SC के फैसले से SC/ST स्पेशल कोटे की बहस खुली, जानिए, कोटा के अंदर कोटा की पूरी पड़ताल
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से आरक्षण कोटे के अंदर कोटे को लेकर चल रही बहस एक बार फिर से तेज हो गई है। सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने मामला सात सदस्यीय पीठ को सौंप दिया है। हालांकि वर्तमान में कोर्ट ने राज्यों को मंजूरी दे दी है लेकिन अंतिम फैसला सात सदस्यीय पीठ का ही माना जाएगा।
दरअसल 2005 में सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने फैसला सुनाया था कि एससी/एसटी आरक्षण में उपवर्गीकरण का अधिकार राज्यों को नहीं है। इसके खिलाफ कई राज्य सुप्रीम कोर्ट में गए थे। चूंकि वर्तमान पीठ भी पांच सदस्यीय थी इसलिए पुरानी पांच सदस्यीय पीठ के फैसले को पलट नहीं सकती थी। इसके लिए अब चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय पीठ मामले की सुनवाई करके फैसला देगी।
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राज्यों का ये है कहना
एससी/एसटी को आरक्षण का फायदा मिल रहा है या नहीं ये जानने के लिए सरकारें मूल्यांकन करती रहती हैं। कई रिपोर्टों में ये पाया गया कि आरक्षण होने के बावजूद अनुसूचित जाति में शामिल कई जातियां शिक्षा या नौकरी के मामले में उसी वर्ग की दूसरी जातियों के मुकाबले बहुत पीछे हैं। अनुसूचित जातियों के भीतर फैली इस गैरबराबरी को दूर करने के लिए कोटे के अंदर कोटे का प्रावधान बनाने के बारे में सोचा गया है।
कई राज्यों जैसे पंजाब, तमिलनाडु और बिहार में दलितों की सबसे कमजोर जातियों के लिए विशेष कोटा शुरू किया गया। बिहार में नीतीश सरकार ने महादलित आयोग का गठन किया जिसके तहत दलितों में जो सबसे कमजोर दलित जातियां हैं उन्हें अलग करके विशेष प्रावधान किए जाएं।

सुप्रीम कोर्ट ने 2005 में सुनाया था ये फैसला
तमिलनाडु में एससी कोटे के भीतर 3 प्रतिशत कोटा अरुंधतिअर जाति को दिया जाता है। राज्य में एससी आबादी का 16 प्रतिशत होने के बावजूद इस जाति का नौकरियों में हिस्सा केवल 0.5 प्रतिशत है। 2000 में आंध्र प्रदेश सरकार ने अनुसूचित जातियों की 57 समूहों को वर्गीकृत करते हुए कानून पारित किया था जिसके तहत इन जातियों को आबादी के अनुपात में 15 प्रतिशत एससी कोटे का बंटवारा किया था।
2005 में सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून पर ये कहते हुए रोक लगा दी थी कि राज्यों के पास एससी और एसटी की प्रेसीडेंशियल लिस्ट से छेड़छाड़ करने का अधिकार नहीं है। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने ये फैसला सुनाया है।

क्या है प्रेसीडेंशियल लिस्ट ?
संविधान में एससी और एसटी को विशेष उपचार देने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। अनुच्छेद 341 के अनुसार, राष्ट्रपति के पास अनुसूचित जातियों और जनजातियों को अधिसूचित करने का अधिकार है। ये जातियां अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग भी हो सकती हैं। यानि एक राज्य में जो जाति एससी के रूप में अधिसूचित है वही दूसरे राज्य में एससी नहीं भी हो सकती है। ये अलग-अलग राज्यों में विवादों को रोकने के लिए बनाई गई हैं। यदि किसी राज्य को किसी जाति को अनुसूचित जाति में शामिल कराना होता है तो उसे राष्ट्रपति के पास प्रस्ताव भेजा जाता है। राष्ट्रपति केंद्र की सलाह पर इस पर फैसला करते हैं। केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की 2018-19 की रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में देश में 1263 एससी जातियां हैं।
2005 के ईवी चिनैय्या बनाम आंध्र प्रदेश और अन्य राज्यों के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनुसूचित जाति के रूप में किसी जाति को शामिल करने या इस सूची से बाहर करने की शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास है। राज्यों के पास ऐसा अधिकार नहीं है। कोर्ट ने सभी अनुसूचित जातियों को एकल सजातीय समूह माना था।












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