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वन नेशन-वन पोल के लिए नरेंद्र मोदी सरकार को क्या करना होगा?

नई दिल्ली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने पिछले कार्यकाल से ही 'वन नेशन-वन पोल' की बात पूरी गंभीरता से सबके सामने रखते रहे हैं। मौजूदा कार्यकाल शुरू होने से 20 दिनों के भीतर ही उन्होंने सभी दलों के प्रमुखों को इस मुद्दे पर विचार करने के लिए बुलाया, इसी से पता चलता है कि वह इस मसले पर कितने संजीदा हैं। वैसे यह चिंता की बात है कि कुछ दलों ने विषय की आत्मा को समझे बिना ही उसे नकार दिया है। लेकिन, राहत की बात है कि आधे से ज्यादा दलों ने इस मामले पर डिबेट को जरूरी समझा है। सरकार से अलग कुछ गैर-एनडीए दलों ने इसका समर्थन भी किया है। लेकिन, सवाल उठता है कि अगर किसी तरह से पीएम मोदी 'वन नेशन-वन पोल' पर अधिकतर दलों के बीच सहमति बनाने में कामयाब हो जाते हैं, तो क्या इसपर अमल करना इतना आसान होगा? क्योंकि, इसके लिए सिर्फ सहमति ही नहीं, संविधान में कई संशोधन भी करने पड़ेंगे।

सरकार की ओर से आम राय बनाने का प्रयास जारी

सरकार की ओर से आम राय बनाने का प्रयास जारी

कांग्रेस, एनसीपी, टीएमसी या लेफ्ट ने भले ही 'वन नेशन-वन पोल' के विचार को नकार दिया हो, लेकिन इसके पक्ष आम राय बनाने का प्रयास खत्म नहीं हुआ है। कांग्रेस के तो अंदर से ही इसपर विचार करने की आवाज बुलंद हो उठी है। मुंबई कांग्रेस के अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा ने इस पर बहस से भागने वालों की जमकर खिंचाई की है। उन्होंने विधानसभा और लोकसभा चुनाव साथ कराने को लेकर जो कथित भ्रम फैला हुआ है, उसे दूर करने के लिए हाल में लोकसभा के साथ संपन्न हुए तीन विधानसभा चुनाव नतीजों का बेहतरीन हवाला भी दिया है। दरअसल, उनकी नाराजगी गलत भी नहीं है। क्योंकि, 1967 से पहले यही चलन भी रहा है और विधि आयोग भी इसकी सिफारिशें करता रहा है। सरकार भी समझाने की कोशिश कर रही है कि यह उसका एजेंडा नहीं है, बल्कि यह देशहित में है।

विचार नया नहीं है, नई पहल हो रही है

विचार नया नहीं है, नई पहल हो रही है

इतिहास पर नजर डालें तो 1951-52, 1957, 1962 और 1967 तक आम चुनाव और विधानसभा के चुनाव साथ कराए जाते रहे। लेकिन, 1968 और 1969 में कुछ राज्य विधानसभा भंग होने और 1970 में लोकसभा को भी समय से पहले भंग कर दिए जाने के कारण यह सिलसिला टूट गया था। 1999 में जस्टिस जीवन रेड्डी के अगुवाई वाले विधि आयोग ने भी एक साथ चुनाव कराने की सिफारिश की थी। 2015 में राज्यसभा ने भी विधि आयोग की सिफारिशों से सहमति जताई थी। उस दौरान एक विचार सामने आया था कि 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ आधे राज्यों के चुनाव करा लिए जाएं और बाकी राज्यों के 2021 के अंत में करा लिए जाएं।

पांच संविधान संशोधन करने पड़ेंगे

पांच संविधान संशोधन करने पड़ेंगे

अगर मोदी सरकार किसी तरह ज्यादातर राजनीतिक दलों को इस विषय पर सहमत कर भी ले, तो भी 'वन नेशन-वन पोल' के विचार को अमलीजामा पहनाना इतना आसान नहीं रहेगा। मौजूदा परिस्थितियों में इसके लिए संविधान में 5 संशोधन करने जरूरी होंगे। मसलन, संविधान के आर्टिकल- 83, 85, 172, 174 और 356 में संशोधन करना पड़ेगा। आर्टिकल 83 संसद के सदनों के कार्यकाल से संबंधित है। फिलहाल इसे संबंधित सदन की बैठकों से तय किया जाता है। इसे बदलकर एक तारीख तय करनी पड़ेगी। आर्टिकल-85 में राष्ट्रपति को लोकसभा और आर्टिकल-174 में राज्यपाल को विधानसभा भंग करने का अधिकार है। एक साथ चुनाव कराने के लिए या तो कई राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल बढ़ाना होगा या फिर घटना पड़ेगा। इसके लिए आर्टिकल- 172 में संशोधन की जरूरत होगी। जबकि, आर्टिकल-356 में राज्यों में राष्ट्रपति शाषन लगाने की व्यवस्था है। यानी इसकी प्रक्रिया पूरी करने के लिए संसद के अलावा राज्यों की विधानसभाओं की भी रजामंदी की आवश्यकता होगी।

एकसाथ चुनाव के लिए बढ़ाना होगा इंफ्रास्ट्रक्चर

एकसाथ चुनाव के लिए बढ़ाना होगा इंफ्रास्ट्रक्चर

चुनाव आयोग के लिए भी 'वन नेशन-वन पोल' को संभव बनाना आसान नहीं है। एक अनुमान के मुताबिक अगर चुनाव आयोग को यह चुनौती मिली तो उसे इकट्ठे 28 लाख बैलेटिंग यूनिट और 24 लाख कंट्रोल यूनिट का इंतजाम करना होगा। यही नहीं पूरे देश में एक साथ लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव कराने के लिए उसे 40 लाख वर्कफोर्स की भी आवश्यकता पड़ेगी। यानी किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले इस सब बातों को ध्यान में रखना जरूरी होगा, लेकिन फिलहाल प्रधानमंत्री मोदी के सामने उन राजनीतिक दलों को सहमत करने की चुनौती है, जो विषय की गंभीरता को समझे बिना ही इसपर चर्चा करने से भी कन्नी काट रहे हैं।

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