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Guillotine का मतलब क्या है, संसद में इसका इस्तेमाल क्यों होता ? सबकुछ जानिए

बजट जैसे अहम विषय पर जब सदन में किसी व्यवधान की वजह से उसे पास कराने में दिक्कत होती है, तो गिलोटिन की प्रक्रिया अपनाई जाती है। इसमें बिना चर्चा के विधेयक पास हो जाता है।

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संसद में बजट सत्र का दूसरा हिस्सा बहुत ही हंगामेदार रहा है। कोई भी विधायी कार्य निपटना बहुत मुश्किल रहा है। लेकिन, वित्त वर्ष 2022-23 का अंत नजदीक आ गया है। इसलिए सरकार के लिए खासकर विभिन्न मंत्रालयों की अलग-अलग अनुदान मांगें और विनियोग विधेयक पास बहुत जरूरी हो गया था। क्योंकि, इसके बाद ही सरकार भारत की संचित निधि से धन निकाल सकती थी। संभावना के मुताबिक हंगामें के बीच ही यह सारे विधायी कार्य गिलोटिन बजट का इस्तेमाल करके पूरे कर लिए गए। महज 9 मिनट में सरकार को 45 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की अनुमति मिल गई।

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गिलोटिन मतलब क्या है ?
कैंब्रिज डिक्शनरी के मुताबिक गिलोटिन एक यंत्र है, जिसका आविष्कार फ्रांस में हुआ था। इसमें एक लंबे फ्रेम में एक धारदार ब्लेड फिट होता है, जिसका उपयोग अतीत में अपराधियों के सिर काटने के लिए किया जाता था। लेकिन, धीरे-धीरे कागज काटने वाले यंत्र के लिए भी गिलोटिन शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा। लेकिन, संसदीय प्रक्रिया में गिलोटिन शब्द का इस्तेमाल बहुत ही अलग और महत्वपूर्ण है, जिसका उपयोग लोकसभा में स्पीकर और विधानसभाओं में विधानसभा अध्यक्ष करते हैं।

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संसदीय प्रणाली में गिलोटिन का अर्थ
विधायी व्यवस्था में गिलोटिन प्रक्रिया का इस्तेमाल संसद या विधानसभाओं से आमतौर पर बजट प्रावधानों को तेजी से पास कराने के लिए किया जाता है। बजट सत्र के दौरान संसद में यह प्रक्रिया अक्सर अपनाई जाती रही है। दरअसल, इसे ऐसे समझ सकते हैं कि प्रत्येक विधेयकों पर विचार करने के लिए समय निर्धारित रहता है। प्रत्येक विधेयक में कई तरह के खंड होते हैं। जब आवंटित समय खत्म होने लगता है तो स्पीकर गिलोटिन का इस्तेमाल करते हैं। यह एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें बिना चर्चा के विभिन्न मंत्रालयों के मसौदे को एक करके वोटिंग के लिए सदन के पटल पर रख दिया जाता है और उसे पास करा लिया जाता है। जब स्पीकर एक बार गिलोटिन लगा देते हैं, सभी बकाया अनुदान मांगों पर एकबार में वोटिंग कराई जा सकती है, चाहे उसपर बहस पूरी हो पाई हो या नहीं।

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    सरकार के लिए बजट पास कराना जरूरी
    दरअसल, सरकार के लिए भारत की संचित निधि से धन खर्च करने के लिए लोकसभा से विनियोग विधेयक पास कराना आवश्यक होता है। सदन से पास होने के बाद यह विधेयक विनियोग कानून में तब्दील हो जाता है। इसपर मतदान के बाद ही वित्त विधेयक चर्चा के लिए लाया जाता है। वित्त विधेयक कर प्रावधानों से संबंधित होता है। जब इसपर सदन की मुहर लग जाती है तो वह वित्तीय कानून बन जाता है। इस तरह से विनियोग और वित्त विधेयक को मिलाकर बजट होता, जिसे निम्न सदन या लोकसभा से समय पर पास काराना अनिवार्य है।

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    ऐसे विधेयक पास नहीं हो पाने का मतलब ?
    सरकार के बहुमत में रहते अनुदान मांगों और विनियोग विधेयक पास नहीं होने का लगभग सवाल ही नहीं होता। क्योंकि, ऐसा होने पर यह सदन का अविश्वास हो सकता है और सरकार गिर सकती। इसलिए स्पीकर यदि गिलोटिन का इस्तेमाल करते हैं तो वह पास होना तय है। गुरुवार यानि 23 मार्च, 2023 को स्पीकर ओम बिड़ला ने यही तरीका अपनाया है। बता दें कि धन विधेयक के मामले में लोकसभा के पास विशेषाधिकार है और कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं इसका अंतिम फैसला स्पीकर के हाथों में होता है।

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    इन्हीं परिस्थितियों में होता है गिलोटिन का इस्तेमाल
    इस समय लोकसभा में गिलोटिन प्रक्रिया अपनाने की मजबूरी इसलिए थी, क्योंकि बजट सत्र का दूसरा हिस्सा पूरी तरह से हंगामें की भेंट चढ़ा है। 31 मार्च, 2023 को चालू वित्त वर्ष समाप्त होना है और फिर नया वित्त वर्ष शुरू होना है। यानि सरकार के पास अलग-अलग मंत्रालयों की अनुदान मांगों पर अलग-अलग बहस और फिर उसे पास कराने का समय नहीं बचा है। इसी तरह सरकार को संचित निधि से धन खर्च करने के लिए सदन से अनुमति लेना अनिवार्य था। यही वजह है कि हंगामा खत्म नहीं होता देख स्पीकर ओम बिड़ला ने गिलोटिन के प्रावधान का इस्तेमाल किया। इससे बजट को बिना चर्चा के पास कराने की अनुमति मिल गई।

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