क्यों मौसम दे रहा है धोखा ? दुनिया भर में बढ़ी मुश्किल, IMD ने इस बड़ी समस्या की ओर किया इशारा

नई दिल्ली, 7 अगस्त: बादल फट जा रहे हैं और मौसम वैज्ञानिकों को उसके बारे में कोई अनुमान ही नहीं रहता। दुनिया भर के कई देश इस बार अप्रत्याशित लू का शिकार हुए हैं, लेकिन मौसम वैज्ञानिक उसके बारे में पहले किसी तरह की संभावना जताने में नाकाम रहे हैं। मौसम के इस बेईमान मिजाज ने कई लोगों की जानें भी ली हैं। अब भारतीय मौसम विभाग के महानिदेशक ने बताया है कि मानसूनी बारिश ने इसबार कई इलाकों को धोखा क्यों दिया है। कई क्षेत्रों में उम्मीद से काफी ज्यादा बारिश हो गई है और जो बारिश के लिए ही जाने जाते थे, वे बूंद-बूंद के लिए तरस गए हैं।

जलवायु परिवर्तन है मौसम की धोखेबाजी का जिम्मेदार

जलवायु परिवर्तन है मौसम की धोखेबाजी का जिम्मेदार

भारतीय मौसम विभाग के डायरेक्टर जनरल मृत्युंजय महापात्र ने कहा है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिकों के लिए मौसम की सटीक जानकारी देने में दिक्कत हो रही है। इसकी वजह से मौसम वैज्ञानिक अवलोकन नेटवर्क को बढ़ाने और मौसम का पूर्वानुमान लगाने के अपने तरीकों को और बेहतर कर रहे हैं। उन्होंने कहा है कि जलवायु परिवर्तन के चलते भारी बारिश की संख्या बढ़ गई है, जबकि हल्की बारिश की गिनती कम हो गई। भारतीय मानसून पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बारे में आईएमडी चीफ ने कहा, 'हमें 1901 से मानसून की बारिश का डिजिटेल डेटा मिला है। भारत के उत्तरी, पूर्वी और उत्तरपूर्वी हिस्सों में बारिश में कमी दिखती है, जबकि पश्चिम के कुछ इलाकों, जैसे कि पश्चिम राजस्थान में बारिश में वृद्धि दिखती है। इसलिए अगर पूरे देश को देखें तो कोई महत्वपूर्ण ट्रेंड नहीं है- मानसून बेतरतीब है और इसमें बड़े पैमाने पर भिन्नता दिखता है।'

असामान्य रूप से बदली बारिश की प्रवृत्ति

असामान्य रूप से बदली बारिश की प्रवृत्ति

मौसम अधिकारी ने यह भी कहा है कि 1970 से रोजाना की बारिश के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि बहुत ही ज्यादा बारिश वाले दिनों की संख्या बढ़ी है और हल्की या मध्यम बारिश वाले दिनों में कमी रिकॉर्ड की गई है। उनके मुताबिक, 'इसका मतलब है कि अगर बारिश नहीं हो रही है, तो नहीं हो रही है। अगर बारिश हो रही है तो बहुत ही ज्यादा बारिश हो रही है। कम दबाव की स्थिति में बारिश बहुत ही तेज होती है। यह भारत समेत उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में पाए जाने वाले सबसे महत्वपूर्ण ट्रेंड में से एक है। शोधों से यह साबित हुआ है कि भारी बारिश की घटनाओं में वृद्धि और हल्की बारिशों में कमी, जलवायु परिवर्तन के कारण है।'

मौसम का पूर्वानुमान लगाने में दिक्कत

मौसम का पूर्वानुमान लगाने में दिक्कत

वरिष्ठ मौसम वैज्ञानिक के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के चलते सतह की हवा का तापमान बढ़ गया है, जिसने वाष्पीकरण दर को बढ़ा दिया है। क्योंकि, गर्म हवा ज्यादा नमी सोख लेती है, जिससे तेज वर्षा होती है। उनका कहना है, 'जलवायु परिवर्तन ने वातावरण में अस्थिरता पैदा की है, जिससे गरज के साथ बारिश, आसमानी बिजली गिरने और भारी वर्षा की गतिविधियां बढ़ गई हैं। अरब सागर में चक्रवातों की गंभीरता भी बढ़ती जा रही है। मौसम की चरम घटनाओं की आवृत्ति में यह वृद्धि पूर्वानुमान लगाने वालों के लिए एक चुनौती पेश कर रही है। शोध से पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारी वर्षा की भविष्यवाणी की क्षमता को नुकसान पहुंचता है।'

इन राज्यों में बारिश कम होने का ट्रेंड बढ़ रहा

इन राज्यों में बारिश कम होने का ट्रेंड बढ़ रहा

बीते 27 जुलाई को ही सरकार ने संसद में बताया था कि उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, मेघालय और नागालैंड में 30 साल की अवधि (1989 से 2018 तक) के दौरान दक्षिण-पश्चिम मानसून के समय बारिश में महत्वपूर्ण रूप से गिरावट का ट्रेंड दिखा है। सरकार ने यह कहा कि अरुणाचल प्रदेश और हिमाचल प्रदेश के साथ ही इन पांचों राज्यों में सालाना वर्षा में भी खास कमी देखी गई है।

पूर्वानुमान बेहतर करने के लिए उठाए जा रहे कदम

पूर्वानुमान बेहतर करने के लिए उठाए जा रहे कदम

मौसम के पूर्वानुमान की क्षमता में सुधार के लिए आईएमडी अब रडार, स्वचालित मौसम स्टेशनों और वर्षा नापने वाले उपकरणों और उपग्रहों की संख्या के साथ ही अपने नेटवर्क को मजबूत कर रहा है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के मुताबिक चक्रवात, भारी बारिश, गरज के साथ बारिश, लू, शीत लहर और कोहरे जैसी मौसम की चरम घटनाओं का सटीक अनुमान लगाना बेहतर अवलोकन नेटवर्क, मॉडलिंग और आईएमडी के कंप्यूटिंग सिस्टम के कारण पिछले पांच वर्षों में बेहतर हुआ है।

पूर्वानुमान में सुधार के उपाय

पूर्वानुमान में सुधार के उपाय

महापात्र ने कहा है कि उत्तर-पश्चिमी हिमालय में 6 रडार लगाए गए हैं और चार इस साल और लगाए जाएंगे। उत्तरपूर्वी हिमालय के लिए 8 रडार खरीदने की प्रक्रिया चल रही है। देश में जिन इलाकों में कमी रहेगी, उन जगहों पर 11 रडार लगाए जाएंगे। उन्होंने कहा, 'रडारों की संख्या मौजदूा 34 से बढ़कर 2025 तक 67 हो जाएगी।' इसके अलावा भी कई तरह की तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है और उन्हें बेहतर भी किया जा रहा है। (इनपुट-पीटीआई)

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