West Bengal Election: बंगाल की ‘खाड़ी’ में BJP का सियासी तूफान, डगमगाने लगी TMC की कश्ती

बंगाल की ‘खाड़ी’ में BJP का सियासी तूफान, डगमगाने लगी TMC

West Bengal Election 2021: बंगाल की खाड़ी में एक तूफान उठा है। ये तूफान सियासी है जिसमें तृणमूल की कश्ती डगमगाने लगी है। भाजपा के चक्रवात से कोलकाता की सियासी फिजां एकदम से बदल गयी। सत्तारूढ़ पार्टी के आसमान पर संकट के बादल छा गये। सियासी हवा के तेज झोकों में कई जमे-जमाये मजबूत पेड़ उखड़ गये। ममता बनर्जी का आशियाना तहस-नहस हो गया। कांग्रेस और वामपंथी दलों के घर भी तबाह हुए। शनिवार को तृणमूल के सात और कांग्रेस, सीपीआइ, सीपीएम के एक-एक विधायक भाजपा में शामिल हो गये। मौसम के बदले हुए मिजाज के देख कर गृहमंत्री अमित शाह छतरी तान कर तैयार खड़े थे। दूसरे दलों के 10 विधायक राजी-खुशी इसकी ओट में आ गये। सियासत के मौसम वैज्ञानिक इस तूफान से तबाही का आकलन कर रहे हैं। वे पूर्वानुमान लगा रहे हैं कि अगले चार-पांच महीनों में पश्चिम बंगाल के हालात कैसे रहने वाले हैं।

10 विधायक और एक सांसद हुए कमल के

10 विधायक और एक सांसद हुए कमल के

तृणमूल छोड़ कर भाजपा में शामिल होने वाले विधायक हैं- शुभेन्दु अधिकारी (उनका इस्तीफा अभी मंजूर नहीं हुआ है), सैकत पांजा (बर्दवान), शीलभद्र दत्त (बैरकपुर), दिपाली विश्वास (गाजोल), शुक्रा मुंडा (नागरकाटा), विश्वजीत कुंडू (कालना), वनश्री माइती (कांथी उत्तर)। उसके अलावा भाकपा के तमलुक से विधायक अशोक डिंडा, माकपा की हल्दिया से विधायक तापसी मंडल और कांग्रेस के पुरुलिया से विधायक सुदीप मुखर्जी भी भाजपा में शामिल हुए। बर्दवान पूर्व से तृणमूल के सांसद सुनील मंडल ने भी भाजपा का दामन थाम लिया।

ममता का मजबूत किला क्यों कमजोर हुआ?

ममता का मजबूत किला क्यों कमजोर हुआ?

2016 में जब ममता बनर्जी ने लगातार दूसरी बार विधानसभा का चुनाव जीता था तो उन्हें एक तरह से अपराजेय मान लिया गया था। तब ये कहा जा रहा था कि ममता के रहते अब किसी दूसरे दल के लिए पश्चिम बंगाल में गुंजाइश नहीं है। लेकिन 2020 में स्थिति ये है कि उनके दल में भगदड़ मची हुई है। यहां तक कि ममता के करीबी और पार्टी में नम्बर दो नेता माने जाने वाले शुभेन्दु अधिकारी ने भी पाला बदल लिया। आखिर ऐसी स्थिति क्यों आयी ? पार्टी के कई नेता तृणमूल कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) से नाराज बताये जा रहे हैं। ममता जिस तरह से पीके को तरजीह दे रही हैं उससे पार्टी में असंतोष पनपा है। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी की निरंकुश कार्यशैली से पार्टी के मेहनती नेता अपमानित महसूस करते हैं। ऐसे नेताओं को अब भाजपा एक विकल्प के रूप में दिखायी पड़ रही है। मां, माटी और मानुस के नारे से जब तृणमूल भटकने लगी तो उसकी ताकत कमजोर होने लगी। शुभेन्दु अधिकारी उस नंदीग्राम से ताल्लुक रखते हैं जिसने बंगाल की राजनीति बदल दी और तृणमूल को स्थापित किया। कहा जाता है कि शुभेन्दु ऐसे मजबूत नेता हैं जो मिदनापुर के आसपास की करीब 30-35 सीटों पर असर दिखा सकते हैं।

असंतोष की आग

असंतोष की आग

18 नवम्बर 2020 को एक जनसभा में तृणमूल के विधायक नियामत शेख ने कहा था, क्या हमें प्रशांत किशोर से राजनीति सीखने की जरूरत है ? अगर पश्चिम बंगाल में तृणमूल को झटका लगता है तो इसके लिए केवल प्रशांत किशोर ही जिम्मेदार होंगे। इस बात से तृणमूल की अंदरुनी राजनीति को समझा जा सकता है। कुछ दिनों पहले तृणमूल के एक और विधायक मिहिर गोस्वामी ने सोशल मीडिया पर पोस्ट लिख कर पूछा था, क्या तृणमूल कांग्रेस ममता बनर्जी की पार्टी है ? ऐसा लग रहा है इस पार्टी को किसी कॉन्ट्रैक्टर (ठेकेदार) के हाथों में सौंप दिया गया है। ममता के सबसे भरोसेमंद नेता शुभेन्दु अधिकारी ने अगर बगावत की तो इसकी एक वजह भी प्रशांत किशोर भी रहे। नवम्बर में जब शुभेन्दु ने विद्रोही तेवर अपनाय़ा था तो उनको मनाने के लिए प्रशांत किशोर ही उनके घर गये थे। तब पार्टी के कुछ नेताओं ने सवाल उठाया था कि प्रशांत किस हैसियत से वहां गये थे। तृणमूल में प्रशांत किशोर और ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी का एक शक्तिशाली गुट बन गया है जिससे कई नेता घुटन महसूस कर रहे थे। ममता इन दोनों पर इतना आश्रित हो गयीं हैं कि वे किसी दूसरे नेता से कोई सलाह नहीं लेतीं। ऐसे में शुभेन्दु अधिकारी ने राख में दबी चिनगारी को हवा दे दी।

प्रशांत किशोर से फायदा या नुकसान?

प्रशांत किशोर से फायदा या नुकसान?

जून 2019 में प्रशांत किशोर ममता बनर्जी से मिले थे। उस समय वे जदयू के उपाध्यक्ष थे। जदयू चूंकि एनडीए का हिस्सा था इसलिए भाजपा ने प्रशांत किशोर के इस मुलाकात पर विरोध प्रगट किया था। लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी को 12 सीटों का नुकसान हुआ था। तृणमूल को 22 तो भाजपा को 18 सीटें मिलीं थीं। इस चुनावी नतीजे से घबरा कर ममता बनर्जी ने प्रशांत किशोर को चुनावी रणनीतिकार बना लिया। संयोग ऐसा हुआ कि पीके ने तृणमूल से जुड़ने के करीब दो महीने बाद ही रंग भी जमा लिया। नारा गढ़ने में उस्ताद पीके ने ‘दीदी के बोलो' कार्यक्रम शुरू किया। उनकी कंपनी आइपैक के करीब 800 सौ कर्मचारियों ने खूब मेहनत की। छह महीने के अंदर नगर निगम के चुनाव हुए तो तृणमूल कांग्रेस ने सभी सात निगमों पर जीत का परचम फहरा दिया। इस जीत से ममता बनर्जी प्रशांत किशोर पर बहुत ज्यादा विश्वास करने लगी। धीरे-धीरे ममता की नजर में पीके की अमियत बढ़ने लगी तो पार्टी के समर्पित नेताओं को यह अखरने लगा। पीके पर सरकार और पार्टी के मामले में दखल देने का भी आरोप लगा। फरवरी 2020 में जब ममता बनर्जी ने पीके को जेड श्रेणी की सुरक्षा देने का फैसला किया तो पक्ष और विपक्ष के कई नेताओं को ये बात अखर गयी। ममता से सवाल पूछा जाने लगा कि क्या प्रशांत किशोर तृणमूल कांग्रेस में आने वाले हैं जो उनको इतनी बड़ी सुरक्षा दी जा रही है ? प्रशांत सिर्फ एक चुनावी रणनीतिकार हैं, उनका पश्चिम बंगाल में न तो कोई सामाजिक योगदान है और न ही कोई राजनीतिक योगदान, फिर इतनी इनायत क्यों ? इन सवालों से ही तृणमूल में बगावत की आग भड़की। अब शुभेन्दु अधिकारी ने भाजपा के साथ मिल ममता बनर्जी की सत्ता को उखाड़ फैंकने का बीड़ा उठाया है।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+