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भारत छोड़ने के लि​ए मौखिक आदेश दिया गया था, कोई लिखित सूचना नहीं दी गई: जर्मन छात्र

By शशांक चौहान, बीबीसी प्लानिंग एडिटर

JAKOBLINDENTHAL

आईआईटी मद्रास में एकेडमिक इक्स्चेन्ज प्रोग्राम पूरा होने से पहले जर्मनी के जिस छात्र को भारत छोड़कर जाने के लिए कहा गया था उन्होंने बीबीसी को बताया है कि देश से जाने के लिए उन्हें लिखित में कोई आधिकारिक आदेश नहीं दिया गया था. हालांकि चेन्नई में एक इमिग्रेशन अधिकारी ने उन्हें तत्काल भारत छोड़ देने के लिए कहा था.

यह ख़बर काफ़ी सुर्खियों में रही है कि जैकब लिंडनथल ने 16 और 19 दिसंबर को चेन्नई में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के विरोध में आयोजित प्रदर्शनों में हिस्सा लिया था. भारतीय मीडिया में विरोध-प्रदर्शन के वीडियो और तस्वीरें छाई रहीं.

चेन्नई स्थित इमिग्रेशन ऑफ़िस (विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय) ने 23 दिसंबर को उन्हें बताया कि छात्र वीज़ा होने के कारण वे किसी प्रदर्शन में हिस्सा नहीं ले सकते हैं और उन्हें तुरंत भारत छोड़ना होगा. एफ़आरआरओ एक कार्यालय है जो भारत में विदेशी पर्यटकों से जुड़े मामलों को निपटाता है और यह विभाग केन्द्र सरकार के गृह विभाग के अन्तर्गत आता है.

कोच्चि स्थित एफ़आरआरओ कार्यालय ने भी नार्वे की एक महिला पर्यटक से संपर्क किया. इस महिला ने सीएए विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के बारे में एक पोस्ट किया था. एक अधिकारी ने पीटीआई को बताया कि वे इस बात की जाँच कर रहे थे कि क्या महिला ने वीज़ा नियमों का उल्लंघन किया है या नहीं.

ब्यूरो ऑफ़ इमिग्रेशन की वेबसाइट के मुताबिक़, विदेशियों को उन आशय को पूरा करना होता है जिसके लिए शुरू में वीज़ा के लिए आवेदन किया गया था. साथ ही वीज़ा पर उल्लेख की गई शर्तों का भी पालन करना होता है.

जर्मन छात्र
Getty Images
जर्मन छात्र

इमिग्रेशन और वीज़ा के लिए आवेदन की जाने वाली भारत की कई वेबसाइटों पर प्रदर्शन आदि में भाग लेने के बारे में कुछ नहीं कहा गया है.

हालांकि, इसके बारे में छात्र के कहे जाने के बावजूद इमिग्रेशन विभाग ने जैकब को लिखित में कोई कारण नहीं बताया.

छात्र ने क्या बताया?

उन्होंने नूनबर्ग से बीबीसी को बताया, "मुझे कहा गया कि देश छोड़ने के आदेश का कारण मेरे प्रदर्शनों में हिस्सा लेने से वीज़ा नियमों का उल्लंघन था."

उन्होंने बताया, "मुझे निर्वासित नहीं किया गया." चेन्नई इमिग्रेशन कार्यालय के आदेश के बारे में आईआईटी मद्रास के अंतरराष्ट्रीय कार्यालय ने उन्हें सूचना दी जो उन्हें बताने के लिए कहा गया था. जब आईआईटी से फ़ोन आया तब वे फ्रिसबी टूर्नामेंट में भाग लेने के लिए बेंगलुरु में थे.

इस मामले में प्रतिक्रिया के लिए बीबीसी ने आईआईटी मद्रास से संपर्क किया लेकिन अभी तक वहां से कोई सूचना नहीं मिली है.

जैकब ने बीबीसी को बताया कि चेन्नई में स्थित वाणिज्य दूतावास ने उन्हें सरकार के आदेश का पालन करने की सलाह दी ताकि जबरन निर्वासन से बचा जा सके.

हमारे संवाददाता ने चेन्नई में वाणिज्य दूतावास से संपर्क किया लेकिन उन्होंने इस मामले पर टिप्पणी करने से इंकार कर दिया.

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क्यों चिंतित थे जैकब?

जैकब ने बताया कि जब वह घर वापस आने के लिए कनेक्टिंग फ्लाइट लेने दिल्ली में उतरे तो उन्होंने जर्मन दूतावास से संपर्क किया क्योंकि वो हवाई अड्डे पर भारतीय इमिग्रेशन अधिकारियों द्वारा उनके ख़िलाफ़ किसी भी कार्रवाई को लेकर चिंतित थे. उन्होंने बताया कि जर्मन दूतावास के एक अधिकारी ने कनेक्टिंग फ्लाइट में उड़ान भरने तक मेरी मदद का वादा किया.

बीबीसी ने दिल्ली में भी जर्मनी दूतावास से प्रतिक्रिया मांगी लेकिन वहां से भी जवाब नहीं मिला.

इमिग्रेशन कार्यालय में क्या हुआ?

चेन्नई के इमिग्रेशन कार्यालय में क्या हुआ इस बारे में भी जैकब ने हमें विस्तृत जानकारी दी.

जैकब ने बताया, ''मुझे इमिग्रेशन कार्यालय में बुलाया गया. जहां एक अधिकारी ने मुझसे मेरी छुट्टियों के दौरान की गतिविधियों और मेरी व्यक्तिगत ​रुचियों के बारे में पूछना शुरू कर दिया. अधिकारी के साथ दो व्यक्ति और थे जो चुप थे. कुछ समय के बाद उन्होंने मुझे बताया कि मुझे अपने 'रेज़िडेंट रजिस्ट्रेशन' की निर्धारित समय सीमा को याद रखना चाहिए. मुझे इस समय सीमा के बारे में जानकारी नहीं थी क्योंकि मुझे इसकी पुष्टि की कभी जानकारी नहीं मिली थी और भारत से आने के बाद मुझे इस बारे में लिखित में कोई जानकारी भी नहीं मिली.''

''अधिकारी ने मुझे बताया कि मुझे आईआईटी-एम के अंतरराष्ट्रीय कार्यालय से फिर से अपना पंजीकरण नंबर लेना चाहिए और मुझे अपने भारतीय बैंक अकाउंट नंबर की ताज़ा जानकारी भी अपलोड करनी चाहिए. मामला सुलझता नज़र आ रहा था. इसके बाद अधिकारी ने मुझसे मेरे राजनीतिक विचारों विशेषकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इमिग्रेशन के बारे में पूछना शुरू किया. तब मैंने सीएए विरोधी प्रदर्शनों का ज़िक्र किया और बताया कि मैं एक प्रदर्शन का गवाह रहा हूं. अधिकारी ने क़ानून के बारे में मुझसे मेरी राय पूछी. जब मैंने इस बारे में अपनी चिंताएं व्यक्त कीं तो ​अधिकारी ने मुझे बताया कि मैंने सूचना नहीं दी थी और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सूचित अभिव्यक्ति तक सीमित होनी चाहिए.''

जैकब ने बताया, ''अधिकारी ने दलील दी कि ग़लत सूचना वाले लोगों को प्रदर्शन करने का अधिकार नहीं है. जिसके बाद मैंने वादा किया कि मैं नागरिकता क़ानून के बारे में अपनी जानकारी पुख्ता करुंगा. मुझे लगा कि मामला निपट गया है और अगर उसने इस मामले में मदद की तो मैंने लिखित में माफ़ी मांगने की पेशकश की. अधिकारी ने उसे कार्यालय के बाहर इंतज़ार करने को कहा और उसके रेज़िडेंट परमिट मामले को सुलझाया.

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जैकब ने बीबीसी को बताया, "कार्यालय में वापस बुलाए जाने के बाद अधिकारी ने मुझे बताया कि मेरी राय और सीएए विरोधी प्रदर्शनों में शामिल रहने की वजह से मुझसे तुरंत भारत छोड़ने का अनुरोध किया जाता है. उन्होंने उल्लेख किया कि इस देश की सरकार को लगता है कि वहां मेरी उपस्थिति अनुचित थी. मैं कुछ सेकंड के लिए हैरान रह गया."

जैकब ने बताया कि उन्होंने अपने वीज़ा पर किसी विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने की अनुमति के बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी और कहा कि यह विरोध दुनिया भर में छात्र संस्कृति का

ए​क हिस्सा था.

उन्होंने बताया, "जब मैंने उन्हें नियमों को सही ढंग से बताने के लिए कहा जिसमें प्रदर्शनों में भाग नहीं लेने की बात कही गई है तो वह बहुत ग़ुस्सा हो गईं और मुझसे कहा कि स्टूडेंट वीज़ा केवल पढ़ाई के लिए है और मुझे बताया गया कि यह स्पष्टीकरण के लिए पर्याप्त है."

इसके बाद अधिकारी ने उनका पासपोर्ट ले लिया और जब उन्होंने अपने टि​कट ले लिए तब कुछ घंटे के बाद पासपोर्ट वापस किया.

जैकब का कहना है कि उन्हें अभी भी यक़ीन नहीं है कि छात्र वीज़ा के तहत प्रदर्शन करने की मनाही है.

उन्होंने बताया, "अगर इन नियमों का कड़ाई से पालन किया जाए तो इसका मतलब है कि मैं वैज्ञानिक सम्मेलनों के अलावा किसी और चीज़ के लिए देश के भीतर यात्रा नहीं कर सकता हूं और मूल रूप से मुझे सोने के लिए अपने कमरे, खाने के लिए मेस और पढ़ाई के लिए लेक्चर हॉल और पुस्तकालय जाने की ही अनुमति है. बतौर छात्र मैं देखूं तो मैंने मान लिया कि सामाजिक जीवन में व्यापक सहभागिता स्वीकार्य है. मैं जानता हूं कि अधिकांश छात्र प्रदर्शनों में भाग लेते हैं और वह छात्र और राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में ऐसा नहीं करते हैं. मेरी राय में इस मामले में नियम का उल्लंघन किया गया. लेकिन ज़ाहिर है कि भारत में कुछ अधि​कारियों द्वारा इसे अलग तरह से देखा जाता है.''

चेन्नई एफ़आरआरओ ने इस मुद्दे पर एक इंटरव्यू या प्रतिक्रिया देने के हमारे अनुरोध पर जवाब नहीं दिया.

नागरिकता संशोधन क़ानून
EPA
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मेरा प्रदर्शन भारत के ख़िलाफ़ नहीं था

नूनबर्ग में जन्मे और पले-बढ़े, जैकब एक मध्यमवर्गीय कैथोलिक परिवार से हैं. उनकी पढ़ाई एक प्राईवेट स्कूल में हुई. स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने एक साल तक डार-एस-सलाम में तंजानियाई फायर ब्रिगेड में एक वालन्टिर के तौर पर काम किया. उन्होंने बताया कि वहां फायर सर्विस तैनातियों के दौरान उनका सामना सबसे पहले मानवाधिकारों के उल्लंघनों से हुआ और उन्होंने ड्रेस्डेन में अपने विश्वविद्यालय में भौतिकी का अध्ययन करते हुए जर्मनी की ग्रीन पार्टी में शामिल होने का फैसला किया.

उन्होंने सैक्सन ग्रीन पार्टी में एक आर्थिक नीति समूह स्थापित करने में हिस्सा लिया और भारत जाने से एक साल पहले करीब साल भर उसके स्पीकर के रूप में अपनी सेवा दी.

अब उन्हें यकीन नहीं है कि वह वापस जा पाएंगे और अपने ड्रेस्डेन यूनिवर्सिटी ऑफ़ टेक्नोलॉजी और आईआईटी मद्रास के भौतिकी विभाग के बीच एक्सचेंज प्रोग्राम के हिस्से के तहत बचे हुए सेमेस्टर को पूरा कर सकेंगे.

उन्होंने बताया, "मैं टीयू ड्रेस्डेन में अपनी पढ़ाई जारी रखने की तैयारी कर रहा हूं. चूंकि मैंने चेन्नई में वास्तव में अच्छे दोस्त बनाए और आईआईटी-एम में शैक्षणिक माहौल अच्छा है, मैं निश्चित रूप से भारत लौटना चाहता हूं. मैं यह स्पष्ट करना चाहता हूं कि मेरा विरोध एक राष्ट्र के रूप में भारत के फ़िलाफ़ नहीं था, बल्कि एक राजनीतिक धारा के फ़िलाफ़ था जो लगातार तानाशाही तरीके से काम करती है."

जैकब कहते हैं कि चेन्नई में उनके दोस्तों ने उन्हें सीएए के फ़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के बारे में बताया और उस बारे में थोड़ा पढ़ने के बाद उन्हें लगा कि जब एनआरसी के साथ कानून का इस्तेमाल किया जाएगा तब भारत में मुसलमानों को देश छोड़ना होगा.

चेन्नई में प्रदर्शन में अपनी सहभागिता के बारे में उन्होंने बताया, ''क़ानून के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करके मैं अपनी चिंता व्यक्त कर रहा हूं जिसमें​ किसी को भी चिंता होगी कि जब मार्केट में ख़ामियों वाले ख़तरनाक डिजाइन के साथ वास्तव में एक नया प्रोडक्ट आता है. क़ानून का सबब उचित लगता है लेकिन सरकार इस बात का सही आश्वासन नहीं दे सकती है कि क़ानून का दुरुपयोग आसानी से नहीं किया जा सकता है.''

नागरिकता संशोधन क़ानून
EPA
नागरिकता संशोधन क़ानून

अनावश्यक बल प्रयोग

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए अनावश्यक रूप से बल प्रयोग किया.

उन्होंने बताया, "प्रदर्शनकारियों की पहल के कारण जहां प्रदर्शनकारी हिंसक हो गए, इसमें मुझे सरकार के ख़िलाफ़ सालों से जमा हो रहे मूक असंतोष का विस्फोट लगता है. निश्चित रूप से इसे वैध नहीं ठहराया जा सकता लेकिन इस समय मैं कहूंगा कि समाधान का एकमात्र रास्ता है कि सरकार आलोचना स्वीकार करे क्योंकि एक लोकतांत्रिक सरकार को ऐसा करना चाहिए.''

प्रदर्शन में शामिल होने के दौरान जर्मन छात्र की तस्वीर वायरल हो गई थी. इस तस्वीर में वह जर्मनी के नाज़ी इतिहास के बारे में लोगों को याद दिलाने के लिए प्लेकार्ड पकड़े हुए हैं.

उन्होंने कहा, "बैनर में '1933-1945. वी हैव बीन देयर' लिखा था. वास्तव में मेरा इरादा वर्तमान सरकार की तुलना नाज़ी सरकार से करने का नहीं था. मैं इस तथ्य से अवगत कराना चाहता था कि कई अधिनायकवादी सिस्टम क़ानूनों से शुरू होते हैं जो सही लगते हैं लेकिन एक द्वेषपूर्ण सरकार द्वारा ख़तरनाक तरीक़े से इस्तेमाल किए जाने के तरीक़े हैं."

''वर्तमान सरकार के तहत सरकारी पदों पर बैठे हुए लोगों द्वारा भी मुस्लिम विरोधी बयान देना और धर्म के अनुसार लोगों की 'भारतीयता' में अंतर करना सामान्य बात हो गई है. मेरा उद्देश्य यह कहना था कि अधिनायकवादी शासन एक दिन में (वर्ष 1933) नहीं आता है और कुल मुसीबत (वर्ष 1945) अभी भी दूर है. लेकिन वे छोटे क़दम एक चिंता और आख़िरकार ख़तरनाक गतिविधि को बढ़ा रहे हैं."

नागरिकता संशोधन क़ानून
EPA
नागरिकता संशोधन क़ानून

हालांकि, उन्होंने स्वीकार किया कि एक विदेशी के तौर पर उनका बयान बहुत उत्तेजक था और वह फिर से इसका इस्तेमाल नहीं करेंगे.

जैकब की उम्मीद

जैकब को उम्मीद है कि वह साल के बीच में अपने विश्वविद्यालय में शामिल होंगे और अगर भारत में अपने एक्सेंज कार्यक्रम को पूरा करने में वह असमर्थ होते हैं तो समय नहीं गंवाएंगे.

चेन्नई में बिताए अपने समय के बारे में उन्होंने कहा,"आमतौर पर विदेशी छात्रों के रूप में स्वागत करने वाले माहौल के अलावा मैं कई सहपाठियों और टीम के साथियों से मिला, जिनसे मेरा गहरा रिश्ता बन सका."

BBC Hindi
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English summary
Verbal order was given to leave India, no written notice given: German student
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