UP Lok Sabha Election: संभल में 2014 वाले 'चमत्कार' की उम्मीद क्यों कर रही है BJP? SP के लिए चुनौती बड़ी है

UP Lok Sabha Election 2024: यूपी की संभल लोकसभा सीट को परंपरागत रूप से समाजवादी पार्टी का गढ़ समझा जाता रहा है। इस पार्टी के दिग्गज शफीक उर-रहमान बर्क हाल में देहांत होने तक 93 साल की उम्र में भी यहां के सांसद थे। सपा ने इस बार उनके पोते जिया उर-रहमान बर्क को उतारा है।

संभल में लगभग 35% मतदाता मुस्लिम हैं, इसलिए यह सीट बीजेपी के लिए सबसे मुश्किल सीटों में से गिनी जाती रही है। एसपी प्रत्याशी बर्क इसी लोकसभा सीट के तहत आने वाली कुंदरकी विधानसभा क्षेत्र से सपा के विधायक भी हैं।

sambhal polls and kalki dham

कल्कि धाम मंदिर के शिलान्यास के बाद उत्साहित है बीजेपी
2019 में सपा और बसपा का गठबंधन था और बीजेपी संभल समेत मुरादाबाद डिविजन की सभी 6 सीटें हार गई थी। लेकिन, कल्कि धाम मंदिर के शिलान्यास के बाद से भाजपा की उम्मीदें इस सीट को लेकर भी काफी बढ़ गई हैं।

22 जनवरी को अयोध्या में पवित्र राम जन्मभूमि पर राम लला के भव्य मंदिर के उद्घाटन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही यहां कल्कि धाम मंदिर की भी आधारशिला रखी थी। हिंदू आस्था के अनुसार भगवान कल्कि भगवान विष्णु के दसवें अवतार हैं, जिनका प्रकट होना अभी बाकी है। ऐसा माना जाता है कि संभल ही वह जगह है, जहां कल्कि प्रकट होंगे।

कांग्रेस छोड़ बीजेपी से जुड़ चुके हैं श्री कल्कि धाम के पीठाधीश्वर
संभल में कल्कि धाम के मंदिर का निर्माण कांग्रेस से निष्कासित आचार्य प्रमोद कृष्णम करवा रहे हैं, जिनके बीजेपी से तालमेल हो जाने की वजह से इलाके में राजनीतिक समीकरण भी बदलने की संभावनाएं पैदा हुई हैं और पार्टी के नजरिए से उसके लिए अनुकूल माहौल तैयार हुआ है।

प्रमोद कृष्णम श्री कल्कि धाम के पीठाधीश्वर भी हैं। उन्होंने अंग्रेजी अखबार टीओआई को बातचीत में बताया है, 'काशी, अयोध्या और मथुरा के बाद कल्कि पीठ का विकास एक प्रमुख धार्मिक केंद्र के रूप में होगा, खासकर प्रधानमंत्री की ओर से इसके शिलान्यास होने के बाद। इससे पश्चिमी यूपी के राजनीतिक परिदृश्य पर प्रभाव पड़ेगा। अभी तक हिंदू वोट क्षेत्रीय दलों से जुड़े छोटे-छोटे समूहों में बंटे हुए थे। अब, यह उन सबको एकजुट करेगा।'

कल्कि मंदिर का मुसलमान वोटरों पर भी पड़ेगा प्रभाव!
कृष्णम खुद भी यहां से 2014 में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन सिर्फ 16,034 वोट लेकर पांचवें स्थान पर रहे थे। कल्कि धाम में हुए भव्य कार्यक्रम के बाद उन्हें उदार मुसलमानों से भी समर्थन मिलने की उम्मीद बढ़ी है। उन्होंने कहा, 'शिलान्यास समारोह के दौरान उपस्थित आधे लोग बीजेपी से नहीं जुड़े हुए थे और उसमें से कुछ मुसलमान भी थे।'

उनका दावा है बर्क (सपा के दिवंगत सांसद) ने मंदिर के प्रस्ताव में अड़ंगा डालने की भी कोशिश की थी, लेकिन इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इनके पक्ष में फैसला दिया। बीजेपी ने इस सीट से फिर परमेश्वर लाल सैनी को उतारा है, जो पिछली बार सपा-बसपा के संयुक्त उम्मीदवार बर्क से हार गए थे।

2019 में 2014 से कहीं ज्यादा वोट लेकर भी हारी बीजेपी
2019 में बीजेपी प्रत्याशी को 40.82% मिले थे, जो कि पांच साल पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा थे। जबकि, बीजेपी ने यह सीट 2014 में जीत ली थी और तब उसके प्रत्याशी सत्यपाल सैनी को मात्र 34.08% ही वोट मिले थे। तब सपा और बसपा दोनों के चुनाव मैदान में होने का उसे लाभ मिला था। इस बार भी सपा और बसपा का गठबंधन नहीं हुआ है और यह भाजपा के लिए अच्छी स्थिति लग रही है।

परमेश्वर लाल सैनी का कहना है, 'इस बार हमें भरोसा है कि संभल में कमल खिलेगा। प्रधानमंत्री के द्वारा कल्कि मंदिर का शिलान्यास हमारी जीत तय करेगा। मुझे मतदाताओं का समर्थन प्राप्त है, लिंग, जाति या आस्था से परे हटकर।'

बीएसपी उम्मीदवार का क्षेत्र के मुसलमानों के एक वर्ग पर अच्छा प्रभाव
बीएसपी ने यहां से मुरादाबाद के पूर्व विधायक सौलत अली को टिकट दिया है। पीछे 6 चुनाव हार चुके सौलत अली हाल ही में कांग्रेस छोड़कर बसपा की हाथी पर सवार हुए हैं।

वो कहते हैं, '2022 में मैंने सपा प्रत्याशी के तौर पर कुंदरकी एमएलए के रूप में जिया उर-रहमान बर्क की जीत में अहम रोल निभाया था। जहां तक मैं देख पाता हूं, संभल में सपा की कोई खास मौजूदगी नहीं है और बीजेपी और बीएसपी के बीच सीधा मुकाबला है।'

अली का क्षेत्र में प्रभाव भी है और उनके पिता रियासत हुसैन भी चार बार के विधायक थे। बर्क के विरोधी इकबाल मेहमूद के समर्थकों में भी उनकी अच्छी पहुंच है और जिस तरह से सपा के दिग्गज नेता के कुरैशी वोटरों संबंध ठीक नहीं थे, उसका प्रभाव भी इस चुनाव में देखने को मिल सकता है।

'कल्कि धाम मंदिर चमत्कार का काम कर सकता है'
अमरोहा के एक राजनीतिक विश्लेषक शोएब चौधरी कहते हैं, 'मुसलमानों की बड़ी मौजूदगी की वजह से संभल और आसपास के जिलों के मतदाता मुख्य रूप से भाजपा-विरोधी रहे हैं। विपक्ष के बिखराव की वजह से कभी-कभार इन इलाकों में बीजेपी को जीत मिली है, नहीं तो यह पिछले तीन दशकों से सपा का गढ़ रहा है। बीजेपी का इस इलाके पर लंबे समय से नजर है और कल्कि धाम में एक मंदिर का विकास उनके लिए चमत्कार का काम कर सकता है।'

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