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बंगाल का दिल फिर से जीतने के लिए 'ममता' 'मान' और 'मोदी' तीनों फैक्टर अपना रही हैं दीदी

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नई दिल्ली- लोकसभा चुनाव में लगे झटके से उबरने के लिए ममता बनर्जी अपनी रणनीतियों को दुरुस्त करने में लग चुकी हैं। लोगों का दिल फिर से जीतने के लिए तृणमूल कांग्रेस की नेता हर वो जतन कर रही हैं, जिससे पश्चिम बंगाल की जनता उनपर फिर से पहले की तरह भरोसा करना शुरू कर दे। राज्य में उनका पहला प्रयास बीजेपी की बढ़त को रोकना है। इसके लिए वो अभी मुख्य रूप से तीन मोर्चों पर पहल कर रही हैं। पहला, उन्होंने सरकारी बाबुओं को रिझाने के लिए उनको दी जाने वाली सुविधाएं बढ़ाना शुरू कर दिया है। दूसरा, उन्होंने लोकसभा चुनाव के समय से ही 'बंगाल प्राइड' को उभारकर मीडिल क्लास बंगालियों को टीएमसी से जोड़ने का प्रयास कर रही हैं। तीसरा, उनका जोर ऊंची जातियों के लोगों को भी अपने साथ लाने का है। क्योंकि, उनकी छवि सिर्फ मुस्लिमों की चिंता करने वाली नेता की बन चुकी है या कम से कम बीजेपी ऐसी छवि बनाने में सफल रही है। इसके अलावा कई और फैक्टर भी हैं, जिसपर उन्होंने एक साथ ध्यान देना शुरू कर दिया है।

सरकारी कर्मचारियों से 'ममता'

सरकारी कर्मचारियों से 'ममता'

लोकसभा चुनाव नतीजे आने के हफ्ते भर बाद ही टीएमसी की एक बैठक में नेताओं ने ममता का ध्यान इस ओर खींचा था कि लाखों सरकारी कर्माचारियों ने उनकी सरकार से नाराज होकर बीजेपी को वोट दे दिया। क्योंकि, वे बहुत बड़ी मात्रा में डीए के बकाए से सरकार से नाराज थे। द प्रिंट की एक खबर के मुताबिक टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता खुद माना था कि, "सरकारी कर्मचारियों और उनके परिवार वालों का कम से कम 70 लाख वोट बीजेपी को चला गया और उनका वोट हमें नहीं मिला।" टीएमसी के नेता कहते हैं कि 'भले ही पार्टी का वोट शेयर बढ़ा हो, लेकिन इतनी बड़ी संख्या में एंटी-इंकंबेंसी वोटर मायने रखते हैं।' इसी मीटिंग में टीएमसी नेताओं ने मुख्यमंत्री को ये भी सूचना दी कि अब पुलिस वाले भी उनकी नहीं सुन रहे। खासकर, छोटे-छोटे थानों में स्थानीय नेताओं की बातों पर पुलिस वाले ध्यान ही नहीं देते। दीदी का दिमाग ठनका और उन्होंने राज्य में पुलिस वालों का बोनस तत्काल बढ़ाने का आदेश दे दिया। 1988 के नियम के मुताबिक बंगाल में डीएसपी से नीचे के पुलिस कर्माचारियों को हर साल 30 दिन का बोनस दिए जाने की व्यवस्था थी, 28 जून को ममता ने उसे बढ़ाकर 52 दिन करके तत्काल जारी करने का आदेश दे दिया। मुख्यमंत्री के इस फैसले से राज्य सरकार पर 232 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। लेकिन, दीदी को तो बाबुओं की नाराजगी दूर करनी है, जिनके लिए आगे और भी बड़े फैसले लिए जाने की संभावना है।

बंगाल की 'मान-मर्यादा' को प्राथमिकता

बंगाल की 'मान-मर्यादा' को प्राथमिकता

बंगाल में दीदी बीजेपी के हिंदुत्व के फॉर्मूले को काउंटर करने के लिए बंगाली मान-मर्यादा का कार्ड भी खेल रही हैं। तृणमूल के एक नेता के मुताबिक, "जैसा कि हम सब जानते हैं कि बंगाल के लोगों के लिए बंगाली संस्कृति बहुत प्यारी है। और हिंदी हार्टलैंड वाले राज्यों के हिंदी-भाषी नेताओं का एक ग्रुप उसे खत्म करना चाहते हैं।" उन्होंने कहा कि वे ऐसा इसलिए करते हैं, क्योंकि वे बंगाली समाज से नहीं जुड़े हैं। हो सकता है कि उनका इशारा बंगाल में बीजेपी के प्रभारी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की हो। यही नहीं ममता के इशारे पर बंगाल के महापुरुषों के बड़े-बड़े पोस्टर भी लगाने का प्रचलन शुरू किया गया है, जिसपर बीजेपी के 'जय श्रीराम' नारे की काट के तौर पर 'जय हिंद, जय बंगला' नारे लिखे जाने लगे हैं। टीएमसी कीओर से बंगाली मान-मर्यादा पर तबसे जोर दिया जाने लगा है, जब ईश्वर चंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़ी गई थी। इसके अलावा मुख्यमंत्री स्कूलों में बंगाली भाषा को भी मैनडेटरी करा चुकी हैं।

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'मोदी कोटा' पर लिया यू-टर्न

'मोदी कोटा' पर लिया यू-टर्न

लोकसभा चुनाव से पहले जब मोदी सरकार ने सामान्य वर्ग के गरीबों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में 10 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था की थी, तो ममता ने बंगाल में उसे लागू करने से इनकार कर दिया था। लेकिन, अब वो ऐसे प्रावधानों को राज्य में भी लागू कर रही हैं। दरअसल, टीएमसी को फीडबैक मिला है कि ऊंची जातियों के गरीबों को आरक्षण देने से मना करने का फैसला पार्टी को लोकसभा चुनाव में काफी भारी पड़ा है। शुरू में ममता ने इसकी संवैधानिक वैद्यता पर सवाल खड़े किए थे, लेकिन अब इसे पश्चिम बंगाल में लागू करने की अधिसूचना भी जारी कर चुकी हैं।

वेलफेयर स्कीम की भी चिंता

वेलफेयर स्कीम की भी चिंता

लोकसभा चुनाव में बीजेपी से मिली चुनौती के बाद ममता सरकार ने राज्य में वेलफेयर स्कीम का लाभ भी सही मायने में जरूरतमंदों तक पहुंचाने की पहल शुरू कर दी है। गौरतलब है कि चुनावों के दौरान मोदी और शाह ने ममता सरकार पर सरकारी योजनाओं में बंदरबांट के आरोप लगाए थे। अब ऐसी कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने और उसकी शिकायतों के निपटारे के लिए मुख्यमंत्री के दफ्तर में ही एक सेल शुरू किया गया है, जहां जनता किसी भी तरह की अनियमितता की शिकायत टोल-फ्री नंबर पर दर्ज करा सकती है। यही नहीं मोदी-शाह के सियासी दबाव का ही असर हुआ है कि ममता बनर्जी ने अपने पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं से लेकर बड़े नेताओं तक को 'कट-मनी' के नाम पर लोगों से लूटी गई रकम लौटाने को कहा है।

लोगों से कनेक्ट होने की कोशिश

लोगों से कनेक्ट होने की कोशिश

लगता है कि दीदी महसूस कर रही हैं कि अगर पिछले सात वर्षों की सरकार में वो जन-भावनाओं से अलग नहीं हुई होतीं, तो लोग भी उनसे दूर होने को मजबूर नहीं हुए होते। इसलिए, वो नीतीश कुमार के सहयोगी और चर्चित राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर को पश्चिम बंगाल लेकर गई हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री को 2021 के चुनाव के लिए लोगों से जुड़ने का मंत्र देना शायद शुरू भी कर दिया है। माना जा रहा है कि इसी का असर है कि अब दीदी ने अपने कैडरों को हिंसक वारदातों से दूर ही रहने के लिए आगाह कर दिया है। जनता से जुड़ने के लिए उन्होंने दूसरे कदम भी उठाने शुरू कर दिए हैं। इसी कड़ी में उन्होंने कोलकाता के मेयर फिरहद हकीम को हफ्ते में कम से कम एक बार जनता से उनकी समस्याओं को सीधे सुनने और उसका समाधान देने का हुक्म दिया है। कोलकाता नगर निगम ने पिछले एक जुलाई से 'टॉक टू मेयर' नाम से एक टॉल फ्री सेवा शुरू भी की है, जिसपर लोग हर बुधवार को सीधे मेयर तक अपनी परेशानियां पहुंचा सकते हैं। मुख्यमंत्री ने लोगों का मूड भांपने के लिए खुद ही जनसंपर्क कार्यक्रम करना भी शुरू कर दिया है। 12 जुलाई को 'सेव वॉटर डे' का सरकारी कार्यक्रम उसी नीति का हिस्सा है।

2021 के लिए जगी है दीदी की 'ममता'

2021 के लिए जगी है दीदी की 'ममता'

तृणमूल नेता ममता बनर्जी का 'हृदय परिवर्तन' लोकसभा चुनाव के नतीजों की गहराई से विश्लेषण के बाद नजर आ रहा है। 42 में से 18 सीटें बीजेपी ने तो जीती ही हैं, आदिवासी इलाके (जंगल महल) और नॉर्थ बंगाल में टीएमसी का सफाया करके उनको 2021 के लिए सोचने को मजबूर भी कर दिया है। जंगल महल में भाजपा ने सभी 5 सीटें जीती हैं और नॉर्थ बंगाल की 8 में से 7 सीटों पर कब्जा कर लिया है और एक सीट कांग्रेस को हाथ लगी है। यह उस राज्य का हाल है जहां के लोगों ने 2016 के विधानसभा चुनावों में 294 में से सिर्फ दीदी के चेहरे पर 211 सीटें टीएमसी की झोली में डाल दिए थे और 2018 के विवादित पंचायत चुनावों में भी वहां सिर्फ दीदी का ही सिक्का चला था।

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English summary
to win peoples heart again Mamata Banerjee's emphasis is on Bangla pride, Modi quota and high bonus
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