गलवान में दिखा चीनी झंडा, भारत-चीन संबंधों पर क्या होगा असर
कांग्रेस पार्टी के नेता राहुल गांधी ने गलवान घाटी में कथित रूप से चीनी झंडा फहराए जाने की ख़बर आने के बाद पीएम नरेंद्र मोदी को आड़े हाथों लिया.
राहुल गांधी ने ट्वीट करके लिखा, "अभी कुछ दिनों पहले हम 1971 में भारत की गौरवपूर्ण जीत को याद कर रहे थे. देश की सुरक्षा और विजय के लिए सूझ-बूझ व मज़बूत फ़ैसलों की ज़रूरत होती है. खोखले जुमलों से जीत नहीं मिलती!"
https://twitter.com/RahulGandhi/status/1476852786121916416
इस मुद्दे पर अब तक विदेश मंत्रालय की ओर से किसी तरह की प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है.
हालांकि, कुछ दिन पहले चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश के हिस्सों के नए नाम रखने के बाद केंद्र सरकार की ओर से टिप्पणी की गई थी.
इसी बीच चीनी मीडिया की ओर से नसीहत दी गई है कि सीमा पर जारी गतिरोध ख़त्म करने के लिए भारत को द्विपक्षीय संबंधों को पटरी पर लाना होगा.
ऐसे में सवाल उठता है कि गलवान घाटी पर भारत और चीनी सैनिकों के बीच संघर्ष होने के डेढ़ साल बाद गलवान घाटी में कथित रूप से चीनी झंडा फहराए जाने के बाद दोनों देशों के संबंध क्या आकार लेंगे.
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बीबीसी ने चीन और भारत के बीच रिश्तों की गहराइयों को समझने वाले विशेषज्ञों एवं जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर स्वर्ण सिंह एवं प्रोफ़ेसर अल्का आचार्य से बात की.
जेएनयू प्रोफेसर स्वर्ण सिंह का नज़रिया
दोनों देशों की ओर से और ख़ासकर चीन की ओर से सांकेतिक नज़रिए से कभी-कभी कुछ अच्छी पहल होती है. लेकिन असल में उसका कोई मतलब नहीं होता है.
इतिहास में जाएं तो चीन हमेशा से परोक्ष रूप से आधिपत्य जमाने के लिए जाना जाता रहा है. वह दो क़दम आगे बढ़ाकर एक क़दम पीछे लेने की नीति पर काम करता है. उसका अपने पड़ोसी देशों के साथ यही रवैया रहा है. इसका सबसे मज़बूत उदाहरण दक्षिण चीन सागर है जहां चीन ने धीमे-धीमे अपनी जगह बनाई है.
लेकिन अगर भारत और चीन संबंधों की बात करें तो चीन के लिए भारत अकेला एक ऐसा पड़ोसी देश है जो कि एक बड़ा देश है और जिसकी सेना बेहद सक्षम है.
चीन ने ये देखा है कि यहां ज़ोर-ज़बर्दस्ती से आधिपत्य जमाना संभव नहीं है. ऐसे में उनकी रणनीति ये है कि सीमावर्ती इलाकों में बड़े साज़ो-सामान के साथ भारी संख्या में सैनिकों की तैनाती बनाए रखे. ये एक-दूसरे को एक तरह से थकाने की कोशिश है.
दोनों देशों के कोर कमांडर्स के बीच अब तक 13 दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं. इनमें शुरुआत में चीन की ओर से सकारात्मक रुख नज़र आया था क्योंकि अगस्त 2020 में भारतीय सेना ने दक्षिण पैंगोंग झील में प्रीएंपटिव एडवांस किया था. इससे चीन के माल्दो स्थित अग्रिम मुख्यालय को ख़तरा था क्योंकि वह सीधे निशाने पर आ जाता था. ऐसे में चीन को ज़रूरत थी कि वह सकारात्मक माहौल बनाए और वहां से दक्षिण और उत्तर पैंगोंग झील से दोनों तरफ़ से सेनाओं को पीछे हटाया गया. इसके बाद से चीन को लगता नहीं है कि वह कहीं से अपने आपको कमज़ोर पाता है.
अब चीन की कोशिश ये है कि वह लंबे समय तक सीमा पर भारी सैन्य साज़ो-सामान और भारी संख्या में सैनिकों की तैनाती कर सके. इसका सबसे दिलचस्प संकेत चीन में पारित किए गए हालिया क़ानून में मिलता है जिसमें उन्होंने सीमावर्ती गाँवों में हर तरह की सुविधाएं मुहैया कराने का प्रावधान रखा है.
चीन इन सीमावर्ती गाँवों को आदर्श गाँव बनाने की बात कहते हुए इनमें रेल और सड़कों से लेकर यातायात के सभी साधन उपलब्ध कराने के साथ-साथ दूसरी सहूलियतें उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहा है.
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ये सब इस नज़रिए से किया जा रहा है कि इन अग्रिम इलाकों में चीनी सेना पीएलए और पुलिस पीएपी तैनात हैं और इन्हें इन इलाकों में देर तक बने रहने के लिए सहायता और सहूलियतें मिल सकें, क्योंकि इन दोनों बलों में आम चीनी नागरिक शामिल होते हैं जिन्हें इन इलाकों की ज़्यादा जानकारी नहीं होती है. इतनी ठंड और ऊंचाई पर उन्हें बनाए रखना थोड़ा मुश्किल होता है. ऐसे में भविष्य में इन गाँवों से जोड़ने का और इन इलाकों से भर्ती किए जाने की योजना है ताकि इस इलाके में तैनाती बनाकर रखी जा सके.
चीन नहीं चाहता है कि गलवान जैसी घटना एक बार फिर हो क्योंकि पूरी दुनिया का नज़रिया चीन के प्रति पहले से ही शंका वाला है. अगर भारत के विरोध में किसी तरह के जानमाल का नुक़सान हो जाता है तो उस घटना की वजह से पूरी दुनिया भारत के साथ जुड़ेगी क्योंकि पहले भी दुनिया भारत के साथ खड़ी हुई है.
ऐसे में चीन एक-दूसरे को थकाने की रणनीति पर काम कर रहा है. सर्दियां शुरू होने से पहले कोई उम्मीद की जा सकती थी, लेकिन अब सर्दियों में भी एक लाख लोग दोनों तरफ से तैनात हैं.
अगर भारत की बात करें तो वो भी अपने स्तर पर ढांचा खड़ा कर रहा है. चीन के तमाम पड़ोसी देशों जिनमें रूस, जापान और दक्षिण पूर्व एशिया के तमाम देश शामिल हैं, उनमें से सिर्फ़ भारत ही चीन के ख़िलाफ़ खड़ा होने की क्षमता रखता है.
भारत ने ये दिखा दिया है कि अगर आप देर तक खड़े रह सकते हैं, पचास हज़ार सैनिक तैनात करना चाहते हैं तो भारत भी पचास हज़ार सैनिक तैनात कर सकता है.
ऐसे में यही कहा जा सकता है कि फ़िलहाल दोनों देशों के बीच संबंधों में किसी तरह के सुधार होने के संकेत नज़र नहीं आ रहे हैं क्योंकि चीन, भारत और अमेरिकी रिश्तों में आती प्रगाढ़ता को लेकर काफ़ी आशंकित रहता है. हालांकि भारत, रूस और अमेरिका के साथ रिश्ते बनाकर बहुपक्षीय रिश्तों की दिशा में बढ़ने की कोशिश करता है. लेकिन चीन समझता है कि भारत का रुझान किस तरफ़ है.
प्रोफ़ेसर अलका आचार्य का नज़रिया
फ़िलहाल दोनों देशों के बीच सीमा विवाद को लेकर बातचीत रुक-सी गई है. मुझे नहीं लगता है कि चीन की मंशा ये है कि वह जिन स्थानों पर पहुंच गया है, उन्हें खाली कर दे. ऐसे में यही कहा जा सकता है कि इस मुद्दे पर तो गतिरोध आ गया है.
दूसरी तरफ़ हम देख रहे हैं कि चीन की ओर से दबाव बढ़ता जा रहा है. कुछ वाकये हाल ही में हुए हैं जब अरुणाचल प्रदेश में कुछ स्थानों को उन्होंने चीनी नाम दे दिया और भारतीय सांसद को पत्र लिखा गया जिसमें ये आपत्ति जताई गयी कि वे तिब्बत के एक कार्यक्रम में क्यों शामिल हुए.
ऐसे में चीन लगातार दबाव बढ़ा रहा है. जब वांग यी और एस जयशंकर की मुलाक़ात भी हुई थी तो उसमें भी बार-बार यही दोहराया गया कि सीमा विवाद को एक तरफ़ रखा जाए और आपसी रिश्तों को सामान्य बनाया जाए.
इसे लेकर दोनों पक्षों के बीच एक मत नहीं है और अब इतना स्पष्ट हो गया है कि जब तक दोनों ओर से सबसे उच्च स्तर पर गतिरोध ख़त्म करने को लेकर पहल नहीं होगी तब तक ऐसा होना मुश्किल है. ये एक राजनीतिक पहल ही हो सकती है.
हम देख रहे हैं कि रूस ने तीनों देशों के बीच बातचीत कराने के लिए पहल की है. लेकिन इस बीच भारत ने अमेरिका की ओर सीधा-सीधा झुकाव दिखा दिया है, उसे लेकर चीन में काफ़ी आशंकाएं हो रही हैं. क्वाड तो था ही, अब ऑकस को लेकर भी बातचीत सुनने में आ रही है.
ऐसे में अब चीन की ओर से भारत को दबाव में लाने की कोशिश की जा रही है कि रिश्तों को सामान्य बनाने की ओर ले जाएं, नहीं तो हमारे पास आप पर दबाव डालने के बहुत तरीक़े हैं.
लेकिन हमें ये समझना होगा कि अगर चुनाव वाले वर्ष में चीन की ओर से और भी ज़्यादा दबाव डाला गया तो भारत में मोदी सरकार, जो कि ख़ुद को एक मज़बूत सरकार के रूप में पेश करती है, उसे कुछ ऐसे क़दम उठाने पड़ेंगे जिससे वह ये दिखा सके कि वह चीन से डरते नहीं हैं और उसका मुक़ाबला कर सकते हैं.
ये बात स्पष्ट है कि चीनी अब भारतीय क्षेत्र में बैठे हुए हैं. अगर उन्होंने इसमें और आगे कुछ क़दम बढ़ाए तो ये मोदी सरकार के लिए बहुत समस्याजनक हो जाएगा क्योंकि वो डेढ़ साल में ये बात तय नहीं कर पाए हैं कि चीन जिस जगह पर बैठ गया है, उससे उसे हटना चाहिए.
अगर वो इससे ज़्यादा क़दम बढ़ाते हैं तो संसद में इस पर हंगामा होगा. ऐसे में एक राजनीतिक समाधान निकालना होगा ताकि स्थिति को बद से बदतर होने से रोका जा सके.
अगर मान लीजिए कि भारत सरकार की ओर से किसी तरह की रियायत देने की पहल की जाती है, आर्थिक क्षेत्र में या किसी तीसरी जगह पर सहयोग की बात करें तो उसे एक झुकाव की तरह नहीं देखा जाएगा.
एक तरह से ये कहना होगा कि हमारे बीच सीमा को लेकर मतभेद हैं लेकिन हम साथ-साथ काम भी कर सकते हैं और एक-दूसरे के हितों की रक्षा भी कर सकते हैं.
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