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नज़रिया: राष्ट्रपति कोविंद का 'जय श्रीराम' से क्या नाता?

By अपूर्वानंद - राजनीतिक विश्लेषक, बीबीस

रामनाथ कोविंद
Reuters
रामनाथ कोविंद

'जय श्री राम' -इस नारे से भारतीय जनता पार्टी के सांसदों ने नए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का स्वागत किया.

टेलीविज़न के सामने बैठे पत्रकार को वह रात याद आ गई जब हाथ में हथियार लिए एक झुण्ड ने उनकी गाड़ी घेर कर उसे 'जय श्री राम' का नारा लगाने को मजबूर किया.

अपने परिवार की जान बचाने को उन्होंने हाथ जोड़कर राम की महिमा का उद्घोष किया था. अपनी वो लाचारी और अपमान वह भूल नहीं सकते.

'जय श्री राम' यह नारा सुनते ही मुझे पटना का वह दिन याद आ गया जब लालकृष्ण आडवाणी की टोयोटा गाड़ी, जिसने रामरथ का स्वांग धरा था, गाँधी मैदान पहुँचने वाली थी.

पटना की सड़कों पर माथे पर केसरिया पट्टे बाँधे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके पोषित-पालित संगठनों के सदस्य हर आती-जाती गाड़ी पर लाठी बजाकर 'जय श्रीराम' का नारा लगाने को लोगों को मजबूर कर रहे थे.

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कोविंद के शपथग्रहण से पहले का नज़ारा
CHANDAN KHANNA/AFP/Getty Images
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'जय सियाराम' की जगह 'जय श्री राम'

'जय श्री राम' का नारा सुनकर गुजरात की ढ़ेर सारी औरतों की आँखों के आगे फिर वो हमलावर आ गए होंगे जिन्होंने कथित तौर पर इस नारे की आड़ में उनके साथ बलात्कार किया और वो औरतें मुसलमान हैं.

हम 'जय सियाराम' तो जानते थे, 'जय श्री राम' हमारी संस्कृति के लिए एक नया और अजनबी नारा था.

जैसे 'रामायण' धारावाहिक के पहले हमें नहीं मालूम था कि माँ को माताश्री और पिता को पिताश्री कहने से उनके आदर की रक्षा होती है.

'सियाराम मय सब जग जानी, करहूँ प्रनाम जोड़ी जुग पानी' राम के सबसे बड़े भक्त तुलसीदास ने गाया था.

कभी 'जय श्री राम' कहते हुए ना तो वाल्मीकि के हनुमान रावण की सेना पर टूट पड़ते हैं, ना तुलसी के हनुमान रावण की सुन्दर वाटिका का संहार करते हुए 'जय श्री राम' का नारा लगाते हैं.

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AFP/Getty Images)
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राष्ट्रपति का 'जय श्रीराम' से क्या नाता?

'खुदा हाफिज' की जगह 'अल्लाह हाफ़िज' का अभिवादन सुनकर हमें मुस्लिम कट्टरता की आहट तो सुनाई देती है, लेकिन 'जय सियाराम' या 'जय रामजी की' का स्थान कब 'जय श्री राम' ने ले लिया और इससे कौन सा हिंदू पैदा हुआ, इस पर सोचने की जहमत हमने नहीं उठाई.

नए राष्ट्रपति को सिंहासनारूढ़ होते देख उत्साह के अतिरेक में जिन्होंने 'जय श्रीराम' का उद्घोष किया, उन्होंने नई केंद्रीय कर व्यवस्था का क़ानून बनने का स्वागत इसी नारे से किया था.

'जय श्रीराम' इस प्रकार राम को नमन नहीं है, वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की परियोजना के इंच-इंचकर अपने मुकाम पर पहुँचते देख उल्लास का विस्फोट है.

यह राम के प्रताप के नहीं संघ के राजनीति और सांस्कृतिक दबदबे के बढ़ते जाने का ऐलान है. राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं. मर्यादा प्रत्येक अवसर और पद की होती है. राष्ट्रपति पद की शपथ के अवसर पर शांति की भव्यता का अपना सौंदर्य है.

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NARINDER NANU/AFP/Getty Images)
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गांधी और दीनदयाल का नाम एक साथ

राष्ट्रपति राष्ट्र की महिमा का रक्षक है. वह मितभाषी होगा और दृढ़ भी. वह लोकप्रियता का मोहताज नहीं. नारे इसीलिए उसके लिए नहीं ही सकते, उसे जनता को गोलबंद नहीं करना.

राष्ट्रपति ने खुद अपने वक्तव्य में संविधान की प्रतिबद्धताओं का स्मरण किया लेकिन एक ही साँस में वो गाँधी और दीनदयाल उपाध्याय के नाम भी ले गए.

यह युग्म असंभव है क्योंकि दीनदयाल उपाध्याय का राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बाहर कोई नामलेवा नहीं और गाँधी सार्वभौम हैं सिर्फ कांग्रेस के नहीं.

उपाध्याय का न तो राष्ट्र के स्वाधीनता में कोई योगदान है न उसके पश्चात उसे गढ़ने में. वे संघ के समर्पित सदस्य थे और मात्र उसके प्रसार के लिए उन्होंने काम किया. हर धोती-कुर्ता पहनने वाला गाँधी के बगल में जगह का अधिकारी नहीं.

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भूल गए नेहरू और नारायणन को

राष्ट्रपति कुछ भूल भी गए, मसलन जवाहरलाल नेहरू और केआर नारायणन का उल्लेख. यह तर्क नहीं चल सकता कि उनसे चूक हो गई, यह सुविधा राजनेता को मिल सकती है, राष्ट्रपति को नहीं.

यह विस्मरण स्वैच्छिक और उसी सांस्कृतिक परियोजना का अंग है जो नए तरीके से राष्ट्र की स्मृति गढ़ना चाहती है. उस स्मृतिलोक के लिए नेहरू असुविधाजनक उपस्थिति हैं.

नारायणन का विस्मरण इसलिए है कि संघ और भारतीय जनता पार्टी यह विश्वास दिलाना चाहती है कि उनके नेतृत्व में अनूठे काम हो रहे हैं जैसे एक दलित का राष्ट्रपति होना. नारायणन का नाम लेने पर उनका 'पहली बार' का दावा खंडित होता है.

ताज्जुब नहीं कि राष्ट्रपति के शपथग्रहण के बाद प्रधानमंत्री ने अपने दल के सांसदों को कहा कि नए राष्ट्रपति का पदग्रहण उस यात्रा में मील का पत्थर है जो श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने आरंभ की थी.

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नए प्रतीक बनाए और मनवाए जा रहे हैं

मुख़र्जी ने ही भारत का पहला मंत्रिमंडल छोड़कर जन संघ की स्थापना की थी जिसका नया अवतार भाजपा है. तो क्या नए राष्ट्रपति इसी यात्रा के ध्वजवाहक के रूप में देखे जा रहे हैं? कम से कम प्रधानमंत्री के भाषण से तो यही लगता है.

मर्यादाएँ तोड़ी जा रही हैं और नए प्रयोग किए जा रहे हैं. नए प्रतीक स्थापित किए जा रहे हैं. यह बात पुरानी है फिर भी याद रखने लायक कि राष्ट्र कोई प्राकृतिक वास्तविकता नहीं, वह दरअसल प्रतीकों के जरिए रोजाना ही गढ़ा जाता है.

आश्चर्य नहीं कि लंबे समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को न तिरंगा स्वीकार था, न राष्ट्रगान और न अशोक चक्र को. यह प्रतीकों का युद्ध था.

फिर इन प्रतीकों का जनतांत्रिक और मानवीय आशय जब धुंधला पड़ने लगा तब इनमें वह अर्थ भरना आसान हो गया जो धर्मनिरपेक्ष समावेशिता की जगह बहुसंख्यकवादी प्रभुत्व का है.

तिरंगा
EPA
तिरंगा

विध्वंसक बदलाव

तिरंगा कभी सुकून देता था, अब डराता है. फिर भगवा ध्वज की क्या ज़रूरत?

कभी 'जन गण मन' सुनते ही भीतर कुछ तरंगित हो जाता था, अब वह गला दबाकर गवाया जा रहा है. फिर 'नमस्ते सदा वत्सले मातृभूमि' की क्या आवश्यकता है?

इसका आभास बहुत कम को था कि 'जय सियाराम' के 'जय श्री राम' में बदल जाने में एक बड़े विध्वंसक बदलाव के संकेत हैं. अब हम उस बदलाव के ठीक बीचों-बीच हैं.

नए राष्ट्रपति का पद ग्रहण सचमुच मील का पत्थर है लेकिन यह एक ऐसा पत्थर है जो भारतीय राष्ट्र के गले में बाँध दिया गया है और जो उसे ले डूबेगा. फिर हमें गोताखोर खोजने होंगे.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

BBC Hindi
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English summary
What is the relation with President Kovind's 'Jai Shri Ram'.
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