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    संथारा का मतलब क्या आत्महत्या होता है?

    By Bbc Hindi

    जैन मुनि तरुण सागर की हाल ही में मृत्यु हुई थी. वो 91 साल के थे. जैन मुनि के क़रीबियों का कहना था कि उन्होंने संथारा लिया था और वो अन्न त्याग कर चुके थे.

    इसके बाद से संथारा को लेकर सोशल मीडिया पर चर्चा शुरू हो गई. कई लोगों ने संथारा का विरोध किया और इसे आत्महत्या बताया तो कई समर्थन में भी नज़र आए. अब ऐसे में संथारा का मतलब और उसे लेकर हो रहे विवाद को जानना ज़रूरी हो जाता है.

    नागपुर की ऋचा जैन के ससुर ने भी संथारा लिया था. वह बताती हैं, ''जब मेरी बहन के ससुर नरेंद्र कुमार जैन ने संथारा लेने का फ़ैसला लिया था तब घर में उत्सव का माहौल था. क्योंकि जिसका जीवन परिपूर्ण है और जिसके भाग्य में समाधि मृत्यु है, उन्हें ही ये प्राप्त होता है.''

    2015 में नरेंद्र कुमार जैन ने संथारा लेने का फ़ैसला किया था. इसके बाद उन्हें गुरु से आदेश मिलने का इंतज़ार करना पड़ा. आचार्य विद्यासागर ने उन्हें इजाज़त दी और उसके बाद नरेंद्र कुमार जैन के लिए संथारा का रास्ता खुल गया.

    ऋचा कहती हैं, ''धार्मिक आदेश है कि अगर किसी ने संथारा लेकर समाधि मृत्यु प्राप्त की हो तो उस पर दुख करने की बजाय उत्सव मनाना चाहिए. उसी आदेश का पालन हम लोग करते हैं.''

    नरेंद्र कुमार जैन ऐसे कई जैन साधकों में से एक हैं जिन्होंने मोक्ष प्राप्ति के लिए संथारा का मार्ग स्वीकार किया. महाराष्ट्र में कई लोग संथारा लेते हैं.

    संथारा का मतलब क्या है

    जैन धर्म में ऐसी मान्यता है कि जब कोई व्यक्ति या जैन मुनि अपनी ज़िंदगी पूरी तरह जी लेता है और शरीर उसका साथ देना छोड़ देता है तो उस वक्त वो संथारा ले सकता है.

    संथारा को संलेखना भी कहा जाता है. संथारा एक धार्मिक संकल्प है. इसके बाद वह व्यक्ति अन्न त्याग करता है और मृत्यु का सामना करता है.

    जैन धर्म को मानने वाले न्यायमूर्ति टी. के. तुकोल की लिखी किताब 'संलेखना इज़ नॉट सुसाइड' में कहा गया है कि संथारा का उद्देश्य आत्मशुद्धि है. इसमें संकल्प लिया जाता है. कर्म के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष मिलना मनुष्य जन्म का उद्देश्य होता है. इस उद्देश्य में संथारा से मदद मिलती है.

    संथारा लेने की धार्मिक आज्ञा किसी गृहस्थ और मुनि या साधु को है.

    दूसरी शताब्दी में आचार्य समंतभद्र के लिखे हुए 'रत्नकरंड श्रावकाचार' ग्रंथ में संथारा का उल्लेख पाया जाता है. श्रावक या साधक का व्यवहार कैसा होना चाहिए उसके बारे में इस ग्रंथ में बताया गया है. इसे जैन धर्म का एक प्रमुख ग्रंथ माना जाता है.

    इसमें कहा गया है कि मुश्किल हालातों में, सूखा पड़ने पर, बुढ़ापे में या लंबी बीमारी में कोई व्यक्ति संथारा ले सकता है.

    जो व्यक्ति इसका संकल्प लेता है उसे साफ़ मन से और बुरी भावना छोड़कर, सबकी ग़लतियां माफ़ करनी चाहिए और अपनी ग़लतियां माननी चाहिए.

    धर्म के मुताबिक़, धर्मगुरु ही किसी व्यक्ति को संथारा की इजाज़त दे सकते हैं. उनकी इजाज़त के बाद वो व्यक्ति अन्न त्याग करता है. उस व्यक्ति के आसपास धर्मग्रंथ का पाठ किया जाता है और प्रवचन होता है.

    उस व्यक्ति को मिलने के लिए कई लोग आते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं. जिसने संथारा लिया है, उस व्यक्ति की मृत्यु को समाधि मृत्यु कहा जाता है.

    उनके पार्थिव शरीर को पद्मासन में बैठाया जाता है और जुलूस निकाला जाता है.

    जैन मुनि तरुण सागर, संथारा
    Getty Images
    जैन मुनि तरुण सागर, संथारा

    संथारा को लेकर विवाद

    जैन धर्म में संथारा आस्था का विषय है पर कुछ लोग इस प्रथा का विरोध करते हैं. ऐसा कहा जाता है कि मानवतावादी दृष्टिकोण से यह प्रथा आत्महत्या का स्वरूप है.

    साल 2006 में निखिल सोनी ने संथारा के ख़िलाफ़ जनहित याचिका दायर की थी. याचिका में कहा गया था कि संथारा की प्रथा आत्महत्या जैसी ही है और इसे आधुनिक समय में मान्यता न दी जाए.

    इस याचिका में ये भी कहा गया कि संथारा लिए हुए व्यक्ति के घर का समाज में स्थान बढ़ जाता है और इस वजह से इस प्रथा को परिवार की तरफ़ से भी प्रोत्साहन दिया जाता है.

    2015 में राजस्थान हाई कोर्ट ने इस याचिका पर फ़ैसला सुनाया. कोर्ट ने संथारा प्रथा को ग़ैर-क़ानूनी बताया. कोर्ट ने ये भी कहा कि अगर धर्म ग्रंथ में ये कहा भी गया है कि संथारा से मोक्ष की प्राप्ति होती है तो भी यह मोक्ष प्राप्ति का सिर्फ़ एक ही मार्ग नहीं है. यह प्रथा जैन धर्म के लिए अनिवार्य नहीं है. ऐसा कहते हुए राजस्थान कोर्ट ने संथारा पर प्रतिबंध लगा दिया था.

    निखिल सोनी के वकील माधव मित्र ने बीबीसी को बताया था कि यह एक महत्वपूर्ण फैसला है. संथारा लेने के लिए प्रेरणा देने वाले या फिर उस व्यक्ति का समर्थन करने वालों को आईपीसी की धारा 306 के अनुसार दोषी माना जाएगा.

    लेकिन हाई कोर्ट के इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फ़ैसले को स्थगित करते हुए संथारा की प्रथा को जारी रखने की इजाज़त दी है.

    जैन मुनि तरुण सागर, संथारा
    Getty Images
    जैन मुनि तरुण सागर, संथारा

    मुंबई में सात साल में 400 संथारा

    मुंबई और मुंबई उपनगर में संथारा लेने की वालों की संख्या अधिक है. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में 2015 में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार गत सात सालों में मुंबई और मुंबई उपनगर में लगभग 400 संथारा लिए गए.

    डोंबिवली से नालासोपारा तक एक के बाद एक लोगों ने संथारा लिया. डोंबिवली के रंताशी शामजी सावला ने संथारा लेने के बाद कुछ ही दिनों में उनका निधन (समाधि मृत्यु) हो गया.

    उसके बाद नालासोपारा की कस्तूरीबेन गाला ने संथारा लिया. 17वें दिन उनका भी निधन (समाधि मृत्यु) हो गया. बाबू लाल जैन ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से उस वक़्त कहा था, ''एक के बाद एक लिए जाने वाले संथारा की वजह से जैन समाज एकसूत्र बंधा हुआ है.''

    राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात इन राज्यों में जैन समुदाय बड़े पैमान में रहता है. यहां भी बहुत से लोग संथारा लेते हैं.

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    BBC Hindi
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    English summary
    What does santhara mean to be suicide

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