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Valentine's Day 2020 Special: 'प्यार' हुआ पुराना, आज का आशिक है सिर्फ 'रोमांस' का दीवाना!

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बेंगलुरू। तेजी बदलते दौर ने रहन-सहन और संस्कृति को ही नहीं, बल्कि इसने लोगों के विचारों और नजरियों पर भी खूब सेंधमारी की है। आज वैलेंटाइन डे हैं और आज हम बात कर रहे हैं मौजूदा दौर के कपल्स के रिश्तों की, जिनमें प्यार- इश्क-मोहबब्त और कसमे-वादे-वफादारी की महक उड़न छू हुई जा रही है।

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दरअसल, 14 फरवरी यानी वैलेंटाइन डे, खासकर युवा लड़के और लड़कियां इस दिन को प्रपोजल डे के रूप में देखते हैं। प्रपोजल डे इसलिए, क्योंकि 14 फरवरी यानी वैलेंटाइन डे से 7 दिन पहले ही इस दिन को प्रपोजल डे बनाने की पटकथा लिखी जा चुकी है, जिसकी शुरूआत रोज डे से होती है और अंत वैलेंटाइन डे (प्रपोजल) से होती है।

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दिलचस्प बात यह है वैलेंटाइन डे के दिन शादी, मैरिज और कसमों-वादों की जगह नगण्य होती हैं। कपल्स एकदूसरे को प्रपोज करते हैं, लेकिन ऐसे प्रपोजल शादी के पंडाल तक कब पहुंचेंगे या पहुंचती हैं, इसकी कोई गांरटी नहीं होती है। यह नए दौर का प्यार है, जिसमें कोई शर्त नहीं होती है और गांरटी की इच्छा तो बेमानी ही है।

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इश्कबाजी में गांरटी न लड़के चाहते हैं और न ही यह लड़कियों की वरीयता लिस्ट में ही है। दौर-ए-इश्क में आज युवक और युवती होठों से छू लो तुम, मेरा प्यार अमर कर दो टाइप प्यार में यकीं रखते हैं। क्योंकि युवक - युवतियां अब एक पार्टनर के साथ सात जन्म नहीं, बल्कि एक जन्म में सात समंदर पार करना पसंद करती/ करते हैं।

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यह बदलते दौर की सच्चाई है, इसलिए बदलते दस्तूर में कपल्स एक दूसरे को विशेषणात्मक नामों मसलन, देवी-देवता, प्राणेश्वरी-प्राणनाथ और प्रियतम-प्रियतमा को छोड़कर जान, स्वीटू, बेबी, बाबू और शोना की ओर बढ़ गए हैं, जिसमें भावी पतियों वाले संस्कार के बिल्कुल बू नहीं आती है।

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आज का युवा जरूरतों की गुलामी करता है और जिम्मेदारियों से उतना ही दूर भागता है। वैलेंटाइन डे उन्हें यह बखूबी मौका देता है, जिसके बाद ऐसे कपल्स फ्लैट शेयर करते हैं, खर्च शेयर करते हैं, लेकिन बंधन से दूरी बना कर रखते हैं, जो आज के दौर में क्राइम ग्राफ बढ़ाने के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हैं। बलात्कार, मर्डर जैसे अपराध इसी श्रेणी के अंतर्गत आते हैं।

दे दे प्यार दे, प्यार दे- प्यार दे, प्यार दे रे' की खत्म हुई जरूरत

दे दे प्यार दे, प्यार दे- प्यार दे, प्यार दे रे' की खत्म हुई जरूरत

मौजूदा दौर में 'दे दे प्यार दे, प्यार दे- प्यार दे' जरूरत खत्म हो चुकी है। इश्क और रोमांस अब लोगों की मुट्ठी में कैद हो चुका है। स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के जरिए हजारों मील पर बैठा आशिक पलक झपकते ही माशूक या माशूका तक पहुंच जाता है। वह दौर गया जब इश्क आग का दरिया हुआ करता था, क्योंकि अब इश्क हाथ की हथेली में सिमट गया है।

हुक अप और ब्रेक अप का टर्मिनल बन चुका है स्मार्ट फोन्स

हुक अप और ब्रेक अप का टर्मिनल बन चुका है स्मार्ट फोन्स

स्मार्टफोन आज युवाओं के प्यार, तरकार, हुक अप और ब्रेक अप का टर्मिनल बन चुका है, जहां आकर लोग मिलते हैं, हैंडशेक करते हैं, गले मिलते है और गले तो बिल्कुल नहीं पड़ते है। यही कारण है कि आज के दौर में इश्क स्वैच्छिक हो गए हैं, जिसका श्रीगणेश करना और द इंड बस एक क्लिक में हो जाता है।

 सुविधाजनक हुआ इश्क, जहां ने प्रतिद्वंदी है और न ही कोई रकीब?

सुविधाजनक हुआ इश्क, जहां ने प्रतिद्वंदी है और न ही कोई रकीब?

वह जमाना याद कीजिए, जब सारा जमाना इश्क और इश्कबाजों का जानी दुश्मन हुआ करता था। लैला-मजनू और हीर-रांझा जैसे देसी इश्कबाज तो बिना मिले ही दुनिया से विदा हो गए। मौजूदा दौर में इश्कबाज मुसाफिर की तरह मिलते ही नहीं हैं, फिर एक छत के नीचे रहते हैं और मौका मिलते ही उड़न छू हो जाते हैं। आज के दौर का इश्क बेहद ही सुविधाजनक है, जहां कपल्स का प्रतिद्वंदी या रकीब कोई नहीं होता। यहां तक कि कभी जन्मजात दुश्मन रहे उनके पैरेंट्स भी बदलते दौर में एडजस्ट करना सीख चुके हैं। इसमें सबसे बड़ी भूमिका युवक और युवती का आत्मनिर्भरता है।

डिजिटल युग में युवाओं के लिए वैश्विक हो गया इश्कबाजी का वाग्मय

डिजिटल युग में युवाओं के लिए वैश्विक हो गया इश्कबाजी का वाग्मय

इतिहास उठाकर देख लीजिए, इश्कबाजी में असफल रहे इश्कबाजों की मां-बाप पर निर्भरता ही उनकी राह के सबसे बड़े कंकड़ थे, जिन्हें पहाड़ बनने में देर नहीं लगता था, क्योंकि पहाड़ पार करके गए कपल्स इज्जत और दौलत के लिए घरवापसी की छटपटाते रहते हैं। ऐसे ही कपल्स की वजह से लव मैरिज कभी सफल नहीं होते जैसे टैग का ईजाद हुआ। बदलते दौर में जब से डिजिटल युग शुरू हुआ है, इश्कबाजी का वाग्मय वैश्विक हो गया है। इंटरनेट पर बैठा आशिक पूरी दुनिया में पार्टनर तलाश रहा है और आधुनिक लैला-मंजून तो मीलों की यात्रा करके एकदूसरे के पास पहुंच रहे हैं।

आधुनिक युग का इश्क परंपरागत इश्क की तुलना में छिछली होती गई है

आधुनिक युग का इश्क परंपरागत इश्क की तुलना में छिछली होती गई है

इश्क हर दौर में परिवर्तित होता रहा है, क्योंकि आज के दौर में शीरी फरहाद वाले प्रेम की परिकल्पना नहीं किया जा सकता है। आज लोगों के संबंधों पर तकनीक ने बड़ा असर डाला है। कहते हैं कि तकनीक से संबंध जितना गाढा होगा उतना की प्रेम पतला होता जाएगा। यही कारण है कि आधुनिक युग का इश्क परंपरागत इश्क की तुलना में छिछली ही नहीं, चलताऊ हो गई, जिसमें जरूरत हावी हो गई और जिम्मदारी काफूर हो गई। इश्क जब जिम्मेदारी बन जाती है तो इश्क नामक चिड़िया सबसे पहले उड़कर भाग जाती है और फिर बचते हैं दो शरीर, जो शादी में बंधे हैं, तो घिसटते जाते हैं और लिव इन में हैं एक झटके में बिखर जाते हैं।

 इंटरनेट पर मुफ्त में मौजूद हैं लवगुरू, लव डॉक्टर व रिलेशनशिप मैनेजर

इंटरनेट पर मुफ्त में मौजूद हैं लवगुरू, लव डॉक्टर व रिलेशनशिप मैनेजर

आज के दौर में ऐसे बिखरे और घिसट रहे कपल्स के लिए तमाम कंपनियों ने इंटरनेट पर डेटिंग साइट्स खोल रखी है, जहां मित्रता कीजिए, निजी चैट बॉक्स पर बात करने की सुविधा है। थोड़े से पैसे चुकाने पर व्हाट्सएप नंबर पर एकदूसरे के नंबर हासिल कीजिए और प्राइवेट में मिल-जुलकर गुटरगूं किया जा सकता है। यही नहीं, आजकल इंटरनेट पर मुफ्त में लवगुरू, लव डॉक्टर और रिलेशनशिप मैनेजर भी मिल जाएंगे, जो हुकअप और ब्रेकअप एक्सपर्ट होते हैं। यानी रिश्तों से जी भर गया तो मोबाइल फोन पर ही ब्रेक अप और फिर नए हुक अप के इंतजाम हो जाते हैं।

इश्क में गच्चा खाए लोगों की गारंटीशुदा इलाज भी इंटरनेट पर मौजूद

इश्क में गच्चा खाए लोगों की गारंटीशुदा इलाज भी इंटरनेट पर मौजूद

इंटरनेट पर इश्क में गच्चा खाए लोगों की गारंटीशुदा इलाज की भी व्यवस्था है, जिससे खुद को जस्टीफाई करने के लिए ज्यादा हो-हुज्जत की भी जरूरत नहीं पड़ेगा। यानी कोर्ट वगैरह से भी फुरसत मिल जाती है। कपल्स एक दूसरे को ही दोषी ठहरा कर रिश्तों से छुटकारा पा ले रहे हैं। आपने थोड़े से समय और धन के निवेश से यह सब संभव हो गया, फिर क्यों कोई सात जन्मों को रिश्तों में सिर खपाएगा। एक ही जन्म में सात समुद्र पार नहीं कर जाएगा। यहां नौसिखिए और गंभीर किस्म के लोगों को भी सफलता मिलती है, जिनके पास काम, कैरियर, ऑफिस के चलते पार्टनर की तलाश नहीं पाते हैं।

इंटरनेट युग में सोशल मीडिया पर पार्टनर खोजने वालों की संख्या बढ़ी है

इंटरनेट युग में सोशल मीडिया पर पार्टनर खोजने वालों की संख्या बढ़ी है

निः संदेह इश्क के लिए प्राथमिक जरूरत एक अदद साथी की होती है, जो इश्क के प्रस्ताव को स्वीकार करे और इश्क के बदले सिर्फ इश्क परोस सके। हालांकि ऐसा प्रेमी तलाशना पहले बहुत कठिन काम था, लेकिन इंटरनेट युग में सोशल मीडिया पर ऐसे साथियों को खोजने वालों की बहुतायत है, जो साथी रिश्तों के लिए नहीं, बल्कि किस्तों में ढूंढने के लिए प्रति दिन 5-5 जीबी डेटा लुटा रहे हैं। इंटरनेट में मौजूद ऐसे अंसख्य लोगों की जमात में आसानी से परफेक्ट मैच ढूंढा जा सकता है। अगर आप वेलेंटाइन डे के दिन अकेले होने का डर सता रहा हैं तो आज ही डेटिंग साइट पर प्रोफइल बनायें और एक्शन में आ जाए, सफलता झक मारकर आपके कदमों में आएगी।

अटूट पारंपरिक इश्क अब प्रेमियों की प्राथमिकता में नहीं रह गया है

अटूट पारंपरिक इश्क अब प्रेमियों की प्राथमिकता में नहीं रह गया है

हाल ही में एक बुक आई है, जिसका नाम है मार्डर्न रोमांस, लेखक हैं, अज़ीज़ अंसारी। बुक के निष्कर्ष में कहा गया है कि मौजूदा दौर में पारंपरिक इश्क, अटूट वाला पारंपरिक इश्क अब प्रेमियों की प्राथमिकता में नहीं रह गया है। न्यूयार्क टाइम्स में छपे लेख में कहा गया है कि आधुनिक युग की चकाचौंध में मानवीय संवेदनाएं मजाक बनकर रह गई हैं। लेखक के शब्दों में 'इज लव लूजिंग इट्स सोल इन डिजिटल एज़?' ऐसा माना जा रहा है कि तकनीक के जरूरत से अधिक प्रयोग से मनुष्य भावना शून्य होता जा रहा है, इसलिए आधुनिक युग में इश्क महज बॉयोलॉजिकल जरूरत तक सिमट चुका है।

कैरियर और आत्मनिर्भरता की आपाधापी ने छीन ली है रिश्तों से वफादारी

कैरियर और आत्मनिर्भरता की आपाधापी ने छीन ली है रिश्तों से वफादारी

बॉयोलॉजिकल जरूरत इसलिए, क्योंकि लोगों की प्राथमिकताओं से अब संतान उत्पत्ति भी नहीं रह गया है। यानी काम, कैरियर और आपाधापी ने पहले रिश्तों से वफादारी छीन ली और कपल्स शादी की जिम्मेदारियों से दूर भागने लगे और शादीशुदा लोग अब संतान की जिम्मेदारियों से कतराने लगे हैं। यही कारण है कि इटली जैसे कई यूरोपियों देशों में शादी और संतान उत्पत्ति में कप्लस की रूच नहीं लेने के चलते जनसंख्या घटती जा रही है। कभी सोवियंत संघ का हिस्सा रहा सर्बिया भी तेजी से घट रही जनसंख्या की कमी से जूझने लगा है।

तकनीकी संवाद पर ही रिश्ते तय हो रहे, जहां प्रेम पनप ही नहीं पाता है

तकनीकी संवाद पर ही रिश्ते तय हो रहे, जहां प्रेम पनप ही नहीं पाता है

समाज शास्त्री कहते हैं कि तकनीक ने संवाद की शास्त्रीयता शैली, कला को खत्म सा कर दिया है। टेक्स्टिंग में खोखलापन, दिखावा ज्यादा है। वह अंतरंग बातें, सुखदायक सरस संवाद लुप्तप्राय है। कई बार बहुत कम और तकनीकी संवाद पर ही रिश्ते तय हो जाते हैं, जहां प्रेम पनप ही नहीं पाता है, जिसके परिणाम घातक होता गया है। रिश्ते दैहिक, भौतिक तक समिट गए हैं। यौनिक उद्वेग भावनात्मक नहीं रह गए हैं। युवक और युवतियां ऊपरी रंगरूप, बनावट, ठसक, अदा, चाल-ढाल के आधार पर रिश्तों में जुड़ते हैं और करीब आने के कुछ अंतराल के बाद छूटने के लिए भागते हैं।

आधुनिक जीवन शैली में युवाओं की इश्क से जुड़ी प्राथमिकताएं बदलीं

आधुनिक जीवन शैली में युवाओं की इश्क से जुड़ी प्राथमिकताएं बदलीं

प्रेम सर्वकालिक व स्थायी है। इसका स्वरूप और स्वभाव वक्त के साथ बदलता है, क्योंकि जीवन शैली और उससे जुड़ी प्राथमिकताएं इंसान को बदल देती है। पारंपरिक इश्कबाजी में माशूक/माशूका से मिलन में बाधाएं आती थीं, लेकिन एक बार मिलन होता तो था वह जन्म-जन्मांतर का सफ़र तय करने को अमादा हो जाती हैं, लेकिन आधुनिक इश्कबाजी में माशूक/माशूका से मिलन में बाधा न के बराबर है, लेकिन ऐसे रिश्तों की भावाएं और उम्र दोनों छोटी होती हैं, जिनमें बदलाव के लिए बदली हुई जीवन शैली और बदला हुआ समाज जिम्मेदार है, जो मौजूदा दौर में मार्केट केंद्रित हो गया है।

रोमियो-जूलियट, लैला-मंजनू, हीर-रांझा और ढोला-मारू नहीं रहे आदर्श

रोमियो-जूलियट, लैला-मंजनू, हीर-रांझा और ढोला-मारू नहीं रहे आदर्श

14 फरवरी यानी वैलेंटाइन डे पर हाथों में फूल लेकर प्रपोजल लेने और देने के लिए हजारों युवक और युवतिया इंतजार कर रहे हैं, जो छोटे और बड़े शहरों के हिसाब से आज खुद को रोमियो-जूलियट, लैला-मंजनू, हीर-रांझा और ढोला-मारू से ऊपर का आशिक साबित करने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हो जाएंगे, लेकिन ऐसे कपल्स की रिश्तों की उड़ान ज्यादा दूरी तय नहीं कर पाती है, क्योंकि आज के युग की जीवन शैली और मनोदशा उन्हें आदर्श नहीं मानती है।

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English summary
Today's youth is enslaved to needs and runs away from responsibilities. Valentine's Day gives them this perfect opportunity, after which such couples share flat, share expenses, but keep away from bondage, which are most responsible for increasing crime graph in today's era.
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