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जिस लड़की को सेक्स की चाहत नहीं उसे कैसा परिवार चाहिए?

By सिंधुवासिनी

संध्या बंसल
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संध्या बंसल

हंसती-खिलखिलाती और स्टाइलिश कपड़े पहनी संध्या जब अपनी उम्र 40 साल बताती हैं तो पहली बार में यक़ीन नहीं होता.

"आप तो बमुश्किल 30 की लगती हैं! 40 तो दूर-दूर तक नहीं. इसका सीक्रेट क्या है?"

"सीक्रेट है- नो बॉयफ़्रेंड, नो हस्बैंड, नो फ़ैमिली और नो टेंशन." संध्या हंसते हुए ही इसका जवाब देती हैं.

संध्या बंसल एक नामी कंपनी में मार्केटिंग प्रोफ़ेशनल हैं और दिल्ली-एनसीआर में किराए के एक फ़्लैट में अकेले रहती हैं.

अकेले इसलिए क्योंकि वो एसेक्शुल हैं. उन्होंने शादी नहीं की है और परिवार को लेकर उनके ख़यालात काफ़ी अलग हैं.

एसेक्शुअल उन लोगों को कहा जाता है तो आम तौर किसी व्यक्ति (पुरुष या महिला) के लिए यौन आकर्षण महसूस नहीं करते. ये एक तरह का यौन रुझान (सेक्शुअल ओरिएंटेशन) है.

'पहचान हमेशा परिवार से ऊपर'

संध्या नहीं चाहतीं कि उनकी अपनी पहचान, परिवार के पारंपरिक ढांचे में गुम हो जाए.

वो ये नहीं मानतीं कि एक ख़ुशहाल परिवार में पति-पत्नी और बच्चों का होना ज़रूरी है. वो कहती हैं कि परिवार के लिए हर व्यक्ति की अपनी अलग परिभाषा हो सकती है.

संध्या याद करती हैं, "23-24 साल की उम्र में मुझे लगने लगा कि मेरे साथ कुछ तो अलग है. तब मेरी हमउम्र लड़कियों के बॉयफ़्रेंड बनने लगे थे, वो लड़कों को डेट कर रही थी और रिलेशनशिप में जा रही थीं लेकिन मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हो रहा था."

संध्या बंसल
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ऐसा भी नहीं था कि संध्या को लड़के बिल्कुल अच्छे नहीं लगते थे.

वो बताती हैं, "उस वक़्त एक लड़का मुझे काफ़ी पसंद था. मुझे उसका साथ बहुत अच्छा लगता था. साथ रहते-रहते उसकी उम्मीदें बढ़ने लगीं और ये सामान्य भी था. मगर जैसे ही बात सेक्स के करीब पहुंची मैं एकदम से असहज हो गई. मुझे ऐसा लगा कि मेरा शरीर ये सब स्वीकार ही नहीं कर सकता. जैसे मुझे सेक्स की ज़रूरत ही नहीं थी."

ऐसा नहीं था कि संध्या के मन में सेक्स को लेकर कोई डर था. ऐसा भी नहीं था कि सेक्स के बिना वो अपनी ज़िंदगी में कोई कमी महसूस करती थीं.

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संध्या बंसल
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कैसे पहचानी अपनी सेक्शुअलिटी?

वो बताती हैं, "मैं रिश्तों में रोमैंटिक झुकाव तो रखती थी लेकिन मुझमें किसी के लिए ज़रा सा भी यौन आकर्षण (सेक्शुअल अट्रैक्शन) महसूस नहीं करती थी. जिस लड़के से मुझे प्यार था, उसका हाथ पकड़कर चलना मुझे बहुत पसंद था. उसे गले लगाना, उसके साथ वक़्त बिताना...ये सब मुझे अच्छा लगता था लेकिन सेक्स के वक़्त मुझे दिक़्कत महसूस होने लगती थी. मेरा शरीर ही रिस्पॉन्ड करना बंद कर देता था."

संध्या के साथ ऐसे अनुभव कई बार हुए. हर बार रिश्ते के शारीरिक नज़दीकी तक पहुंचते ही वो पीछे हट जातीं. जब उन्होंने अपने दोस्तों से ये बातें शेयर कीं तो उन्होंने उन्हें डॉक्टर के पास जाने की सलाह दी.

हालांकि, संध्या ने डॉक्टर के पास जाने से पहले ख़ुद इस बारे में पढ़ना और समझना शुरू किया. इसके लिए उन्होंने इंटरनेट और सेक्शुअलिटी के बारे में जानकारी देने वाली अलग-अलग वेबसाइट्स का सहारा लिया.

वो सोशल मीडिया पर एसेक्शुअलिटी से सम्बन्धित कुछ ग्रुप्स से भी जुड़ीं.

संध्या कहती हैं, "शुरू में मुझे लगा था कि मेरे साथ कोई गंभीर समस्या है. अपने रिश्ते टूटने के लिए मैं ख़ुद को दोषी भी मानने लगी थी लेकिन जैसे-जैसे मैं एसेक्शुअलिटी के बारे में पढ़ने और समझने लगी, मैंने अपने-आप को स्वीकार करना शुरू कर दिया. धीरे-धीरे मुझे समझ में आ गया कि न तो मुझे कोई बीमारी है और न ही मैं असामान्य हूं. सोशल मीडिया के जरिए मेरी दूसरे एसेक्शुअल लोगों से भी जान-पहचान हुई. इस तरह मैं वक़्त के साथ अपने शरीर और अपनी सेक्शुअलिटी को लेकर पूरी तरह सहज हो गई."

क्या इसके बाद उन्होंने अपने लिए पार्टनर ढूंढने की कोशिश नहीं की?

इसके जवाब में संध्या कहती हैं, "अपने कई बार के अनुभवों से मैं समझ चुकी थी कि अगर मैं किसी पुरुष के साथ रिश्ते में आई तो एक वक़्त के बाद उसकी उम्मीदें बढ़ेंगी ही. इस बीच मैं अपनी एसेक्शुल आइडेंटिटी को लेकर काफ़ी संजीदा हो चुकी थी और किसी भी कीमत पर उससे समझौता करने के लिए तैयार नहीं थी. मुझे ये भी समझ में आ चुका था कि कोई एसेक्शुल लड़का ही मेरा पार्टनर बन सकता है. इसलिए मैंने किसी को डेट करना या पार्टनर ढूंढना ही बंद कर दिया."

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एसेक्शुअलिटी
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कैसा परिवार चाहती हैं संध्या?

लेकिन क्या एसेक्शुअल कम्युनिटी में उन्हें कोई नहीं मिला, जिसके साथ वो ज़िंदगी बिताने की सोचतीं?

इस बारे में संध्या कहती हैं कि उन्हें सोशल मीडिया पर तो कई लोग मिले लेकिन असल ज़िंदगी में कोई नहीं.

वो कहती हैं, "कई लोग एसेक्शुअल होते हैं लेकिन सही जानकारी न मिलने की वजह से ख़ुद को समझ नहीं पाते. कुछ लोग सामाजिक और पारिवारिक दबाव की वजह से सार्वजनिक तौर पर अपनी सेक्शुअलिटी ज़ाहिर नहीं कर पाते और अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं."

संध्या कहती हैं कि अगर एसेक्शुअल कम्युनिटी से कोई अच्छा लड़का मिलता है तो वो ज़रूर उसके बारे में सोचेंगी.

एक एसेक्शुअल महिला के तौर पर उनके लिए परिवार के क्या मायने हैं?

इसके जवाब में संध्या कहती हैं, "अभी तो मैं सिंगल हूं और जहां तक मुझे लगता है कि आने वाले वक़्त में भी मैं सिंगल ही रहूंगी. फ़िलहाल मेरे दोस्त, मेरी सहेलियां और मेरी बिल्डिंग में रहने वाली लड़कियां ही मेरा परिवार हैं. हम अलग-अलग कमरों में रहते हैं लेकिन हमारा एक कॉमन किचन है. हम मिलते हैं, बातें करते हैं और एक-दूसरे के दुख-सुख में साथ होते हैं. मेरे लिए यही फ़ैमिली है. मैं नहीं चाहती कि परिवार मुझ पर इस कदर हावी हो जाए कि मेरी अपनी पहचान ही बिखर जाए."

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संध्या बंसल
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'अकेले रहने में डर नहीं लगता'

संध्या को अगर उन्हें मनचाहा पार्टनर मिला तो वो उसके साथ भी रहना चाहेंगी लेकिन इस रिश्ते के भी अपने दायरे होंगे.

वो कहती हैं, "परिवार शब्द से मेरे ज़हन में जो तस्वीर उभरती है उसमें मैं और मेरे पार्टनर साथ तो होते हैं लेकिन हमारे पास अपना स्पेस भी होता है. मैं सोचती हूं कि हम एक घर में रहें लेकिन हमारे कमरे अलग-अलग हों. हमारा किचन एक हो जिसमें हम साथ मिलकर खाना बनाएं. हम भले अलग कमरों में रहें लेकिन जब हमें भावनात्मक तौर पर एक-दूसरे की ज़रूरत पड़े, हम साथ हों."

मां बनने और बच्चों के बारे में पूछे जाने संध्या साफ़ कहती हैं, "बच्चे मुझे दूसरों के ही अच्छे लगते हैं. अपना मैं अपना बच्चा नहीं चाहती और मुझे नहीं लगता कि बच्चे की चाहत न रखना किसी औरत को कमतर बनाता है."

वो कहती हैं, "लोग मुझसे अक्सर पूछते हैं कि अकेले रहोगी, बच्चे नहीं होंगे तो बुढ़ापे में तुम्हारी देखभाल कौन करेगा? मेरा सीधा सा सवाल है: क्या सभी बुजुर्ग लोगों के बच्चे उनकी देखभाल कर रहे हैं? मैं अपने बुढ़ापे के लिए सेविंग कर रही हूं, इन्वेस्ट कर रही हूं. मुझे पता है कि मैं अकेली हूं और मुझे अपना ख़याल ख़ुद ही रखना है इसलिए मैं अपनी सेहत और फ़िटनेस का पूरा ध्यान रखती हूं. मैं अच्छा खाना खाती हूं, योगा करती हूं और कोई भी फ़ैसला अच्छी तरह सोच-समझ के ही लेती हूं."

संध्या के परिवार और रिश्तेदारों की ओर से शादी का दबाव भी लगातार बनाया जाता है लेकिन उन्होंने साफ़गोई से सबको मना कर दिया.

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'शादी न करने से कुछ नहीं बिगड़ेगा'

वो बताती हैं, "मेरी छोटी बहन की भी शादी हो गई है इसलिए शादी का दबाव और ज़्यादा है लेकिन मैंने अब लोगों की नसीहतों और तानों को सुनना बंद कर दिया है. मैं अकेले रहती हूं और पूरी तरह आत्मनिर्भर हूं. मैं अकेले लंच और डिनर के लिए जाती हूं, अकेले शॉपिंग जाती हूं...यहां तक कि बीमार होने पर भी कई बार डॉक्टर के पास अकेले ही जाती हूं. मुझे नहीं लगता कि शादी ज़िंदगी की सबसे बड़ी ज़रूरत है. मेरे हिसाब से ज़िंदगी की सबसे बड़ी ज़रूरते हैं अपनी मर्ज़ी से ज़िंदगी जीने की आज़ादी और मानसिक शांति."

उनके ऑफ़िस और बाहरी दुनिया में लोगों का रवैया कैसा होता है?

इस बारे में संध्या बताती हैं, "लोगों को यक़ीन नहीं होता कि 40 साल की उम्र में मैं सिंगल हूं और किसी रिश्ते में भी नहीं हूं. उन्हें लगता है कि मैं झूठ बोल रही हूं. मेरे कई रिश्ते होंगे या फिर मुझे कोई बीमारी होगी. लोग मेरे बारे में अलग-अलग तरह की बातें करते हैं लेकिन मैं उन पर ध्यान नहीं देती. मेरे दोस्त बहुत अच्छे हैं मगर मेरे एसेक्शुअल होने को वो न तो समझ पाते हैं औ न स्वीकार कर पाते हैं. वो मेरे लिए फ़िक्रमंद हैं और अक्सर मुझे डॉक्टर के पास जाने की सलाह देते हैं लेकिन मैं डॉक्टर के पास नहीं जाऊंगी क्योंकि मुझे मालूम है कि मेरे साथ कोई समस्या नहीं है."

समाज में एक वर्ग ऐसा है जिसे लगता है कि अगर समलैंगिक, ट्रांस या एसेक्शुअल रिश्तों को मान्यता मिली तो परिवार का ढांचा बिगड़ जाएगा. इस पर संध्या कहती हैं, "बहुत ही आसान भाषा में समझाने की कोशिश करती हूं. किसी भी बगीचे में एक ही रंग के फूल नहीं होते. कई लाल रंग का होता है, कोई पीले और कोई जामुनी. इसीलिए वो बगीचा सुंदर लगता है. इसी तरह अलग-अलग लोगों की वजह से ही हमारी सृष्टि भी सुंदर है."

संध्या कहती हैं कि दुनिया की आबादी इतनी बड़ी है कि अगर कुछ लोग शादी करके पारंपरिक तरीके से घर नहीं बसाते और बच्चे नहीं पैदा करते तो भी कुछ बिगड़ेगा नहीं.

(तस्वीरें: शुभम कौल)

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English summary
What kind of family does a girl who does not want sex?
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