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टोक्यो ओलंपिक: चीन कैसे ओलंपिक में पदकों के ढेर लगा रहा और भारत तरस रहा है

By BBC News हिन्दी
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चीन में बच्चे
Fang Dongxu/VCG via Getty Images
चीन में बच्चे

भारत और चीन पड़ोसी देश हैं, दोनों क्षेत्रफल में बड़े और बड़ी आबादी वाले देश हैं, दोनों तेज़ी से आगे भी बढ़ रहे हैं. लेकिन जब बात ओलंपिक खेलों की होती है तो चीन से तुलना करना भारतीयों के लिए काफ़ी शर्मसार करने वाली बात हो सकती ही.

टोक्यो में जारी ओलंपिक मुक़ाबलों में अब तक का रुझान पिछले ओलंपिक मुक़ाबलों की तरह ही नज़र आ रहा है, जहाँ चीन मेडल टैली में टॉप पांच देशों में शामिल है जबकि भारत नीचे के पांच देशों में.

क्या किसी के पास भारत के इस मायूस करने वाले प्रदर्शन का जवाब है? और चीन आगे क्यों है?

बीबीसी हिंदी ने भारत की दिग्गज पूर्व एथलीट पीटी उषा से पूछा कि भारत ओलंपिक में चीन की तरह पदक क्यों नहीं लाता. वो कहती हैं, "पिछले 20 साल से मैं ख़ुद से यही सवाल पूछ रही हूँ लेकिन इसका कोई जवाब नहीं है."

अपने करियर में डोमेस्टिक और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में 103 पदक जीतने वाली पीटी उषा आगे कहती हैं, "मैं सच कहना चाहती हूँ, मेरे माता-पिता ने हमेशा मुझे सच बोलने की सीख दी है. लेकिन मैंने अगर सच बोल दिया तो वो एक कड़वा सच होगा, इसलिए इस मामले में मैं पड़ना नहीं चाहती."

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https://www.youtube.com/watch?v=rJKhKyCO5mw

एक चरम पर तो दूसरा न्यूनतम पर

वो कड़वा सच क्या होगा इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है, खेलों से जुड़े लोग कहते हैं कि सच तो ये है कि देश में क्रिकेट को छोड़कर किसी और स्पोर्ट्स में किसी को कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है.

टोक्यो में जारी ओलंपिक खेलों से पहले भारत ने अपने 121 साल के ओलंपिक इतिहास में केवल 28 पदक जीते थे जिनमें से नौ स्वर्ण पदक रहे हैं, और इनमें से आठ अकेले हॉकी में जीते गए थे.

भारत ने पहली बार साल 1900 में पेरिस में हुए ओलंपिक मुक़ाबलों में भाग लिया था और दो पदक हासिल किए थे.

भारत के विपरीत चीन ने इन मुक़ाबलों में पहली बार 1984 में हुए लॉस एंजेलिस ओलंपिक में भाग लिया था लेकिन टोक्यो से पहले इसने 525 से अधिक पदक जीत लिए थे, जिनमें 217 स्वर्ण पदक थे.

टोक्यो में भी अब तक इसका प्रदर्शन ओलंपिक सुपर पावर की तरह रहा है. उसने बीजिंग में 2008 के ओलंपिक खेलों को आयोजित भी किया और 100 पदक हासिल करके पहले नंबर पर भी रहा.

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हॉकी टीम
BBC
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घनी आबादी वाले देश

पश्चिमी देश हमेशा से ओलंपिक और दूसरी अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिताओं में हावी रहे हैं.

अकेले अमेरिकी तैराक माइकल फेल्प्स ने अपने करियर में 28 ओलंपिक पदक जीते हैं जो घनी आबादी वाले देश भारत के पूरे ओलंपिक इतिहास में (टोक्यो से पहले तक) हासिल किए गए कुल पदकों के बराबर है.

दरअसल, चीन और भारत ओलंपिक मुक़ाबलों के हिसाब से तो अलग-अलग हालत में हैं. चीन में अब बहस इस बात पर छिड़ी है कि क्या केवल पदक जीतना ही सब कुछ है?

अमेरिका की सिमोन बाइल्स के अपने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के लिए प्रतियोगिता से बाहर के बाद चीन में ये बहस और तेज़ हो गई है.

आखिर ओलंपिक खेलों के आयोजन के पीछे ख़ास मक़सद स्पोर्ट्स की स्पिरिट को बढ़ाना और राष्ट्रीय गौरव हासिल करना है.

दूसरी तरफ़ भारत में चर्चा ये हो रही है कि खिलाड़ी पदक हासिल क्यों नहीं कर पा रहे हैं.

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चीन से तुलना

पीटी उषा ने ट्रैक एंड फ़ील्ड में दुनिया भर में अपना लोहा मनवाया है लेकिन वो ओलंपिक पदक नहीं जीत सकीं जिसका उन्हें बेहद अफ़सोस है.

बीबीसी हिंदी ने उनसे पूछा कि चीन इतने कम समय में ओलंपिक सुपर पावर कैसे बन गया? उन्होंने अंग्रेज़ी के एक शब्द में इसका जवाब दिया, "डिज़ायर". ये एक गहरा शब्द है जिसमें कई शब्द छिपे हैं: चाहत, मंशा, अभिलाषा, लालच और यहाँ तक कि महत्वाकांक्षा और लगन भी.

मगर भारत का कोई भी खिलाड़ी 'डिज़ायर' के बग़ैर तो ओलंपिक खेलों में भाग नहीं लेता होगा? पीटी उषा कहती हैं, "चीन में पूरे समाज के सभी तबक़े में, चाहे वो सरकारी हो या ग़ैर सरकारी, पदक हासिल करने की ज़बरदस्त चाह है."

पीटी उषा के बेहतरीन साल 80 के दशक में गुज़रे. अगर आप उस दशक की चीनी मीडिया पर निगाह डालें तो पता चलेगा कि शुरू के सालों में तमग़ा और मेडल पाने की ये चाहत सिर्फ़ चाहत नहीं थी बल्कि दरअसल ये एक जुनून था. और ऊपर से देश की शान बढ़ाने की तमन्ना थी.

चीन की आज की पीढ़ी अपने राष्ट्रपति शी जिनपिंग के उस बयान से प्रेरित होती है जिसमे उन्होंने कहा था, "खेलों में एक मज़बूत राष्ट्र बनना चीनी सपने का हिस्सा है.". राष्ट्रपति शी का ये बयान 'डिज़ायर' ही पर आधारित है.

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चीन की जन्म दर
STR/AFP via Getty Images
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भारतीय खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा

आम तौर से भारत के नागरिक और नेता हर मैदान में अपनी तुलना चीन से करते हैं और अक्सर चीन की तुलना में अपनी हर नाकामी को चीन के अलोकतांत्रिक होने पर थोप देते हैं, लेकिन ओलंपिक खेलों में अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे लोकतांत्रिक देश भी बड़ी ताकत हैं.

जब भारतीय चीन के प्रति इतने प्रतियोगी हैं तो खेलों का स्तर चीन की तरह क्यों नहीं? या चीन भारतीय खिलाड़ियों के लिए प्रेरणा क्यों नहीं?

आखिर ये कैसे संभव हुआ कि 1970 के दशक में दो ग़रीब देश, जो आबादी और अर्थव्यवस्था के हिसाब से लगभग सामान थे मगर इनमें से एक खेलों में निकल गया काफ़ी आगे और दूसरा छूट गया काफ़ी पीछे?

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चीन और हिंदुस्तान

महा सिंह राव भारतीय खेल प्राधिकरण के कुश्ती के एक प्रसिद्ध कोच और द्रोणाचार्य पुरस्कार विजेता हैं.

बीबीसी हिंदी के इन सवालों का जवाब देते हुए वो कहते हैं, "चीन और हिंदुस्तान की जनसंख्या लगभग समान है और हमारी अधिकांश चीजें भी समान हैं. चीन के खिलाड़ियों की ट्रेनिंग साइंटिफ़िक और मेडिकल साइंस के आधार पर ज़्यादा ज़ोर देकर करवाई जाती है जिससे वो पदक प्राप्त करने में कामयाब रहे हैं.''

वी श्रीवत्स टाइम्स ऑफ़ इंडिया अख़बार के पूर्व स्पोर्ट्स एडिटर हैं और ये कहना ग़लत नहीं होगा कि उन्हें कई ओलंपिक और दूसरी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत की नाक़ामयों और कभी-कभार मिलने वाली जीत को कवर करने का एक बड़ा तजुर्बा है.

बीबीसी हिंदी से एक बातचीत में वो कहते हैं कि चीन में सब बंदोबस्त 'रेजीमेन्टेड' होता जिसे सबको मानना पड़ता है. भारत में ऐसा करना मुश्किल है.

उनके अनुसार चीन में माता-पिता और परिवार वाले बचपन से ही अपने बच्चों को खिलाड़ी बनाना चाहते हैं जबकि भारत में, खास तौर ग्रामीण क्षेत्रों में, माँ-बाप बच्चों को पढ़ाने पर और बाद में नौकरी पर ध्यान देते हैं.

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चीन की कामयाबी के कारण क्या हैं?

सिंगापुर में रह रहे चीन के वरिष्ठ पत्रकार सुन शी बीबीसी से बातचीत में चीन की कामयाबी में इन बातों का योगदान मानते हैं:

  • सरकार के नेतृत्व वाली समग्र योजना
  • लोगों की व्यापक भागीदारी
  • ओलंपिक के हिसाब से लक्ष्य निर्धारण
  • हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर दोनों की मजबूती
  • प्रतिभाओं की खोज और प्रोत्साहन तंत्र
  • सरकारी और निजी क्षेत्रों के बीच तालमेल

सुन शी कहते हैं, "प्रत्येक ओलंपिक खेलों के लिए चीन में ठोस लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं. चीन ने अपने खेल के बुनियादी ढांचे में ज़बरदस्त सुधार किया है और वो खुद कई तरह के खेल उपकरण बना सकता है."

जिस तरह से भारत में चीन की ओलंपिक कामयाबियों को दिलचस्पी और ईर्ष्या से देखा जाता है उसी तरह से चीन में भी भारत की विफलताओं पर टिप्पणी की जाती है. रियो में हुए 2016 ओलंपिक खेलों में भारत को केवल दो पदक मिले थे और चीन को 70. 'चाइना डेली' ने रियो ओलंपिक के तुरंत बाद भारत में "खेल के प्रति रवैए " को दोष दिया था.

https://www.youtube.com/watch?v=BAlvmZI1HAE

अख़बार ने कहा, "भले ही चीन पदक तालिका में (70 पदकों के साथ) तीसरे स्थान पर था, लेकिन वो चर्चा इस बात पर कर रहा होगा कि वो लंदन 2012 ओलंपिक में अपने 88 पदकों की संख्या को बेहतर क्यों नहीं कर सका. इसके विपरीत, भारत अपने बैडमिंटन रजत पदक विजेता पीवी सिंधु और कुश्ती कांस्य विजेता साक्षी मलिक को भारी मात्रा में धन और प्रतिष्ठित राज्य पुरस्कारों से नवाज़ रहा है. जिमनास्ट दीपा करमाकर, जो पदक हासिल करने से चूक गईं, और निशानेबाज़ जीतू राय को भी सम्मानित किया गया, जिन्होंने पिछले दो वर्षों में स्वर्ण और रजत सहित एक दर्जन पदक जीते हैं, लेकिन रियो में वो कोई पदक न जीत सकीं."

निराशा और फिर सब नॉर्मल

टोक्यो में ओलंपिक खेल शुरू हुए एक हफ़्ते से ज़्यादा हो गया है और पिछली प्रतियोगिताओं की तरह इस बार भी भारत के जिन खिलाड़ियों से पदक की उम्मीद थी वो ख़ाली हाथ देश लौट रहे हैं. भारत ने अब तक एक रजत पदक ही जीता है जबकि चीन पर पदकों की बरसात हो रही है.

खेलों से जुड़े विशेषज्ञ कहते हैं कि ओलंपिक खेलों की समाप्ति के बाद जनता भारत की नाकामी का मातम मनाएगी और मीडिया इसका विश्लेषण करेगी और थोड़े दिनों बाद सब कुछ नॉर्मल हो जाएगा.

खेलों से जुड़े लोगों से बातचीत के आधार पर भारत की नाकामी का दोष खिलाडियों को पूरी तरह से नहीं दिया जा सकता. उनके विचार में भारत की गंभीर कमियों में से अधिकतर के बारे में लोगों को पता है और वो हैं:

  • खेल संस्कृति का अभाव
  • पारिवारिक-सामाजिक भागीदारी की कमी
  • सरकारों की प्राथमिकता नहीं
  • खेल फ़ेडेरेशनों पर सियासत हावी
  • खेल इंन्फ्रास्ट्रक्चर और डाइट नाकाफ़ी
  • भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद
  • ग़रीबी और खेल से पहले नौकरी प्राथमिकता
  • प्राइवेट स्पॉन्सरशिप की कमी

इन में से कुछ कमियों को आमिर खान ने अपनी कामयाब फ़िल्म 'दंगल' में बहुत अच्छे तरीके से कहानी में पिरोया है.

खेलों की इस दशा का ज़िम्मेदार कौन-- सरकार, परिवार, समाज या सभी?

पीटी उषा के विचार में इसके ज़िम्मेदार सभी हैं क्योंकि खेल किसी की प्राथमिकता नहीं है. "हम आईटी और दूसरे क्षेत्रों में विश्व ख्याति के लोग पैदा कर रहे हैं. हम कई फील्ड में दुनिया के कई देशों से आगे हैं, खेल में क्यों नहीं हैं? यहाँ टैलेंट की कमी नहीं है. यहाँ खेल किसी की प्राथमिकता नहीं है."

टाइम्स ऑफ़ इंडिया के पूर्व स्पोर्ट्स एडिटर श्रीवत्स के मुताबिक़ किसी युवा खिलाड़ी के शुरुआती दिनों में परिवार और समूह का भरपूर समर्थन ज़रूरी है. वो कहते हैं, "एक बार रूसी बास्केटबॉल से जुड़े लोग भारत आए टैलेंट की खोज में. उन्होंने 126 ऐसे लड़के चुने जो 15-16 साल के थे और छह फ़ीट से अधिक लंबे थे. उनकी ट्रेनिंग के अलावा उनकी पढ़ाई की ज़िम्मेदारी ली गई. अगले दिन लड़कों के माता-पिता को बुलाया गया ताकि उनके हस्ताक्षर लिए जा सकें, लेकिन पेरेंट्स ने हंगामा शुरू कर दिया कि खेत में कौन काम करेगा, गाय कौन चराएगा और उन्हें नौकरी कौन देगा?"

श्रीवत्स का कहना है कि उन्होंने अपने 50 साल के करियर में ये पाया है कि माता-पिता अपने बच्चों को सरकारी नौकरी में भेजना पसंद करते हैं लेकिन आज तो सरकारी नौकरी भी कम है. "खेल-कूद उनके लिए केवल एक शगल है" लेकिन उनके अनुसार शहर में रहने वाले परिवार अपने बच्चों के लिए खेलों में आगे बढ़ाने में पूरी मदद करते हैं.

वो टेनिस खिलाड़ी लिएंडर पेस की मिसाल देते हैं जिनके पिता ने अपने बेटे के करियर के खातिर अपना सब कुछ त्याग दिया था.

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दुनिया के कई बड़े खिलाड़ियों की कामयाबी का श्रेय उनके माता-पिता को दिया जाता है. प्रसिद्ध टेनिस प्लेयर आंद्रे अगासी अपनी आत्मकथा 'ओपन' में अपने कामयाब करियर का श्रेय अपने ईरानी पिता को देते हैं, वो लिखते हैं कि उनके पिता उन्हें हर रोज़ सुबह अभ्यास करने के लिए ले जाते थे, जबकि उस समय टेनिस में उन्हें रूचि थी भी नहीं. उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए वह अपने बड़े बेटे को अगासी के खिलाफ मैच हारने के लिए कहते थे ताकि टेनिस में उनकी दिलचस्पी बढ़े. और सालों बाद जब उन्होंने विम्बलडन का टाइटल जीता तो सबसे पहले अपने पिता को फोन किया.

https://www.youtube.com/watch?v=K0SBQf0VogI

वरिष्ठ कुश्ती कोच महा सिंह राव स्पोर्ट्स मंत्रालय के स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया से जुड़े हैं जिसका काम देश में खेल को बढ़ावा देना है. इसने देश भर में काफ़ी काम किया है लेकिन ज़मीनी सतह पर हालात नहीं बदले हैं.

राव बीबीसी हिंदी को दुख के साथ बताते हैं कि खेल देश की प्राथमिकता नहीं है. "भारत में खेल प्राथमिकता नहीं है. यही कारण है कि न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकारों का बजट आवश्यकता के अनुसार है, लगभग सभी राज्य सरकारों का स्पोर्ट्स बजट प्रति व्यक्ति 10 पैसा भी नहीं है."

जहाँ खेल सरकारों की प्राथमिकता नहीं है, वहीं ये निजी उद्योगपतियों और प्राइवेट कंपनियों की प्राथमिकता भी नहीं है. श्रीवत्स 10 साल तक कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्रीज़ की स्पोर्ट्स समिति के सदस्य रहे हैं. उन्होंने कई निजी कंपनियों को क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों में दिलचस्पी लेने की सलाह दी है.

वो कहते हैं, "हम स्पोर्ट्स के मुद्दों पर काफ़ी गंभीरता से चर्चा करते थे. लेकिन हम जैसे ही किसी उद्योगपति से ये कहते थे कि आप कुछ खेलों को अडॉप्ट क्यों नहीं कर लेते तो वो कहते थे कि हम क्रिकेट को स्पांसर करेंगे क्योंकि इससे हमें लाभ होगा. एक उद्योगपति ने मुझसे कहा कि वो हॉकी में पैसे नहीं लगाना चाहते क्योंकि ये पैसे हॉकी के खिलाडियों तक नहीं पहुंचते."

सिस्टम बनाना होगा

बीबीसी हिंदी ने जिन खिलाड़ियों और अधिकारियों से बात की उन सभी का कहना था कि देश में स्पोर्ट्स को हर सतह पर मुहिम की तरह आगे बढ़ने की ज़रुरत है और समाज के सभी वर्गों को इसे प्राथमिकता देनी होगी. उनका कहना है कि चीन की तरह एक सिस्टम स्थापित करना ज़रूरी है और ये काम नीचे के स्तर से शुरू हो.

https://www.youtube.com/watch?v=f6kfmnCxEu4

महा सिंह राव कहते हैं, "खेलों को ज़मीनी स्तर से बढ़ावा देने की आवश्यकता है." उनका कहना था कि भारत में धीरे-धीरे बेहतरी आ रही है, उस बेहतरी का हिस्सा हैं कुछ ऐसे पूर्व खिलाड़ी जो ओलंपिक पदक नहीं जीत सके लेकिन उन्होंने कई अंतर्राष्ट्रीय पदक और ख़िताब जीते हैं.

https://www.youtube.com/watch?v=RCNkAEBWXSA

इनमें पूर्व बैडमिंटन चैंपियन प्रकाश पादुकोण और बिलियर्ड्स के नामी खिलाड़ी गीत सेठी और शतरंज के चैंपियन विश्वनाथन आनंद शामिल हैं जिन्होंने एक साथ मिलकर 'ओलंपिक गोल्ड क्वेस्ट' नाम का एक कोचिंग सेंटर खोला है जहाँ 10 के क़रीब खेलों में कोचिंग और ट्रेनिंग दी जाती है. इस केंद्र का दावा है कि इसने अब तक आठ ओलंपियन तैयार किए हैं.

पीटी उषा अपने राज्य केरल में महिला एथलीट्स के लिए एक कोचिंग सेंटर चला रही हैं जिसमें उनके अनुसार इस समय 20 लड़िकयां ट्रेनिंग हासिल कर रही हैं. पीटी उषा ने बताया कि राज्य सरकार ने सहायता के तौर पर केंद्र के लिए ज़मीन 30 की लीज़ पर दी है.

राव के अनुसार भारत में खेल और खिलाड़ियों के स्तर को बेहतर करने के लिए उन्हें ऊंचे स्तर के परीक्षण और रोज़गार दिलाना ज़रूरी है. वो कहते हैं कि साल 2000 से चीन की तरह भारत में भी खिलाड़ियों की ट्रेनिंग साइंटिफिक और मेडिकल साइंस की जानकारी के हिसाब से हो रही है.

श्रीवत्स कहते हैं हालात बेहतर हो रहे हैं. उनके मुताबिक़ मोदी सरकार ने पिछले कुछ सालों में तीन खेल मंत्री लाए जिससे नीतियों के को लागू करने में परेशानी होती है. उनकी सलाह ये है कि निजी क्षेत्र सामने आए और स्पोर्ट्स के प्रति अपनी भूमिका निभाए.

पीटी उषा को यक़ीन है कि भारत अगले 10-12 सालों में अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं और ओलंपिक मुक़ाबलों में पदक जीतने लगेगा, बिलकुल चीन की तुलना में तो नहीं मगर पहले से अधिक संख्या में.

वो कहती हैं कि वो पिछले कई सालों से इस बात के लिए अथक मेहनत कर रही हैं कि अगली पीटी उषा उन्हीं के कोचिंग केंद्र से ही निकले.

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English summary
Tokyo Olympics: Why China is winning lots of medal and India is struggling
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