्रशेखर आज़ाद.

लूट के बाद आज़ाद को गठरी मे बंधी लूट की रक़म को लखनऊ पहुंचाने की ज़िम्मेदारी दी गई थी.

काकोरी स्टेशन की एक पुरानी तस्वीर
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काकोरी स्टेशन की एक पुरानी तस्वीर

उस दिन को याद करते हुए मन्मथनाथ गुप्त ने अपनी किताब 'आधी रात के अतिथि' में लिखा था, "गोमती नदी के किनारे घंटों चलते हुए हम लखनऊ शहर में दाख़िल हुए थे. हम सबसे पहले चौक पहुंचे थे जहाँ कुख्यात रेड लाइट इलाके में कुछ लोग अब भी जगे हुए थे जबकि पूरा शहर सो रहा था. चौक पहुंचने से पहले आज़ाद ने रुपयों की गठरी राम प्रसाद बिस्मिल के हवाले कर दी थी. मुझे और आज़ाद को लखनऊ शहर की कोई ख़ास जानकारी नहीं थी. हमें ये भी अंदाज़ा नहीं था कि हमें कहाँ जाना चाहिए."

"आज़ाद ने हमें सलाह दी क्यों न हम एक पार्क में सो जाएं. उस ज़माने में बेघर लोग अक्सर पार्क में ही सो जाया करते थे. हमने एक पेड़ के नीचे थोड़ी बहुत नींद लेने की कोशिश की. ठंड में हम लोग कांप रहे थे. जैसे ही भोर हुई चिड़ियाँ चहचहाने लगीं और लोग मंदिरों में जाने लगे. हम लोग भी जाग गए. हम जैसे ही पार्क से बाहर निकले, हमें एक अख़बार बेचने वाले की आवाज़ सुनाई दी, 'काकोरी में ट्रेन डकैती.' हमने एक दूसरे की तरफ़ देखा. पार्क में हमारे सोने के दौरान काकोरी में हुई ट्रेन डकैती की ख़बर चारों ओर फैल चुकी थी."

चंद्रशेखर आज़ाद के साथी मन्मथनाथ गुप्त
Rajkamal Prakashan
चंद्रशेखर आज़ाद के साथी मन्मथनाथ गुप्त

लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लेने की योजना

कानपुर से छपने वाले अख़बार 'प्रताप' ने जिसका संपादन गणेश शंकर विद्यार्थी कर रहे थे, क्रांतिकारियों की तारीफ़ करते हुए सुर्ख़ी लगाई थी, "भारत के नौ रत्न गिरफ़्तार."

लेकिन इन गिरफ़्तार लोगों में चंद्रशेखर आज़ाद नहीं थे. आज़ाद पुलिस की नज़रों से बचते हुए बनारस पहुंच चुके थे. वो पुलिस के साथ लुका-छिपी का खेल खेल रहे थे.

पुलिस हाथ धोकर उनके पीछे पड़ी थी लेकिन वो हर बार पुलिस को चकमा देने में कामयाब हो जाते थे.

गणेश शंकर विद्यार्थी
Shyam Sundar Lal
गणेश शंकर विद्यार्थी

काकोरी केस में बड़े क्रांतिकारियों की गिरफ़्तारी के बाद संगठन चलाने की ज़िम्मेदारी आज़ाद जैसे जूनियर क्रांतिकारियों पर आ गई थी.

जब साइमन कमीशन का विरोध कर रहे लाला लाजपत राय पुलिस की लाठी से मारे गए तो क्रांतिकारियों ने उनकी मौत का बदला लेने की योजना बनाई.

नाराज़ भगत सिंह ने कहा, "हमारे आदरणीय नेता लालाजी का पुलिस की लाठी से मारा जाना देश की बेइज़्ज़ती है. हमें इस अपमान का बदला लेना होगा. हमें पूरी दुनिया को दिखाना होगा कि हम भारतीय क्रांतिकारियों का अस्तित्व हैं और हम इस अमानवीय कृत्य का बदला लेंगे."

योजना बनी कि भगत सिंह लाला लाजपत राय पर लाठी चलवाने वाले साउंडर्स पर गोली चलाएंगे. राजगुरु स्टैंड बाई में रहेंगे और भगत सिंह को कवर देंगे. अगर हमले के बाद कोई इनका पीछा करता है तो पंडितजी उर्फ़ चंद्रशेखर आज़ाद उससे निपटेंगे.

लाला लाजपत राय
Punjab State Archive
लाला लाजपत राय

चंद्रशेखर आज़ाद ने चानन सिंह पर चलाई गोली

जैसे ही साउंडर्स अपने हेड कॉन्स्टेबिल चानन सिंह के साथ अपनी मोटरसाइकिल के पास पहुंचा राजगुरु ने चीते की तरह उछलकर उसके सीने पर फ़ायर कर दिया. अगले ही क्षण भगत सिंह एक पेड़ के पीछे से कूदे और उन्होंने एक के बाद एक छह गोलियाँ साउंडर्स के शरीर में उतार दीं. साउंडर्स की उसी समय मौत हो गई.

भगत सिंह और राजगुरु दौड़ने लगे. उन्हें पकड़ने के लिए इंस्पेक्टर फ़र्न दौड़ा. राजगुरु ने उस पर फ़ायर करने की कोशिश की लेकिन उनकी पिस्टल का घोड़ा अटक गया. जैसे ही फ़र्न ने उन्हें पकड़ने की कोशिश की तो राजगुरु ने उन्हें इतनी ज़ोर से लात मारी कि वो दूर जा गिरा.

राजगुरु की याद में जारी किया गया एक डाक टिकट
Indian Postal Department
राजगुरु की याद में जारी किया गया एक डाक टिकट

राजगुरु और भगत सिंह कॉलेज की तरफ़ दौड़ रहे थे. उनके पीछे हेड कॉन्स्टेबिल चानन सिंह दौड़ रहा था.

करीब 50 गज़ की दूरी से आज़ाद ये सब नज़ारा देख रहे थे. चानन सिंह भगत सिंह को पकड़ने ही वाले थे.

बाबू कृष्णमूर्ति चंद्रशेखर आज़ाद की जीवनी 'आज़ाद द इनविंसिबिल' में लिखते हैं, "तभी पीछे से आज़ाद की आवाज़ गूँजी, 'रुको.' चानन सिंह ने भागते हुए पीछे मुड़ कर देखा. आज़ाद ने चिल्ला कर कहा, 'रुको, इनका पीछा करना छोड़ दो."

चानन सिंह ने आज़ाद की बात नहीं मानी और भगत सिंह का पीछा करना जारी रखा. जब चानन सिंह ने तीसरी बार आज़ाद की चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया तो आज़ाद ने फ़ायर किया. गोली लगते ही चानन सिंह नीचे गिर गया.

आज़ाद भी वहाँ से उठे और ग़ायब हो गए. कुछ दूरी पर साइकिलें उनका इंतेज़ार कर रही थीं. भगत सिंह ने साइकिल चलाई. राजगुरु आगे उस साइकिल के डंडे पर बैठे. वो तेज़ी से नाभा हाउस की ओर पहुंचे. वहाँ उन्होंने अपनी साइकिलें फेंकीं और तीनों वहाँ इंतज़ार कर रही कार पर सवार हो गए.

अगले दिन लाहौर की दीवारों पर हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के पोस्टर चिपके मिले जिन पर लिखा था, "साउंडर्स को मार कर हमने अपने प्यारे नेता लाला लाजपत राय की मौत का बदला ले लिया."

सांडर्स को मारने के बाद जारी किया गया इश्तेहार
Chaman Lal
सांडर्स को मारने के बाद जारी किया गया इश्तेहार

सेंट्रल असेंबली में भगत सिंह की जगह खुद बम फेंकना चाहते थे आज़ाद

इसके बाद क्रांतिकारियों ने तय किया कि वो सेंट्रल असेंबली में बम फेंकेगे. आज़ाद ये काम खुद करना चाहते थे लेकिन इसके लिए उनका कोई साथी तैयार नहीं हुआ.

इसके बाद भगत सिंह ने ये ज़िम्मेदारी उठाने की पेशकश की. चंद्रशेखर आज़ाद इसके सख़्त ख़िलाफ़ थे.

बाद में सेंट्रल कमेटी की बैठक में भगत सिंह ने ये काम करने के लिए सबको मना लिया.

इस काम में उनका साथ देने के लिए बटुकेश्वर दत्त को चुना गया.

भगत सिंह - बटुकेश्वर दत्त
Chaman Lal
भगत सिंह - बटुकेश्वर दत्त

बाबू कृष्ममूर्ति लिखते हैं, "जिस दिन भगत सिंह को असेंबली में बम फेंकना था, आज़ाद, भगवती चरण, सुखदेव और वैशम्पायन भी असेंबली के अंदर पहुंच गए. जैसे ही प्रश्नकाल शुरू हुआ, आज़ाद खड़े हो गए. भगत सिंह और दत्त ने उनकी तरफ़ देखा."

आज़ाद ने हाथ के इशारे से उनसे विदा ली और संकेत दिया कि वो अपना काम जारी रखें. जैसे ही जॉर्ज शूस्टर ने खड़े होकर बिल के बारे में बोलना शुरू किया, भगत सिंह ने बम फेंका.

बम की ज़ोरदार आवाज़ और गहरे धुएं के बीच भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने नारा लगाया, 'इंकलाब ज़िदाबाद, एचएसआरए ज़िदाबाद.' उन्होंने पर्चे फेंकने शुरू कर दिए. पूरी असेंबली में भगदड़ मच गई.

"सिर्फ़ तीन लोग अपनी जगह पर शांत बैठे थे, विट्ठलभाई पटेल, मोतीलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना. चंद्रशेखर उसी दिन दिल्ली से झाँसी के लिए रवाना हो गए."

चंद्रशेखर आज़ाद पर आधारित एक किताब
Garud
चंद्रशेखर आज़ाद पर आधारित एक किताब

भेष बदलने में माहिर आज़ाद

चंद्रशेखर आज़ाद का दूसरा नाम तिवारी चंद्रशेखर शर्मा भी था. उनका शरीर गठा हुआ था जिसे भीड़ में भी पहचाना जा सकता था. उनके गोल चेहरे पर चेचक के दाग थे.

उनकी बड़ी भावपूर्ण आँखें थीं जिन्हें देख कर कोई कह नहीं सकता था कि ये किसी क्रांतिकारी की आँखें हैं. उनकी आँखें किसी कवि और संत की तरह शांत और दिलासा देने वाली थीं.

बलिष्ठ शरीर वाले चंद्रशेखर आज़ाद की माँसपेशियाँ बहुत मज़बूत थीं. उनके हाथ लोहे जैसे मज़बूत थे. वो दिन में सैकड़ों दंड बैठकें करते थे. वो नाटे क़द के थे. उनका क़द था 5 फ़िट 6 इंच. उनकी मूँछे दोनों तरफ़ से ऊपर की तरफ़ मुड़ी रहती थीं.

चंद्रशेखर आज़ाद
SUNIL RAI/BBC
चंद्रशेखर आज़ाद

शिव वर्मा अपनी किताब 'रेमिनिसेंसेज़ ऑफ़ द फ़ेलो रिवोल्यूशनरीज़' में लिखते हैं, "चंद्रशेखर समय के अनुसार कई तरह के कपड़े पहनते थे. कभी कभी जब वो धोती कमीज़ और बंडी धारण करते थे तो लोग उन्हें उत्तर भारत का अमीर व्यापारी समझते थे."

कभी-कभी वो कुली का भेष धारण करते थे. तब वो अपने सिर पर लाल कपड़ा बांधते थे और फटे-पुराने कपड़े पहनते थे जिसमें से पसीने की बू आती थी. उनकी दाहिनी बाँह में पीतल का बिल्ला इतना वास्तविक लगता था कि कई बार लोग उनसे अपना सामान उठाने के लिए कहते थे.

"कभी-कभी वो कलफ़ लगी हुई कमीज़, शॉर्ट्स, फेल्ट हैट और बूट पहनते थे. उस समय कई पुलिस वाले उन्हें पुलिस अफ़सर समझ कर सेल्यूट करते थे. जब वो केसरिया वस्त्र पहनकर अपने माथे पर भभूत लगाते थे तो लोग उन्हें संन्यासी समझ कर उनके पैरों पर गिर पड़ते थे."

क्रांतिकारियों पर आधारित एक किताब
Unistar
क्रांतिकारियों पर आधारित एक किताब

हमेशा ज़मीन पर अख़बार बिछा कर सोते थे आज़ाद

लेकिन अपने जीवन के आख़िरी समय में आज़ाद अक्सर धोती और कुर्ता ही पहना करते थे लेकिन कुर्ते के ऊपर वो जैकेट ज़रूर पहनते थे ताकि वो उसके अंदर आसानी से अपनी पिस्तौल छिपा सकें.

मशहूर क्रांतिकारी दुर्गा देवी लिखती हैं, "आज़ाद कभी भी बिस्तर पर नहीं सोते थे. वो आमतौर से ज़मीन पर पुराने अख़बार बिछाकर उसी पर सो जाया करते थे. वो बहुत कम खाना खाते थे. उनकी रोज़ की ख़ुराक थी सिर्फ़ दो फुल्के और गुड़ के दो टुकड़े. अगर वो भी उन्हें नसीब नहीं होती थी तो वो एक आने का भुना हुआ चना खरीद कर खा लेते थे."

"लेकिन जब उन्हें आराम से खाने का मौका मिलता था तो वो अच्छे भोजन का आनंद भी लेते थे. उनको खिचड़ी बहुत पसंद थी. आज़ाद का निर्देश था कि सभी क्रांतिकारी अपना खाना खुद बनाएं. इसके लिए उन्हें चार आने का दैनिक भत्ता मिलता था."

"आज़ाद पेड़ों पर चढ़ने में बहुत निपुण थे. उनको अपने शरीर पर तेल से मालिश करवाना बहुत पसंद था. वो खुद भी बहुत अच्छी मालिश करते थे. नहाने से पहले वो अपने सिर की खुद मालिश किया करते थे."

जब बीच में रुकवाना पड़ा महात्मा गांधी का भाषण

दुर्गा देवी
Amrit Mahotsav
दुर्गा देवी

ज़बरदस्त निशानेबाज़ थे आज़ाद

चंद्रशेखर आज़ाद का निशाना ज़बरदस्त था. अपने बचपन में उन्होंने भील बच्चों के साथ तीर चलाने का काफ़ी अभ्यास किया था.

लेकिन क्रांतिकारी बनने के बाद उन्होंने तीर कमान की जगह पिस्टल और गोलियाँ रखना शुरू कर दिया था.

चंद्रशेखर के निशाने की तारीफ़ उनके विरोधियों ने भी की थी.

उनके समय में उत्तर प्रदेश के आईजी रहे हॉलिंस ने 'मेन ओनली' पत्रिका के अक्तूबर, 1958 के अंक में लिखा था, "आज़ाद की पहली ही गोली नॉट बावर के कंधे में लगी थी. पुलिस इंस्पेक्टर विशेश्वर सिंह आज़ाद पर गोली चलाने के फेर में एक पेड़ के पीछे छिपे हुए थे."

"तब तक आज़ाद को दो या तीन गोलियाँ लग चुकी थीं लेकिन तब भी उन्होंने विशेश्वर के सिर का निशाना लगाया और वो गोली निशाने पर लगी. उस गोली ने विशेश्वर का जबड़ा तोड़ दिया. ये आज़ाद के जीवन की आखिरी लेकिन सबसे बड़ी लड़ाई थी."

हॉलिंस आगे लिखते हैं, "आज़ाद इतने अच्छे निशानेबाज़ थे कि उनकी चलाई हुई हर गोली सामने के पेड़ पर एक आदमी की औसत ऊँचाई की दूरी पर लगी थी. दूसरी तरफ़ नॉट बावर और विशेश्वर सिंह की गोलियाँ 10-12 फ़ीट की ऊँचाई पर लगी थीं. मैंने आज़ाद से अच्छा निशानेबाज़ अपनी ज़िंदगी में नहीं देखा."

इससे प्रतीत होता था कि आज़ाद का अंतिम समय तक मानसिक संतुलन कितना ठीक था जब कि पुलिस वाले अंधाधुँध गोलियाँ चला रहे थे.

चंद्रशेखर आज़ाद
Sunil Rai/BBC
चंद्रशेखर आज़ाद

पुलिस ने पुरुषोत्तम दास टंडन को शव सौंपने से किया इनकार

आज़ाद के मरने के बाद भी नॉट बावर की हिम्मत नहीं हुई कि वो उनके पास जाएं.

उसने अपने एक सिपाही को आदेश दिया कि ये देखने के लिए कि आज़ाद जीवित तो नहीं हैं, उनके पैरों पर फ़ायर करो. तब तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्र अल्फ़्रेड पार्क के आसपास इकट्ठा होने शुरू हो गए थे.

दो मजिस्ट्रेटों ख़ास साहब रहमान बख़्श और ठाकुर महेंद्रपाल सिंह के सामने चंद्रशेखर आज़ाद के पार्थिव शरीर का निरीक्षण किया गया.

आठ लोगों ने उनके पार्थिव शरीर को उठाकर एक गाड़ी में रखा.

लेफ़्टिनेंट कर्नल टाउनसेंड और उनके दो साथियों डॉक्टर गेड और डॉक्टर राधेमोहन लाल ने आज़ाद के शव का पोस्टमॉर्टम किया.

आज़ाद के शरीर का पोस्टमार्टम सिविल सर्जन लेफ़्टिनेंट कर्नल टाउनसेंड ने किया था
Rajkamal Prakashan
आज़ाद के शरीर का पोस्टमार्टम सिविल सर्जन लेफ़्टिनेंट कर्नल टाउनसेंड ने किया था

आजाद की जेब में 448 रुपये पाए गए. जैसे ही राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन को इसका पता चला उन्होंने पुलिस से अनुरोध किया कि उनके शव को उनके हवाले कर दिया जाए, लेकिन पुलिस ने उनके इस अनुरोध को ठुकरा दिया.

जब तक बनारस से आए आज़ाद के संबंधी शिव विनायक मिश्र रसूलाबाद घाट पहुंचते चंद्रशेखर आज़ाद का शव आधा जल चुका था. उन्होंने दोबारा आज़ाद की चिता को मुखाग्नि दी.

इस बीच कमला नेहरू अपनी 13 वर्ष की बेटी इंदिरा नेहरू और पुरषोत्तम दास टंडन के साथ वहाँ पहुंच गईं.

विश्वनाथ वैशम्पायन अपनी किताब 'अमर शहीद चंद्रशेखर आज़ाद' में लिखते हैं, "आज़ाद की अस्थियों का जुलूस खद्रर भंडार से निकाला गया. लकड़ी के तख़्त पर एक काली चादर बिछाई गई. जुलूस शहर में घूमता पुरुषोत्तम दास पार्क पहुंचा."

"अस्थियों पर शहर में जहाँ तहाँ फूल बरसाए गए. उस दिन पूरे शहर में हड़ताल रही. टंडन पार्क की सभा को अन्य लोगों के अलावा शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी ने संबोधित किया. आज़ाद की अस्थियों में से एक आचार्य नरेंद्र देव अपने साथ ले गए."

चंद्रशेखर आज़ाद पर आधारित एक किताब
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चंद्रशेखर आज़ाद पर आधारित एक किताब

रातों-रात पेड़ को जड़ से कटवाया गया

अल्फ़्रेड पार्क में जिस पेड़ के पीछे आज़ाद की मृत्यु हुई थी, आम लोगों ने कई जगह आज़ाद लिख दिया था.

वहाँ की मिट्टी भी लोग उठा कर ले गए थे. उस स्थान पर रोज़ लोगों की भीड़ लगने लगी. लोग वहाँ फूल मालाएं चढ़ाने और दीपक जलाकर आरती करने लगे.

इसलिए एक दिन अंग्रेज़ों ने रातों-रात उस पेड़ को जड़ से काट कर उसका नामोनिशान मिटा दिया और ज़मीन बराबर कर दी थी. काटे हुए पेड़ को एक सैनिक लॉरी में लाद कर दूसरे स्थान पर फेंक दिया गया.

अक्तूबर, 1939 में उसी जगह पर बाबा राघवदास ने एक और जामुन के पेड़ को लगाया.

वो पेड़ आज भी वहाँ मौजूद है.

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English summary
When Chandrashekhar Azad himself wanted to throw a bomb in the Central Assembly
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