त्रिवेंद्र सिंह रावत: उत्तराखंड की कुर्सी आख़िर किन वजहों से गई

त्रिवेंद्र सिंह रावत: उत्तराखंड की कुर्सी आख़िर किन वजहों से गई

त्रिवेंद्र सिंह रावत को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के पद से अचानक इस्तीफ़ा देना पड़ा है.

इस इस्तीफ़े के पीछे की वजह जब पत्रकारों ने उनसे पूछी तो उन्होंने जवाब दिया - "इसके लिए आपको दिल्ली जाना होगा."

हर किसी के मन में सवाल है कि आख़िर त्रिवेंद्र सिंह रावत को इस्तीफ़ा क्यों देना पड़ा. उनके इस्तीफ़े की वजह उन्हीं को समझा जा रहा है क्योंकि जब उन्होंने मंत्रिमंडल का गठन किया था तब कई प्रमुख मंत्रालयों को अपने पास रखा था. इनमें स्वास्थ्य, वित्त ,पीडब्ल्यूडी जैसे प्रमुख मंत्रालय शामिल थे. तक़रीबन 45 से ज़्यादा विभाग उनके पास थे.

जानकार बताते हैं इसकी वजह से पूरा का पूरा सिस्टम त्रिवेंद्र सिंह रावत के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गया. ख़ुद मुख्यमंत्री को इतने सारे डिपार्टमेंट संभालने के लिए अधिकारियों पर निर्भर ज़्यादा रहना पड़ता था.

अधिक विभाग और नौकरशाहों पर निर्भरता

उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने के लिए आंदोलन चला चुके योगेश भट्ट बीबीसी से कहते हैं कि त्रिवेंद्र सिंह रावत की निर्भरता नौकरशाहों पर ज़्यादा थी, उन्होंने नौकरशाहों को साफ़ कहा था कि अगर आपके ऊपर किसी भी मंत्री, विधायक का दबाव होगा तो आप सीधा उनको सूचित करेंगे, इस वजह से भी विधायकों में काफ़ी ज़्यादा नाराज़गी थी.

योगेश भट्ट कहते हैं,"पिछली सरकारों में यह संस्कृति रही है कि यहां पर मंत्री अपनी मर्ज़ी के मालिक हुआ करते थे. लेकिन त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार में मंत्रियों को इतना फ़्री हैंड नहीं मिला था. कहीं ना कहीं यह फ्री हैंड वाला मुद्दा बड़ा बनता गया और इसकी वजह से उपजी नाराज़गी धीरे-धीरे एक बड़ा रूप लेती गई."

इसके अलावा त्रिवेंद्र सिंह रावत का मिलनसार व्यवहार ना होना और उनके सलाहकारों का उन्हें सही फीडबैक ना दे पाने को भी इस इस्तीफ़े की वजह समझा जा रहा है.

योगेश भट्ट कहते हैं कि त्रिवेंद्र सिंह रावत का जो व्यवहार मित्रवत नहीं था, लोगों को लगता था कि वो बहुत ही अकड़ में रहने वाले इंसान हैं.

वो कहते हैं, "इसके अलावा उनके साथ जो टीम थी वे उन्हें परफ़ेक्ट फ़ीडबैक नहीं दे पाई. कभी किसी मुख्यमंत्री के सभी फ़ैसले सही हों यह संभव नहीं हो सकता है. उसका फ़ीडबैक पब्लिक के बीच से मिलता है और वो आपके सलाहकार लेकर आते हैं. या फिर आप निशंक या हरीश रावत जैसे व्यवहार कुशल हों जो अपने आसपास के लोगों से इतर डायरेक्ट पब्लिक में फोन करके पूछ लेते हैं कि क्या चल रहा है."

त्रिवेंद्र सिंह रावत: उत्तराखंड की कुर्सी आख़िर किन वजहों से गई

"इस तरह का फ़ीडबैक जानने के लिए त्रिवेंद्र सिंह रावत के पास कोई मैकेनिज़्म नहीं था. जनता के बीच का फ़ीडबैक इन तक नहीं पहुँच पाया जिसका नतीजा यह हुआ कि ज़मीन पर क्या चल रहा है इसका अंदाज़ा इन्हें लग नहीं पाया."

जनता दरबार में शिक्षिका को धमकी

त्रिवेंद्र सिंह रावत के बारे में एक बात कही जाती है कि वो जनता से दूरी बना कर रखते थे बहुत कम लोगों से ही मिलते थे.

शुरुआती दिनों में उन्होंने जनता दरबार भी लगाया और लोगों की समस्याएं भी सुनीं लेकिन एक बार जब एक महिला शिक्षिका अपने ट्रांसफर की अर्ज़ी लेकर उनके जनता दरबार में आई तो उसके साथ विवाद की स्थिति उत्पन्न होने के बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उस महिला शिक्षिका को गिरफ्तार करने तक की धमकी दे डाली.

इस घटना से त्रिवेंद्र की पूरे प्रदेश में काफ़ी किरकिरी हुई. इस घटना के बाद से त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जनता से एक तरह से दूरी सी बना ली थी.

अपना नाम ना छापने की शर्त पर चमोली ज़िले की एक बीजेपी कार्यकर्ता कहती हैं, "त्रिवेंद्र सिंह रावत एक कार्यक्रम के लिए चमोली में आए थे तो इनके लिए थोड़ी दूरी पर एक अलग से मंच बनाया गया था जहां पर किसी कार्यकर्ता को जाने की इजाज़त नहीं थी. इतने सुदूर इलाके में आने के बाद भी मुख्यमंत्री जब कार्यकर्ताओं की नहीं सुनेगा तो कौन सुनेगा."

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ब्राह्मण विरोधी होने की छवि

वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत बताते हैं कि त्रिवेंद्र रावत ने अपने कार्यकाल में ऐसी नियुक्तियां कीं जिससे ऐसा लगा कि वो एंटी ब्राह्मण भी हैं, जिन लोगों को वो पद और पोस्टिंग दे रहे थे उससे ऐसा लगता था कि जातिवाद और भेदभाव कर रहे हैं.

योगेश भट्ट कहते हैं, "लगातार एक प्रचार उनके ख़िलाफ़ यह भी चला कि उन्होंने जातिवाद को बहुत ज़्यादा बढ़ावा दे रखा है. कहा गया कि मुख्यमंत्री की पर्सनल टीम में रावत हीअधिक हैं. ऐसे संदेश गया कि उन्होंने अपनी टीम में अपने रिश्तेदारों और क़रीबियों को भरा हुआ है. जनता में एक छवि बन गई कि यह एक जातिवादी मुख्यमंत्री हैं."

कुछ विवादित फ़ैसले भी विदाई की वजह

त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार का सबसे बड़ा फ़ैसला देवस्थानम बोर्ड बनाने का था.

वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत कहते हैं कि इन्होंने पार्टी के नेताओं को भरोसे में लिए बिना नौकरशाहों पर ज़्यादा भरोसा करते हुए तिरुपति और वैष्णो देवी की तर्ज़ पर देवस्थानम बोर्ड बना दिया.

तिरुपति और वैष्णो देवी की तर्ज़ पर बनाए गए बोर्ड और इस बोर्ड में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है.

उत्तराखंड के प्रसिद्ध धार्मिक स्थल केदारनाथ और बद्रीनाथ साल में कुछ ही महीनों के लिए खुलते हैं और इनमें वंशानुगत पुजारी पूजा कराते हैं. केदारनाथ में महाराष्ट्र के पुजारी आते हैं तो वहीं बद्रीनाथ में केरल का नम्बूदरी ब्राह्मण पूजा पाठ कराता है. इन ब्राह्मणों और पुजारियों को वेतन भी मिलता है जो मंदिर समिति देती है.

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केदारनाथ मंदिर
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केदारनाथ मंदिर

लेकिन त्रिवेंद्र सिंह रावत के बनाए बोर्ड में प्रशासनिक अफ़सरों की इतनी भरमार हो गई जिससे वहां के स्थानीय पुजारियों को लगा कि यह उनके अधिकारों पर अतिक्रमण है.

तिरुपति में भी इस प्रकार की स्थिति पैदा हुई थी जिसके बाद साल 2006 में क़ानून में संशोधन करके परंपरा से जुड़े लोगों को ज़्यादा अधिकार दिए गए.

तिरुपति में एक श्राइन क्षेत्र होता है. इस श्राइन एरिया में यात्रियों के लिए सुविधाएं विकसित की जाती हैं लेकिन उत्तराखंड में त्रिवेंद्र रावत सरकार ने किसी श्राइन क्षेत्र की कोई घोषणा नहीं की थी सिर्फ मंदिर के अंदर के लिए ही इतना बड़ा तामझाम बना दिया गया था.

इस फ़ैसले से वहां के पुजारी काफ़ी ज़्यादा नाराज़ हो गए थे. बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी खुद इसके ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में गए. हाई कोर्ट में सरकार के पक्ष में फ़ैसला आने के बाद वो इसे सुप्रीम कोर्ट ले गए जहां पर यह मामला लंबित है.

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गैरसैंण को कमिश्नरी बनाने का निर्णय

त्रिवेंद्र सिंह रावत ने गैरसैंण को उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया था. उसकी वजह यह थी कि पहाड़ के लोगों की भावनाएं गैरसैंण से जुड़ी हुई हैं, जब यह अलग राज्य बन रहा था तो एक मांग उठी थी कि पहाड़ की राजधानी पहाड़ पर होनी चाहिए जैसे कि हिमाचल की राजधानी शिमला में है.

गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित करना उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के एजेंडे में था, लेकिन इस फ़ैसले के एक साल बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने अचानक से गैरसैंण को कमिश्नरी बनाने का निर्णय ले लिया.

इसमें गढ़वाल मंडल के दो ज़िले चमोली और रुद्रप्रयाग और कुमाऊं मंडल के दो महत्वपूर्ण ज़िले अल्मोड़ा और बागेश्वर को मिलाकर नई कमिश्नरी के गठन की घोषणा कर दी .

अभी तक राज्य में सिर्फ़ दो कमिश्नरी गढ़वाल और कुमाऊं ही हुआ करती थीं. इन दो कमिश्नरी के लोगों को गढ़वाली और कुमाउंनी के तौर पर पहचाना जाता है.

कुमाऊं के अल्मोड़ा जिल़े से कुमायूं के लोगों की भावनाएं जुड़ी हुई हैं और अल्मोड़ा को कुमायूं की सांस्कृतिक राजधानी भी कहा जाता है. कुमायूं के लोगों को लगा की यह लगा कि उनकी पहचान ख़त्म हो जाएगी.

वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत कहते हैं, "गैरसैंण को कमिश्नरी बनाने की घोषणा से कुमायूं और गढ़वाल के कई विधायकों के साथ-साथ लोग इनसे नाराज़ हो गए थे. लोगों का कहना था कि आपसे कमिश्नरी की मांग किसने की थी, आपने तो ज़बरदस्ती कमिश्नरी हमारे ऊपर थोप दी. इतना बड़ा निर्णय लेने से पहले इन्होंने किसी स्थानीय विधायक या सांसदों की राय तक नहीं ली थी."

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गैरसैंण में महिलाओं पर लाठीचार्ज

वरिष्ठ पत्रकार जय सिंह रावत बताते हैं कि चमोली ज़िले के नंदप्रयाग घाट सड़क के चौड़ीकरण के दौरान 70-75 दिनों से वहां के स्थानीय लोग धरने पर बैठे थे, इसी दौरान गैरसैंण में विधानसभा सत्र चल रहा था.

"प्रदर्शनकारी गैरसैंण जाने लगे तो उन पर काफी बर्बरतापूर्वक लाठीचार्ज करवाया गया उसमें महिलाओं को काफ़ी चोटें आईं. इसके अलावा उन पर ठंड में पानी की बौछार की गई. इस घटना में महिलाओं के साथ हुई बदसलूकी और इसकी तस्वीरों ने भी उनके ख़िलाफ़ नाराज़गी पैदा की."

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कुंभ मेले को लेकर सवाल

जय सिंह रावत बताते हैं कि कुंभ मेले में देरी भी इनके ख़िलाफ़ विरोध की वजह बनी.

कुंभ मेला जनवरी से शुरू हो जाना था और इसमे 8-10 शाही स्नान होने थे लेकिन वे सिर्फ़ चार ही हो पआई इससे साधु संत भी नाराज़ थे.

जय सिंह रावत बताते हैं कि पिछली बार जब पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पश्चिम बंगाल जाने से पहले उत्तराखंड से अपनी यात्रा की शुरुआत की थी और यहां पर दो दिन दिए थे इस दौरान साधू-संतों से मिले थे जिन्होंने सरकार को लेकर खुलकर अपना रोष प्रकट किया.

जय सिंह बताते हैं कि जब नड्डा राज्य के आरएसएस कार्यालय गए तब त्रिवेंद्र सिंह रावत को साथ लेकर नहीं गए ताकि प्रांतीय नेतृत्व खुलकर उनके सामने बोले सके और वहां भी नड्डा को उनके लिए नकारात्मक राय मिली.

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