कश्मीरी पंडित सुनील कुमार की हत्या, जानिए क्या कह रहे गाँव के मुसलमान
"मेरी चार बेटियां हैं. उनकी परवरिश अब कौन करेगा? जिन्होंने मेरे पति को मार डाला, उनका भी अंजाम ऐसा ही होना चाहिए. मेरे पति को आतंकवादियों ने मारा है. घर से निकलने के 10 मिनट बाद हमने गोलियों की आवाज़ सुनी. मैंने आवाज़ भी कि उन्हें मार दिया गया. मेरी माँ और बेटियों ने कहा कि ये पटाख़ों की आवाज़ है. जब हम बाद में गए तो वो वहाँ गिरे पड़े थे. उसके बाद हमें कुछ पता नहीं."

रोती-बिलखती सुनीता अपने पति के शव के पास ही बैठी हैं और ये बातें कह रही हैं.
सुनीता के पास बैठीं उनकी रिश्तेदार महिलाएं, उन्हें दिलासा देने की कोशिश कर रही हैं. लेकिन ये सारी कोशिशें बेअसर साबित हुईं.
मंगलवार को दक्षिण कश्मीर में शोपियां ज़िले के चोटीपुरा गाँव में सुनील कुमार की चरमपंथियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी.
हमले में सुनील कुमार के बड़े भाई पिताम्बर नाथ गंभीर रूप से घायल हो गए हैं. फ़िलहाल अस्पताल में उनका इलाज चल रहा है. पुलिस ने इस हत्या के लिए आतंकवादियों को ज़िम्मेदार ठहराया है.
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गाँव में कितने हिन्दू?
सुनील कुमार के परिवार के अलावा चोटीपुरा गाँव में दो और पंडित परिवार रहते हैं. दोनों क़रीबी रिश्तेदार हैं. इन तीन घरों में कुल 16 लोग रहते हैं.
जब सुनील कुमार और उनके भाई पर गोलाबारी की गई तब वे अपने घर से पास 100 मीटर की दूरी पर सेब के बाग़ में काम कर रहे थे.
सुनील कुमार की हत्या के बाद चोटीपुरा गाँव में गहरा सन्नाटा फैला हुआ है. हर तरफ़ फौज और पुलिस का पहरा था. इस घटना के बाद गाँव की सारी दुकानें बंद थीं.
परिवार का ग़ुस्सा उस समय और भी ज़्यादा फूटा जब कश्मीर के डिविज़नल कमिश्नर पांडुरंग के. पॉल सुनील कुमार के घर पहुँचे.
सुनील कुमार के परिवार के एक सदस्य अनिल कुमार ने पांडुरंग के. पॉल का रास्ता रोक लिया और उन्हें आगे बढ़ने नहीं दिया.
अनिल कुमार ने पांडुरंग के पॉल से सवाल करते हुए पूछा, "मैं अनिल कुमार हूँ. आप के पास आया था, जब हमारे एक दूसरे भाई पर चार महीने पहले हमला हुआ था. मैंने आपसे कहा था कि हमारी जान की सुरक्षा के बारे में सोचो. आप ने कहा था कि मैं कुछ नहीं कर सकता. मेरे हाथ में कुछ नहीं है. ये भी कहा था कि आप अपने घर में रहिए."
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नाराज़ अनिल कुमार ने पांडुरंग के. पॉल से सवाल किया, "आप आज यहाँ क्या करने आए हैं? जवाब दीजिए मुझे."
बाद में अनिल कुमार को वहाँ से पुलिस ने हटा दिया और फिर पुलिस अधिकारी पॉल सुनील कुमार के घर के अंदर दाख़िल हो सके.
डिविज़नल कमिश्नर ने परिवार के आरोपों का खंडन करते हुए बताया कि जब पिछली बार उनके भाई बाल कृष्ण पर हमला हुआ था तो उसके बाद घर के पास सिक्यॉरिटी गार्ड्स को तैनात किया गया था. साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि आतंकवाद को कुछ और समय के लिए झेलना होगा.
इसी वर्ष अप्रैल में अनिल कुमार के चचेरे भाई बाल कृष्ण को भी चरमपंथियों ने इसी गाँव में उनके घर के पास गोली मारी थी लेकिन उनकी जान बच गई थी.
अनिल कुमार ने क़रीब दो घंटों तक किसी भी मीडिया वाले को घर के अंदर जाने नहीं दिया.
सुनील कुमार का परिवार कभी कश्मीर छोड़ कर नहीं गया. इस परिवार ने तब भी कश्मीर नहीं छोड़ा था, जब यहाँ ख़ून-ख़राबा चरम पर था.
सुनील कुमार खेती करते थे. सुनील कुमार के परिवार में अब उनकी चार बेटियां और पत्नी बची हैं.
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सुनील कुमार के घर स्थानीय लोग ढांढस बंधाने बड़ी संख्या में आ रहे थे. एक पड़ोसी महिला शाहीना सुनील कुमार के घर पहुँचीं.
शाहीना ने बीबीसी से कहा, "हमें उनकी मौत पर बड़ा अफ़सोस है. उनकी चार बेटियां हैं. पड़ोसियों के साथ उनके बहुत अच्छे रिश्ते थे. उनकी मौत से हम गहरे सदमे में हैं. हमारा तो एक अच्छा पड़ोसी खो गया."
चोटीपुरा गाँव के कई मुसलमान सुनील कुमार के अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे.
अंतिम संस्कार की सारी ज़िम्मेदारियां परिवार के साथ मिलकर स्थानीय मुसलमानों ने पूरी कीं. ऐसा लग रहा था कि उनका अपना कोई ख़ास मर गया हो. सुनील कुमार के एक पड़ोसी मुदस्सिर अहमद लोन ने कहा, "सुनील कुमार की हत्या बहुत ही दुखद है. हमें यह स्वीकार्य नहीं है.''
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बीते कुछ महीनों से कश्मीरी पंडितों, प्रवासी मज़दूरों और दूसरे आम नागरिकों को कश्मीर में निशाना बनाया जा रहा है. कुछ महीने पहले कश्मीर वापस लौटे कश्मीरी पंडित राहुल भट्ट की हत्या के बाद कश्मीर में प्रधानमंत्री पैकेज के तहत काम करने वाले हज़ारों कश्मीरी पंडितों ने सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया था.
अपने ट्रांजिट कैम्प्स के अंदर कश्मीरी पंडितों के प्रदर्शन क़रीब दो महीनों तक जारी रहे. कश्मीरी पंडितों और दूसरे ग़ैर-कश्मीरी नागरिकों पर हमले के बाद कश्मीरी पंडितों ने कश्मीर से बाहर शिफ़्ट करने की मांग की थी.
सरकार ने आश्वासन दिया था कि कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा के लिए कड़े क़दम उठाए जाएंगे. इस सरकारी आश्वासन के बाद ही प्रधानमंत्री पैकेज के तहत काम करने वाले हज़ारों कश्मीरी पंडितों ने अपने प्रदर्शन बंद किए थे.
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