भगवत् गीता को पढ़ाई से जोड़ कर गुजरात सरकार क्या हासिल करना चाहती है

भूपेंद्र पटेल
Bhupendr Patel/Facebook
भूपेंद्र पटेल

गुजरात सरकार ने नए शिक्षण सत्र से माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों के सिलेबस में भगवत् गीता को शामिल करने का निर्णय लिया है. जानकारों का मानना ​​है कि राज्य सरकार के इस फ़ैसले से आने वाले दिनों में विवाद खड़ा हो सकता है.

इस फ़ैसले के बाद केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने सुझाव दिया है कि गुजरात की तरह हर राज्य को स्कूलों में भगवत् गीता पढ़ाने पर विचार करना चाहिए.

उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया, "भगवत् गीता हमें नैतिकता सिखाती है. यह हमें समाज कल्याण के प्रति हमारे कर्तव्यों के बारे में बताती है. इसमें कई नैतिक कहानियां हैं, जो हमारे छात्रों को प्रेरित कर सकती हैं. हर राज्य सरकार को इस फ़ैसले के बारे में सोचना चाहिए.''

वहीं अब गुजरात सरकार के एलान के बाद कर्नाटक सरकार भी भगवत् गीता को स्कूली सिलेबस में शामिल करने पर विचार कर रही है.

इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, कर्नाटक के शिक्षा मंत्री बीसी नागेश ने कहा है कि इस मामले पर फ़िलहाल राज्य के मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई के साथ चर्चा की जा रही है.

इससे पहले गुजरात के शिक्षा मंत्री जीतू वाघानी ने राज्य विधानसभा में शिक्षा बजट पेश करते हुए गुरुवार को दो अहम घोषणाएं कीं.

पहली ये कि अंग्रेज़ी भाषा को अगले शिक्षण सत्र से पहली कक्षा से ही पढ़ाया जाएगा और दूसरी ये कि भगवत् गीता को अब छठी कक्षा से स्कूली सिलेबस का हिस्सा बनाया जाएगा.

भगवत् गीता
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भगवत् गीता

गुजरात सरकार के फ़ैसले के अनुसार, पाठ्यक्रम में गीता के श्लोकों और उनके पाठ को भी जगह दी जाएगी.

राज्य के शिक्षा सचिव विनोद राव ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों में चरणबद्ध तरीक़े से भगवत् गीता पढ़ाई जाएगी.

हालांकि उन्होंने बताया कि भगवत् गीता के लिए अलग से कोई विषय नहीं रखा जाएगा, बल्कि कई विषयों में इसके पाठ जोड़े जाएंगे.

वहीं जानकार आशंका जता रहे हैं कि सरकार के ताज़ा फ़ैसले का असर बच्चों के ज़हन पर पड़ेगा और धार्मिक भावनाओं को लेकर विवाद पैदा हो सकते हैं.

बच्चों पर क्या होगा प्रभाव

सरकार के ताज़ा फ़ैसले का बच्चों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर शिक्षाविद प्रफुल्ल गढ़वी ने बीबीसी से बातचीत की.

उन्होंने कहा, "बच्चों को गीता के श्लोक पढ़ाने में कुछ भी ग़लत नहीं है. पर इससे विवाद पैदा हो सकते हैं जिससे छात्रों की पढ़ाई पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है."

बच्चों पर पड़ने वाले दूसरे प्रभावों पर गढ़वी ने बताया कि ऐसा करने से दूसरे धर्मों के बच्चों में हीनभावना पनप सकती है.

गढ़वी के अनुसार, "इस विवाद से बच्चों में अपने धर्म को लेकर भ्रम की स्थिति भी पैदा हो सकती है. यदि बचपन में ही धार्मिकता के ऐसे बीज बोए जाएं तो हो सकता है कि वे भारतीय बनने के बजाय हिंदू, मुसलमान, ईसाई या जैन बनने के बारे में सोचना शुरू कर दें.''

नैतिकता की सीख

गुजरात का शिक्षा विभाग सिलेबस में भगवत् गीता को कैसे शामिल करेगा, इस पर राज्य के शिक्षा मंत्री जीतू वाघानी ने बीबीसी गुजराती से बातचीत की.

वाघानी ने कहा, "6 से 8 तक की कक्षाओं में भगवत् गीता की कहानियां पढ़ाई जाएंगी. 9 से 12 की कक्षाओं में गीता को पाठ्य पुस्तक के रूप में पढ़ाया जाएगा. स्कूलों में नाटक प्रतियोगिता, निबंध, श्लोक सुनाने की प्रतियोगिताएं आदि का भी आयोजन होगा.''

इस फ़ैसले के पीछे की वजह बताते हुए जीतू वाघानी ने कहा कि सोच ये है कि बच्चों में मूल्यों, भारतीय संस्कृति और 'नैतिकता' का विकास हो.

सरकार के इस फ़ैसले की राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने आलोचना की है.

पार्टी के प्रवक्ता हेमंग रावल ने बीबीसी गुजराती को बताया, "गीता को पाठ्यक्रम में शामिल करने में कुछ ग़लत नहीं है, लेकिन भाजपा बच्चों को नैतिकता सिखाने के नाम पर ठगने की कोशिश कर रही है."

वो बताते हैं कि, "भाजपा की सरकार आने से पहले जब हम पढ़ रहे थे तो हमें महाभारत और रामायण की कहानियां पढ़ाई जाती थीं जिससे नैतिक मूल्यों की शिक्षा मिलती थी. इसके अलावा, उस समय संस्कृत कक्षा आठ में अनिवार्य थी और केवल कक्षा 10 में यह वैकल्पिक विषय था."

उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा के सत्ता में आने के बाद इन सभी नैतिक कहानियों और साहित्य को हटा दिया गया.

शिक्षाविद हसमुख क्रिश्चियन ने सरकार पर आरोप लगाया है कि वो पिछले दरवाज़े से सिलेबस में धर्म को शामिल करने के लिए छात्रों पर प्रयोग कर रही है.

शिक्षा मंत्री जीतू वाघानी के बयान का हवाला देते हुए कहा, ''वो (शिक्षा मंत्री) सिलेबस में गीता को लाकर छात्रों को नैतिकता सिखाने की बात कर रहे हैं. तो क्या अब तक बच्चों को नैतिकता नहीं सिखाई गई?''

वो आगे कहते हैं, "क्या केवल भगवत् गीता में ही नैतिक सबक़ हैं, क़ुरान, बाइबिल या गुरु ग्रंथ साहिब में ये नहीं हैं?"

हसमुख भाई ने नैतिकता के नाम पर धर्म को शिक्षा में शामिल करने पर चिंता व्यक्त की है. उन्होंने कहा कि 'य​दि ऐसा ही चलता रहा तो धर्म के नाम पर हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को विकास नहीं विनाश के रास्ते पर ले जाएंगे.'

स्कूल
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स्कूल

क़ानूनी स्थिति

प्रफुल्ल गढ़वी के अनुसार, यदि धर्म प्रचार के इरादे से शिक्षा प्रणाली में केवल एक धर्म की शिक्षाओं को जोड़ा जाता है तो यह असंवैधानिक है.

उन्होंने आगे कहा, "यदि बच्चों को उनकी पढ़ाई में भगवत् गीता पढ़ाई जाती है, तो अन्य धर्मों के लोग इसका विरोध कर सकते हैं या अपने धर्म को भी शामिल करने की मांग कर सकते हैं. लोग इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अदालत भी जा सकते हैं और इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ सकता है."

चूंकि संविधान के अनुसार भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, इसलिए प्रफुल्ल गढ़वी मानते ​​हैं कि इस मामले को देश के बाहर भी चुनौती दी जा सकती है.

हसमुख क्रिश्चियन के अनुसार, भारत में 16 हज़ार ईसाई स्कूल और क़रीब 400 ईसाई कॉलेज हैं. अल्पसंख्यक होने के नाते उन्हें अपना धर्म सिखाने का अधिकार है, पर वे ऐसा नहीं करते. ऐसा इसलिए कि उनके पास दूसरे धर्मों के छात्र भी होते हैं और शिक्षा का उद्देश्य किसी ख़ास धर्म को तवज़्ज़ो देना नहीं है.

भगवत् गीता
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भगवत् गीता

'दूसरे धर्मों के मूल्य भी सिखाए जाएं'

अहमदाबाद स्कूल बोर्ड के पूर्व सदस्य इलियास क़ुरैशी ने बीबीसी गुजराती से कहा कि उन्हें भगवत् गीता सिखाने में कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि चाहिए कि दूसरे धर्मों के बारे में भी पढ़ाया जाए.

इसकी वजह बताते हुए वो कहते हैं कि जो गीता में कहा गया है, वही क़ुरान और बाइबिल में भी बताया गया है, गुरु ग्रंथ साहिब में भी वैसी ही सीख दी गई है.

असदउद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम से अहमदाबाद की कॉरपोरेटर ज़ैनब शेख़ का कहना है, "स्कूल में गीता के साथ-साथ अन्य धर्मों के बारे में पढ़ाया जाना चाहिए.''

इन दोनों का आरोप है कि सिलेबस में केवल भगवत् गीता पढ़ाकर बच्चों के मन में हिंदू धर्म की छवि सबसे बेहतर ​धर्म के रूप में बनाई जा रही है.

लेकिन अहमदाबाद एजुकेशन ग्रुप के सलाहकार जंकृत आचार्य इससे असहमत हैं.

वो कहते हैं, "शिक्षा विभाग देर से जागा है. उन्हें सिलेबस में पहले ही गीता को शामिल कर लेना चाहिए था क्योंकि गीता में प्रबंधन की सीख है. बच्चों को इसे कम उम्र में ही पढ़ाने से जीवन के उनके संघर्ष कम हो जाएंगे."

आलोचकों को जवाब देते हुए वो कहते हैं, "लोगों को इसे धार्मिक ग्रंथ मानने के बजाय एक ग़ैर-सांप्रदायिक ग्रंथ के रूप में देखना चाहिए, ताकि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिल सके."

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